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होलिका दहन पर भद्रा और चंद्र ग्रहण का साया, कब मनाएं होली और धुलंडी?

Written By WD Feature Desk
Updated: बुधवार, 28 जनवरी 2026 (17:38 IST)
When is Holi in 2026: होली का त्योहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। परंपरा के अनुसार पूर्णिमा की रात को होलिका का दहन होता है और दूसरे दिन प्रतिपदा के दिन धुलंडी का पर्व मनाया जाता है। इस बार होलिका दहन पर भद्रा और चंद्र ग्रहण का साया भी है। ऐसे में कब करें होलिका दहन और कब मनाएं रंगवाली होली यानी धुलेंडी? चलिए जानते हैं विस्तार से एकदम सटीक जानकारी।
 

कब रहेगी पूर्णिमा तिथि?

पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ- 02 मार्च 2026 को शाम 05:55 बजे से।
पूर्णिमा तिथि समाप्त- 03 मार्च 2026 को शाम 05:07 बजे तक।
 

कब से कब तक रहेगा चंद्र ग्रहण?

दिनांक: 03 मार्च 2026, दिन मंगलवार
समय: दिल्ली टाइम अनुसार शाम 06:26 से 06:46 तक।
सूतक काल: सुबह 09:39 बजे से शाम को 06:46 तक।
 

कब से कब तक रहेगी भद्रा?

भद्रावास: धरती लोक पर।
भद्रा प्रारंभ: 2 मार्च शाम 05:55 पर।
भद्रा पूँछ- 3 मार्च 01:25 एएम से 02:35 एएम।
भद्रा मुख- 3 मार्च 02:35 एएम से 04:30 एएम।
भद्रा समाप्त: 3 मार्च 05:28 एएम।
अर्थात: भद्रा 2 मार्च को शाम 05:55 से अगले दिन यानी 3 मार्च को सुबह 05:28 तक। स्थानीय समय अनुसार 1 से 2 मिनट की घटबढ़ रहती है।
 

3 मार्च को सूर्यास्त और चंद्रोदय का समय:

सूर्यास्त: शाम 06:22 पर।
चंद्रोदय: शाम 06:21 पर।
 

शास्त्रों में होलिका दहन के मुख्य नियम

1. तिथि एवं समय: दहन पूर्णिमा तिथि में सूर्यास्त के बाद (प्रदोष काल) करना चाहिए। सूर्यास्त के बाद के कम से कम तीन मुहूर्तों में पूर्णिमा का होना अनिवार्य है।
2. भद्रा का त्याग: पूर्णिमा के पूर्वार्ध में 'भद्रा' व्याप्त होती है। शास्त्रानुसार भद्रा काल में होलिका दहन और पूजा वर्जित है।
शुभ मुहूर्त का चुनाव (प्राथमिकता के आधार पर):
3. प्रथम विकल्प: भद्रा रहित और प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा तिथि (सर्वश्रेष्ठ)।
4. द्वितीय विकल्प: यदि भद्रा मध्यरात्रि तक हो, तो 'भद्रा मुख' त्याग कर 'भद्रा पूँछ' के समय दहन किया जा सकता है।
5. तृतीय विकल्प: यदि भद्रा पूँछ भी उपलब्ध न हो, तो अत्यंत दुर्लभ स्थिति में प्रदोष काल के पश्चात दहन करने का विधान है।
निष्कर्ष: भद्रा मुक्त प्रदोष काल ही होलिका दहन के लिए सबसे उत्तम और मंगलकारी माना गया है। शास्त्र स्पष्ट कहते हैं- 'भद्रायां द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा' (अर्थात भद्रा में श्रावणी-राखी और फाल्गुनी-होली का दहन नहीं करना चाहिए)।
 
 

2 मार्च को होलिका दहन क्यों?

