डॉक्टरों को मुफ्त गोवा-थाईलैंड ट्रिप, हजारों की शराब पार्टीज, मरीजों की जेब पर पल रहा है 'प्रोपेगेंडा मेडिसिन माफिया'
प्रोपेगंडा मेडिसिन को बढ़ावा देने के बदले इंदौर की 18 फीमेल डॉक्टरों ने गोवा में उड़ाई मौज-मस्ती
- हर साल डॉक्टर्स जा रहे मुफ्त की विदेशी ट्रिप पर, प्रोपेगंडा मेडिसिन माफिया दे रहा डॉक्टरों को इनाम
- कमिशनखोरी के चक्कर में डॉक्टर इलाज के बदले बढ़ा रहे मरीजों का मर्ज
- मप्र में टैक्स ज्यादा, इसलिए हिमाचल के बद्दी, पंजाब के मोहाली, जालधंर और महाराष्ट्र में बन रही प्रोपेगंडा मेडिसिन
एक ही कंपनी की दवा क्यों : मेडकिल संचालकों का कहना है कि क्यों डॉक्टर बार-बार एक ही कंपनी की दवा लिखता है, या फिर ऐसी दवा लिखता है जो हर जगह नहीं, बल्कि कुछ तय जगहों पर ही मिलती हैं। दरअसल, प्रोपेगंडा मेडिसिन कंपनियां मेडिकल फील्ड से जुड़े कुछ लोगों को कमिशन के जाल में लेकर बाजार में अपनी दवाएं खपा रही हैं। चौंकाने वाली बात है कि कोई भी व्यक्ति खुद अपनी दवाएं बनवा सकता है, अपना ब्रांड नाम रख सकता है, यहां तक कि दवाओं की एमआरपी भी तय की जा सकती है।
पिछले साल तमिलनाडु में बनी एक कफ सिरप से मध्यप्रदेश में 21 और राजस्थान 11 बच्चों की मौत हो गई थी। कुल 32 मौतें। बाद में देश के कई राज्यों से दवाइयों के सैंपल लेकर जांच के लिए भेजे गए थे। दवा नकली, मिलावटी या तय मानकों पर नहीं थी यह साफ है। इसलिए 32 बच्चों की मौत हुई थी। इससे साफ है कि प्रोपेगंडा मेडिसिन का जाल कई राज्यों तक पसरा हुआ है।
ऐसे समझे नकली या मिलावटी दवाओं का स्कैंडल
क्या है प्रोपेगेंडा स्कैंडल : दवाई निर्माता और मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े कुछ लोगों की मिलीभगत से पूरे प्रदेश में एक प्रोपेगेंडा स्कैंडल चल रहा है। वेबदुनिया की पड़ताल में मेडिकल फील्ड से जुड़े कई लोगों ने नाम प्रकाशित नहीं करने की गुजारिश पर बताया कि हर दवाई की एक ग्रेड होती है। जैसे सिप्ला, रेड्डी या सनफार्मा जैसी लिस्टेड कंपनियों की एक ग्रेड है, इन कंपनियों की दवाइयों में कोई दिक्कत नहीं आएगी, ये महंगी और उच्च गुणवत्ता वाली दवाइयां होती है। दूसरी मेनकाइंड और एफडीसी कंपनियों की दवाइयों की एक ग्रेड होती है। यहां तक भी ठीक है। डॉक्टर ये दवाइयां लिखते हैं और मरीज ठीक भी होता है। लेकिन दवाइयों की एक तीसरी कैटेगरी या ग्रेड होती है, जिसे पीजी यानी प्रोपेगंडा कंपनी कहा जाता है। दवाई जिसमें कंपनी संचालक कमिशन का लालच देता है और मरीज को दवाई लिखने के लिए कहता है। कुछ डॉक्टरों ने बताया कि इस ग्रेड की दवाओं में पोटेंसी यानी क्षमता ही नहीं होती है। सबसे दुखद बात यह है कि पहले इन प्रोपेगंडा कंपनी का प्रतिशत 10 था, लेकिन अब यह बढ़कर 40 प्रतिशत हो गया है। अंदाजा लगा सकते हैं कि इस तरह की कितनी प्रोपेगंडा मेडिसिन बाजार में मिल रही होगी।
