वैश्विक मंदी में मजबूत भारतीय अर्थव्यवस्था

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2008 की शुरुआत में जीडीपी के लगातार नकारात्मक आँकड़ों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी। अमेरिका में होम लोन और मॉर्गेज लोन न चुका पाने वाले ग्राहकों की संख्या तेजी से बढ़ी, जिससे लेहमैन ब्रदर्स, मेरीलिंच, बैंक ऑफ अमेरिका जैसी कई बड़ी वित्तीय संस्थाएँ तरलता के अभाव में आ गईं। अमेरिकी सरकार के बैलआउट पैकेज भी इस अभाव को कम नहीं कर पाए और देखते ही देखते अमेरिका में 63 बैंकों में ताले लग गए।

अमेरिका की स्थिति का असर पूरी दुनिया में पड़ा और वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी के दौर में आ गई। लेहमैन, मेरीलिंच जैसे वित्तीय संस्थानों की होल्डिंग दुनियाभर की विभिन्न कंपनियों में थी, इसलिए उन पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था।

सामान्यत: अर्थव्यवस्था के बढ़ने का चक्र 6 से 10 वर्ष का होता है, लेकिन जब आर्थिक मंदी (रिसेशन) के चक्र की बात की जाए तो यह अर्थव्यवस्था के किसी वित्तीय वर्ष की दो तिमाही से लेकर आठ तिमाही तक प्रभावी रहती है। याने अर्थव्यवस्था को मंदी से उबरने के लिए छह माह से दो वर्ष तक का समय लगता है।
2008 से अमेरिका में मंदी का दौर हावी है, इस दौरान छँटनी के चलते वहाँ कई लोगों की नौकरियाँ छूट गईं और कई बैंक बंद हो गए। लेकिन मार्च 2009 से अमेरिकी अर्थव्यवस्था में रिकवरी देखी गई है। इस दौरान तरलता का अभाव कम हुआ है और बेरोजगार लोगों की संख्या में तेजी से कमी आई है। स्टॉक मार्केट में भी लोगों का विश्वास बढ़ रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था 2010 के अंत तक पटरी पर लौट आएगी।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर मंदी का असर- अमेरिकी मंदी का असर भारत सहित पूरे विश्व पर हुआ, लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह असर शेयर बाजार, इम्पोर्ट और एक्सपोर्ट, आउसोर्सिंग बिजनेस पर ही ज्यादा दिखाई दिया। एक समय 21000 के स्तर पर चल रहा सेंसेक्स मार्च 2009 तक 8000 के स्तर पर आ गया, याने डाउ जोंस के गिरने से सेंसेक्स में भी 60 प्रतिशत तक की गिरावट हुई।
डॉलर के रुपए के मुकाबले कमजोर होने से आउटसोर्सिंग और एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बिजनेस में भारत को बहुत फर्क पड़ा, लेकिन इससे भारतीय अर्थव्यवस्था की जीडीपी दर पर आंशिंक प्रभाव ही पड़ा। विशेषज्ञों की राय में वैश्विक मंदी से इंडिया प्रभावित हुआ, भारत नहीं। फिर भी इस साल भारतीय अर्थव्यवस्था की जीडीपी में 1 से 2 प्रतिशत की गिरावट रहने की आशंका है।
इस साल यदि सामान्य मानसून रहा तो भारतीय अर्थव्यवस्था की रिकवरी में जान आ जाएगी, लेकिन सामान्य से कम बारिश की हालत में रिकवरी का दौर कुछ लंबा खिंच सकता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर वैश्विक मंदी का प्रभाव पड़ा तो है, लेकिन अन्य देशों की तुलना में यह कम है। जहाँ इस वर्ष भारत की जीडीपी दर 1 से 2 प्रतिशत तक कम रहने की संभावना है, वहीं अन्य देशों की जीडीपी बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। हाल ही में वैश्विक अर्थव्यवस्था पर हुए एक सर्वे में कहा गया है कि आर्थिक मंदी के दौर में तीन देशों की अर्थव्यवस्थाओं ने इसका मजबूती से मुकाबला किया। इन तीन देशों में जर्मनी और चीन के बाद भारत का भी नाम है।
मंदी के दौर से उबरने की शुरुआत में भारतीय अर्थव्यवस्था ने तेज रिकवरी दिखाई है। विश्लेषक मानते हैं 2011 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूती से खड़ी होगी।



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