ऐसे बसा था इंदौर का नंदलालपुरा

मंडलोई दफ्तर (रावला)
सिखों के साहित्य में प्राप्त संदर्भों के अनुसार गुरु नानकदेवजी जब उत्तर भारत से दक्षिण की यात्रा पर निकले तब उज्जैन से दक्षिण की ओर जाते हुए (1499-1500 ई.) में वे में एक इमली के पेड़ के नीचे रुके थे। तब हरसिद्धि और जूनी इंदौर अवश्य आबाद रहे होंगे तभी गुरुजी ने बस्ती के बाहर अपना पड़ाव डाला था। नानकदेव ने जिस इमली के नीचे विश्राम किया था, उसके स्मारक के रूप में उसी स्थान पर 'गुरुद्वारा इमली साहेब (जवाहर मार्ग पर स्थित गुरुद्वारा) का निर्माण किया गया था।

इस गुरुद्वारे में उस इमली के पेड़ का तना सुरक्षित है। कहा जाता है कि छत्रपति शिवाजी जब औरंगजेब की आगरा कैद से भाग निकलने में सफल हो गए तो दक्षिण लौटते वक्त उज्जैन में महाकाल मंदिर के दर्शन करने के पश्चात वे इंदौर में रुके थे। तब यह संपूर्ण क्षेत्र मुगलों के मालवा सूबे का अंग था। इंदौर क्षेत्र कम्पेल के प्रशासनिक मुख्यालय के नियंत्रण में था। वहीं जमींदार परिवार भी निवास करता था।
इतिहास ने करवट ली और मुगल प्रशासन की पकड़ धीरे-धीरे मालवा पर ढीली पड़ती गई। इसका लाभ मराठों ने उठाया और उनके धावे मालवा पर होने लगे। वे अपनी सेना व घोड़ों के लिए खाद्यान्न प्राप्त करने हेतु नर्मदा पार कर इंदौर-उज्जैन तक आने लगे थे। इस प्रकार का पहला धावा जनवरी 1703 में हुआ था जिसमें मराठे उज्जैन तक जा पहुंचे थे। इन मराठों से व्यापार करने हेतु कम्पेल के जमींदार 1715 में इंदौर में आन बसे।
इंदौर में इस परिवार के मुखिया श्री नंदलाल चौधरी ने अगले ही वर्ष (1716 ई.) व्यापार इत्यादि के लिए नंदलालपुरा नामक नई बस्ती की स्थापना की। इस क्षेत्र को व्यापारिक केंद्र बनाने के लिए श्री नंदलाल चौधरी ने मुगल अधिकारियों से अनुरोध किया कि इस स्थान पर लाई-ले जाने वाली वस्तुओं को करमुक्त रखा जाए। इस अनुरोध को स्वीकारते हुए मुगलों की ओर से उन्हें एक सनद प्रदान की गई, जो इस प्रकार है- 'कस्बा इंदौर के वर्तमान और भावी अहलकारों और कारकूनों को मालूम हो कि सूबा मालवा सरकार उज्जैन कस्बा इंदौर के नंदलाल चौधरी ने उस कस्बे में अपने नाम से 'नदलालपुरा' नाम एक नयापुरा बसाया है और उस नए पुरे में सायर आदि करों से छूट दिए जाने संबंधी (प्रार्थनापत्र) आया है।

अतएव वहां के व्यापारी व काम-धंधे वाले लोग सुखपूर्वक वहां बसकर व्यापार-धंधा बढ़ाएंगे जिससे आगे चलकर यहां लोगों की बस्ती बढ़ेगी। सो अब तुम भी उन पर सायर (चुंगीकर) वगैरा किसी प्रकार का कोई कर नहीं लगाओगे। इस बारे में तुम्हें विशेष ताकीद की जाती है। ता. 19 रवी-उल-अव्वल सन् 5 जुलूसी (शनिवार, मार्च 3, 1719)। यह सनद मूलत: 'मण्डलोई दफ्तर' (जूनी इंदौर जमींदार सा. का रावला) में संरक्षित है जिसे स्व. महाराजकुमार डॉ. रघुवीरसिंहजी ने खासगी ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित अहिल्या स्मारिका 1779 के अंक में संपादित किया है।



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