कैसे काम करती है प्रोपेगंडा कंपनियां : इंदौर के दवा बाजार के हमारे एक सूत्र ने बताया कि हिमाचल से लेकर पंजाब और महाराष्ट्र में दवाएं बनाने वाली ये प्रोपेगंडा कंपनियां किसी भी शहर में मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े कुछ लोगों की सूची तैयार करती है। सूची बनाकर इनसे संपर्क किया जाता है। मरीज को उनकी कंपनी की दवा देने पर कमिशन तय होता है। अब ये मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े कुछ लोगों मरीज को वही दवा देते हैं जिस पर उसे प्रोपेगंडा कंपनी की तरफ से भारी भरकम कमिशन मिलना है। यही वजह है कि कई बार ऐसी दवाई चुनिंदा दुकानों के सिवा कहीं भी चले जाओ, आपको नहीं मिलेगी। डॉक्टरों को कमिशन का लालच और दवा बनाने वाली कंपनी का मुनाफा। दोनों का गठजोड़ मिलकर मरीज की जान के साथ खिलवाड़ कर रहा है। ये एक बड़ा स्केंडल है।
डॉक्टर खुद बनवा रहे अपनी दवाइयां : अक्सर मरीज के सामने यह समस्या आती है कि किसी डॉक्टर की लिखी दवाएं पूरे शहर में कहीं नहीं मिलती हैं। ये दवाएं सिर्फ डॉक्टर के बताए गए मेडिकल स्टोर या खुद उनके क्लिनिक पर संचालित स्टोर पर ही मिलती हैं। इसके पीछे की बेहद चौंकाने वाली जानकारी वेबदुनिया को मिली है। सूत्रों के मुताबिक कुछ डॉक्टर खुद अपनी दवाइयां बनवा रहे हैं, इनकी दवाइयां कहीं नही मिलेगी, जो नाम बोलेंगे उस ब्रांड से दवाई बन जाएगी, अपने नाम से। यहां तक कि दवाइयों की एमआरपी भी डॉक्टर ही तय करते हैं। यहां तक कि कोई भी अपनी दवाई बनवा सकता है। सूत्रों ने वेबदुनिया को इंदौर के ऐसे डॉक्टरों के नाम भी बताए और दावा किया कि इन डॉक्टरों की लिखी दवाएं पूरे शहर में सिर्फ उन्हीं के पास मिलेगी और कहीं नहीं।
कैसे होता है मिलावट का धंधा : नकली या मिलावटी दवाएं बनाने के लिए चाक पाउडर, मक्के और आलू के आटे का इस्तेमाल किया जाता है। इन्हें ब्रांडेड दवाओं की तरह पैक करके दुकानों पर सप्लाय किया जाता है। कई तरह की मेडिसिन में और टैबलेट में तय मात्रा से कम दवा डालकर बनाया जाता है, जिससे मरीजों को दवा का पर्याप्त डोज नहीं मिल पाता और बीमारी कम नहीं होती, बल्कि बढ़ती जाती है। कई बार तो इन्हें खतरनाक रसायनों से बनाकर गोलियों और इंजेक्शन में भर दिया जाता है।
एमपी फार्मासिस्ट एसोशिएशन के जिलाध्यक्ष दीप मंडवानी ने वेबदुनिया को बताया कि हमारा एक ही मोटो हैं, जहां दवा मिल रही है, वहां फार्मासिस्ट होना चाहिए। लेकिन ऐसा हकीकत में हो नहीं रहा है। जब यहीं नियमों की अनदेखी हो रही है तो आप ही सोच लीजिए मरीजों को क्या और कौनसी दवाएं मिल रही होंगी। इसके बाद भी कोई मॉनिटरिंग नहीं है। मेडिकल और दवाओं के कारोबार में यह एक बहुत बड़ा लूप-होल है, जिसकी तरफ शासन का ध्यान नहीं है।
