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फांसी का फंदा या इंजेक्शन? मौत की सजा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

Supreme Court Death Penalty
सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा पाए दोषियों को फांसी देने की मौजूदा व्यवस्था को खत्म करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। याचिका में फांसी की जगह इंट्रावेनस लेथल इंजेक्शन (घातक इंजेक्शन) जैसे कम पीड़ादायक तरीकों को अपनाने की मांग की गई थी। हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार मौजूदा फांसी की प्रक्रिया की समीक्षा के लिए विशेषज्ञों की समिति गठित कर सकती है।

क्या थी सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका?

 
यह जनहित याचिका (PIL) वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने वर्ष 2017 में दायर की थी। याचिका में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 354(5) को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई थी।
 
याचिका में तर्क दिया गया था कि फांसी देने की मौजूदा व्यवस्था भेदभावपूर्ण है, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करती है और संविधान पीठ के Gian Kaur मामले में दिए गए फैसले के अनुरूप नहीं है।

फांसी की जगह क्या विकल्प सुझाए गए थे?

 
याचिकाकर्ता ने मौत की सजा को लागू करने के लिए फांसी के अलावा कई विकल्पों का सुझाव दिया था। इनमें घातक इंजेक्शन, गोली मारकर मौत की सजा, इलेक्ट्रिक चेयर और गैस चैंबर जैसे तरीके शामिल थे।
 
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने दलील दी थी कि कम से कम मौत की सजा पाए व्यक्ति को फांसी और घातक इंजेक्शन जैसे विकल्पों में से किसी एक को चुनने का अधिकार दिया जाना चाहिए।
 

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

 
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि अदालत विधायिका को मौत की सजा लागू करने का कोई विशेष तरीका अपनाने का निर्देश नहीं दे सकती। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका फैसला केंद्र सरकार को मौजूदा फांसी की प्रक्रिया की समीक्षा के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने से नहीं रोकता।
 
ऐसी समिति यह अध्ययन कर सकती है कि क्या मौत की सजा लागू करने का कोई वैकल्पिक तरीका संविधान की उस आवश्यकता के अधिक अनुरूप होगा, जिसके तहत पीड़ा को कम करने और मानव गरिमा को बनाए रखने पर जोर दिया गया है।

2023 में भी सुप्रीम कोर्ट ने मांगा था बेहतर डेटा

 
मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह इस बात की जांच के लिए विशेषज्ञों की समिति गठित करने पर विचार कर सकता है कि मौत की सजा पाए दोषियों को फांसी देना अनुपातिक और कम पीड़ादायक तरीका है या नहीं।उस समय अदालत ने केंद्र से मौत की सजा लागू करने के तरीके से जुड़े मुद्दों पर 'बेहतर डेटा' उपलब्ध कराने को कहा था।
 

केंद्र ने फांसी को बताया था 'त्वरित और सरल'

 
वर्ष 2018 में केंद्र सरकार ने फांसी की मौजूदा कानूनी व्यवस्था का जोरदार समर्थन किया था। केंद्र ने अदालत को बताया था कि मौत की सजा पाए दोषी को फांसी देना ही निर्धारित तरीका है और घातक इंजेक्शन या गोली मारने जैसे अन्य तरीके जरूरी नहीं कि कम पीड़ादायक हों।
 
गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव की ओर से दाखिल जवाब में कहा गया था कि फांसी 'त्वरित और सरल' है और इसमें ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है जो कैदी की पीड़ा को अनावश्यक रूप से बढ़ाए।

क्या अब फांसी की जगह घातक इंजेक्शन आएगा?

फिलहाल नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की मौजूदा व्यवस्था को खत्म करने का आदेश नहीं दिया है और न ही घातक इंजेक्शन को इसके विकल्प के तौर पर लागू करने का निर्देश दिया है। हालांकि, अदालत के फैसले से केंद्र के लिए विशेषज्ञ समिति के जरिए मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा का रास्ता खुला हुआ है। भविष्य में ऐसी किसी समिति की सिफारिशों के आधार पर मौत की सजा लागू करने के तरीकों पर बहस आगे बढ़ सकती है।
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