दिनांक: 2 मार्च 2026 दिन सोमवार
होलिका दहन मुहूर्त: 2 मार्च की शाम 06:19 से रात 08:30 बजे के बीच।
कारण: 2 मार्च को शाम को प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा तिथि में चंद्र ग्रहण नहीं है। इसके बाद अगले दिन शाम को पूर्णिमा समाप्ति के बाद यानी 3 मार्च को या फिर 4 मार्च को उदयतिथि के अनुसार धुलैंडी का पर्व मनाया जा सकता।
 
विशेष नोट: कालनिर्णय और लाला रामस्वरूप पंचांग सहित मध्य भारत के पंचांगों में होलिका दहन की तारीख 2 मार्च 2026 ही बताई गई है, लेकिन ऋषिकेश पंचांग या वाराणसी के पंचांग में 3 तारीख को होलिका दहन मेंशन है। कुछ पंचांग 2 मार्च की भद्रा पूंछ (देर रात) का मुहूर्त देते हैं, इसलिए वे 2 मार्च लिखते हैं परंतु विद्वानों में इसको लेकर मतभेद है।
 

3 मार्च को होलिका दहन क्यों?

दिनांक: 3 मार्च 2026 दिन मंगलवार 
होलिका दहन शुभ मुहूर्त: शाम 06:46 के बाद से 08:50 तक।

क्या कारण है कि 3 मार्च को ही क्यों करें होलिका दहन?

1: भद्रा काल: 3 मार्च की शाम को भद्रा काल का साया होलिका दहन के मुख्य समय प्रदोष काल पर नहीं रहेगा क्योंकि भद्रा 2 की शाम को प्रारंभ होकर 3 की सुबह ही समाप्त हो रही रहै। इसलिए शाम का समय दहन के लिए पूरी तरह सुरक्षित और शुभ है।
 
2. चंद्र ग्रहण: 3 मार्च 2026 को चंद्र ग्रहण का काल शाम 06:46 तक ही रहेगा। इसलिए कुछ ज्योतिषाचार्यों के अनुसार 06:46 को सूतक काल समाप्त होने के बाद ही दहन किया जाना शुभ है।
 
विशेष नोट: 2 मार्च को जैसे ही पूर्णिमा शुरू होगी, उसके साथ ही 'भद्रा' भी शुरू हो जाएगी। इसलिए ज्योतिषाचार्य 3 मार्च की शाम को सूतक काल की समाप्ति के बाद होलिका दहन की सलाह दे रहे हैं। 3 मार्च को पूर्णिमा तिथि 05:07 बजे ही समाप्त हो जाएगी लेकिन 3 मार्च का समर्थन कर रहे ज्योतिषियों का मानना है कि तब भी प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा तिथि रहेगी। ऐसे में होलिका दहन और पूजन करने में कोई हर्ज नहीं है।
 

निष्कर्ष: 

1. होलिका दहन प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा के समय भद्रा रहित समय में किया जाता है और उस दौरान सूतक काल भी नहीं रहना चाहिए क्योंकि होलिका की पूजा होती है इसके बाद दहन होता है। इसलिए अधिकतर ज्योतिषियों की सलाह है कि 3 मार्च को होलिका दहन करें और 4 मार्च को धुलंडी का पर्व मनाएं।
 
2. निर्णय सिंधु और धर्मसिंधु के अनुसार, यदि पहले दिन भद्रा का साया हो और दूसरे दिन पूर्णिमा प्रदोष काल से थोड़ा पहले समाप्त हो रही हो, तो भी दूसरे दिन (भद्रा मुक्त समय) को ही प्राथमिकता दी जाती है। क्योंकि दूसरे दिन का प्रदोष काल भद्रा के दोष से मुक्त है। 
 
3. ग्रहण का सूतक शाम 06:46 पर समाप्त हो जाएगा, जिसके बाद शुद्धिकरण करके होलिका पूजन और दहन करना श्रेष्ठ है। 3 मार्च की शाम को जब दहन होगा, तब प्रतिपदा तिथि लग चुकी होगी, लेकिन होलिका दहन के लिए 'प्रदोष व्यापिनी' समय को दोषमुक्त माना जाता है।
 
4. जनमानस की सुविधा और शुद्धि के लिए, अधिकांश विद्वान 3 मार्च को सूर्यास्त के बाद दहन और 4 मार्च को होली खेलने की सलाह दे रहे हैं। यदि आप पूरी तरह 'भद्रा मुक्त' पूजा करना चाहते हैं, तो 3 मार्च 2026 की शाम ही सबसे उपयुक्त है। पंचांगों में यह अंतर मुख्य रूप से 'भद्रा' की गणना और स्थान विशेष के सूर्यास्त समय के कारण आता है।
 
5. अत: 3 मार्च को होलिका दहन करें और 4 मार्च को धुलंडी का पर्व मनाएं।

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