जनता की देहरी से बहुत दूर है स्वतंत्रता

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स्वतंत्रता प्राप्ति का औपचारिक आयोजन तो दिखाई पड़ता है पर वास्तविक स्वतंत्रता तो वह होती है, जो सहज रूप से प्रतिदिन व प्रतिक्षण महसूस की जा सकती है। स्वतंत्रता का ऐसा अनुभव आजादी के इतने वर्षों बाद भी आम आदमी को तो नहीं होता। दीपावली-दशहरा या होली आदि त्योहारों का आना और उन्हें मनाया जाना पारंपरिक होने के साथ ही साथ व्यक्तिगत व पारिवारिक रूप से भी आनंददायक होता है। तब स्वतंत्रता दिवस के आयोजन को ऐसी ही सहज लोकव्यापी परंपरा का स्वरूप क्यों नहीं मिला? आज भी सरकारें अपनी राजधानी से स्वतंत्रता दिवस के आयोजन का फरमान निकालती हैं, जो जिला मुख्यालय से तहसील स्तर की पंचायतों तक पहुँचता है और आखिर तिरंगा भी फहरा दिया जाता है, शासकीय भवनों से लेकर पंचायत कार्यालय तक। इसी के साथ कुछ सुनिश्चित आयोजन जनप्रतिनिधियों के भाषण, अब तक की तथाकथित उपलब्धियों का बखान और स्कूली बच्चों का जुलूस आदि भी होता है। आम आदमी आयोजन की भीड़-भाड़, लाउड स्पीकर का शोर-शराबा और सड़कों-रास्तों पर विशेष चहल-पहल से समझ लेता है कि आज कुछ विशेष है 'नेताओं के लिए', सरकारी अमले के लिए और स्कूली बच्चों के लिए भी। बस, इतना ही समझकर व चल देता है अपने काम पर अर्थात दैनिक मजदूरी, खेती का काम, अपना पुश्तैनी व्यवसाय या फिर कोई छोटी-बड़ी नौकरी (जहाँ अवकाश न हो) पर।

कोई लेना-देना नहीं स्वतंत्रता दिवस के आने या चले जाने से उसका, फिर उसे त्योहार की तरह मनाने का तो उसके जेहन में जरा भी ख्याल नहीं आता। स्कूली बच्चे परीक्षा में उत्तर देने के लिए याद करते हैं 15 अगस्त या 26 जनवरी की तिथियाँ अथवा उन पर निबंध लिखने के लिए कुछ और संबद्ध बातें, जो उनकी समझ से तो जीवन के लिए आवश्यक नहीं होतीं। यहाँ तक कि साक्षर व डिग्रीधारी 'सुशिक्षित' कही जाने वाली नई पीढ़ी भी अपनी शिक्षा के प्रसाद के रूप में रोजगार या नौकरी आदि नहीं मिलने के कारण आजादी के सही मायने नहीं समझ पाती। तो शेष रह जाते हैं वे इने-गिने 'समझदार' लोग और राजनेता, जो आजादी के महत्व और उसकी उपलब्धियों का आज के दिन बखान करते रहते हैं, जबकि वे राजनेता जो सत्तासीन नहीं हैं, आज के दिन भी यही कहते हैं कि आजादी के 60 वर्ष बाद भी जनता के लिए तो कुछ नहीं हुआ।
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- शिवकुमार मिश्र 'रज्जन'



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