ड्रग माफियाओं को नहीं लचर कानून से कोई डर : इस तरह की नकली, मिलावटी और तय मानकों पर नहीं बनी प्रोपेगंडा दवाइयां बनाने वाली कंपनियों को हकीकत में कानून का भी कोई डर नहीं है, इसलिए इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। दरअसल, भारत में नकली और मिलावटी दवाओं पर लगाम लगाने के लिए जो कानून बना है, वो बेहद लचर है। 2023 में इस कानून में बदलाव के बाद तो इससे ड्रग माफियाओं का काम और ज्यादा आसान हो गया।
क्या है ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट-1940 : भारत में औषधि एवं प्रसाधन अधिनियम- 1940 (ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट- 1940) बनाया गया था। इस कानून के तहत किसी भी दवा का निर्माण, बिक्री और वितरण के लिए राज्य सरकार से ड्रग लाइसेंस लेना जरूरी है। दवाओं और कॉस्मेटिक्स प्रोडक्ट का सेफ्टी और क्वालिटी के तय मानकों पर खरा होना जरूरी है। इस कानून के तहत नकली, गलत ब्रांड वाली या खराब क्वालिटी वाली दवाइयों का निर्माण, बिक्री और डिस्ट्रिब्यूशन प्रतिबंधित है।
25 लाख तक का जुर्माना : वहीं मिलावटी दवा बनाने या बिना लाइसेंस के दवा बनाने के मामले में 5 साल की सजा के बजाए अब नए संशोधन में 25 लाख तक का जुर्माना कर दिया गया है। अन्य मामलों में 7 साल तक की सजा का प्रावधान था, अब यह हटा लिया गया है। अब सिर्फ जान के नुकसान में ही दोषी को आजीवन कारावास की सजा हो सकती है।
संशोधन के बाद लचर हुआ कानून : भारत में नकली दवाइयों के कारोबार को बढ़ावा मिलने के पीछे की सबसे बड़ी वजह इसे लेकर तय कानून का लचर होना है। दरअसल, साल 2023 में इस कानून में संशोधन किया गया था। मिलावटी या बिना लाइसेंस के दवा बनाने के मामले में 5 साल की सजा के बजाए अब नए संसोधन में 25 लाख तक का जुर्माना कर दिया गया है। ऐसे में कई मामलों में ड्रग निर्माता जुर्माना देकर छूट जाता है।
क्या जानकारी मिलती है?: इस कोड को स्कैन करने पर दवा का जेनेरिक नाम, ब्रांड का नाम, मैन्युफैक्चरर की डिटेल, बैच नंबर, मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपायरी डेट की सही जानकारी मिलती है।
QR Code हूबहू कॉपी कर डाला: पश्चिम बंगाल और गुजरात जैसे राज्यों में पकड़े गए नकली दवाओं के जखीरे में देखा गया कि जालसाजों ने असली पत्तों की तरह दिखने वाले नकली पत्ते बनाए और उन पर क्यूआर कोड भी हूबहू कॉपी (Clone) कर दिए।
स्कैन न होना : बिहार और यूपी में कुछ ऐसी खबरें भी आईं जहां मेडिकल स्टोर्स पर रेड के दौरान कुछ ब्रांडेड दवाओं के क्यूआर कोड स्कैन ही नहीं हो रहे थे। ड्रग विभाग ने आशंका जताई कि जेनरिक या नकली दवाओं को महंगे ब्रांड के रैपर में पैक कर नकली क्यूआर कोड छाप दिए गए थे।

