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Written By अनिरुद्ध जोशी
Last Modified: शनिवार, 11 मार्च 2023 (18:09 IST)

वर्ष में होती है 12 संक्रांतियां, 5 सबसे महत्वपूर्ण

वर्ष में होती है 12 संक्रांतियां, 5 सबसे महत्वपूर्ण - What is the importance of sankranti
12 Sankranti : सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में गोचर या भ्रमण को संक्रांति कहते हैं। वर्ष में 12 संक्रांतियां होती हैं, जिन्हें मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन के नाम से जाना जाता है। यही सौर मास के महीनों के नाम भी है। संक्रांति का संबंध कृषि, प्रकृति, खगोल और ऋतु परिवर्तन से है।
 
पांच संक्रांति सबसे महत्वपूर्ण : मेष, कर्क, मिथुन, धनु और मकर।
 
1. मेष संक्रांति mesh Sankranti : सूर्य के मेष राशि में प्रवेश को मेष संक्रांति कहते हैं। मेष संक्रांति को वर्ष की शुरुआत का समय भी माना जाता है। यह आमतौर पर अप्रैल माह में होती है। इस दिन को भारत के कई राज्यों में त्योहार के तौर पर मनाया जाता है। जैसे बंगाल में पोहेला बोइशाख, पंजाब में बैसाखी, ओडिशा में पाना संक्रांति आदि। खगोलशास्त्र के अनुसार मेष संक्रांति के दिन सूर्य उत्तरायन की आधी यात्रा पूर्ण कर लेते हैं। सौर-वर्ष के दो भाग हैं- उत्तरायण छह माह का और दक्षिणायन भी छह मास का। सूर्य का मेष राशि में प्रवेश सौरवर्ष या सोलर कैलेंडर का पहला माह है।
 
2. वृषभ संक्रांति vrshabh Sankranti : मेष राशि से वृषभ राशि में सूर्य का संक्रमण वृषभ संक्रांति कहलाता है।  ज्येष्ठ माह की संक्रांति को वृषभ संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। सूर्य देव और भगवान शिव के 'ऋषभरुद्र' स्वरुप की पूजा करनी चाहिए। भारत के विभिन हिस्सों में वृषभ संक्रांति को अलग अलग नामों से जाना जाता है। दक्षिण भारत में वृषभ संक्रांति को वृषभ संक्रमण के रूप में जाना जाता है। तमिल कैलेंडर में इसे वैगसी मासम का आगमन कहा जाता है तो मलयालम कैलेंडर में 'एदाम मसम'। बंगाली कैलेंडर में इसे 'ज्योत्तो मश' का प्रतीक माना जाता है। ओडिशा में वृषभ संक्रांति को 'वृष संक्रांति' के रूप में जाना जाता है। इस समय में दान, मंत्रोच्चारण, पितृ तर्पण और शांति पूजा करवाना भी बहुत अच्छा माना जाता है। इसके अलावा इस समय में गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान करना भी बहुत शुभ माना जाता है।
 
3. मिथुन संक्रांति mithun Sankranti : भारत के पूर्वी और पूर्वोत्तर प्रांतों में मिथुन संक्रांति का खास महत्व है। इस दिन को उक्त क्षेत्रों में माता पृथ्वी के वार्षिक मासिक धर्म चरण के रूप में मनाते हैं, जिसे राजा पारबा या अंबुबाची मेला के नाम से भी जानते हैं।
 
4. कर्क संक्रांति kark Sankranti : सूर्य के कर्क राशि में प्रवेश करने पर कर्क संक्रांति मनाई जाती है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार इसे छह महीने के उत्तरायण काल का अंत माना जाता है। साथ ही इस दिन से दक्षिणायन की शुरूआत होती है, जो मकर संक्रांति में समाप्त होता है।
 
5. सिंह संक्रांति singh Sankranti : भादो मास में जब सूर्यदेव अपनी राशि परिवर्तन करते हैं तो उस संक्रांति को सिंह संक्रांति कहते हैं। इस संक्रांति में घी के सेवन का विशेष महत्व है। चुंकि इस दिन घी का प्रयोग आवश्यक रूप से किया जाता है, अत: सिंह संक्रांति को घी संक्रांति भी कहा जाता है। 
 
6. कन्या संक्रांति kanya Sankranti: कन्या संक्रांति के दिन तर्पण का खास महत्व होता है। इस दिन पितरों की आत्मा की शांति के लिए पूजा-अर्चना कराई जाती है। पूजा के बाद गरीबों को दान देना जरूरी है। कन्या संक्रांति के दिन नदी स्नान करने का खास महत्व होता है। स्नान करके भगवान सूर्यदेव को अर्घ्य देकर उनकी पूजा की जाती है। कन्या संक्रांति पर विश्वकर्मा पूजन भी किया जाता है। पिता, बहन, मौसी, बुआ की सेवा करें। माता दुर्गा की पूजा करें।
7. तुला संक्रांति tula Sankranti: तुला संक्रांति का कर्नाटक में खास महत्व है। वहां इसे ‘तुला संक्रमण’ कहा जाता है। इस दिन ‘तीर्थोद्भव’ या 'तीर्थधव' के नाम से कावेरी के तट पर मेला लगता है, जहां स्नान और दान-पुण्‍य किया जाता है।  इस तुला माह में गणेश चतुर्थी की भी शुरुआत होती है। कार्तिक स्नान प्रारंभ हो जाता है। संक्रांति का सम्बन्ध कृषि, प्रकृति और ऋतु परिवर्तन से भी है। संक्रांति के दिन नदी स्नान और पितृ तर्पण भी किया जाता है। संक्रांति के दिन पूजा करने के बाद गुड़-तिल का प्रसाद बांटाते हैं। पूर्णिमा, चतुर्थी, एकादशी, प्रदोष जैसे व्रतों की तरह संक्रांति के दिन की भी बहुत मान्यता है। मत्स्यपुराण में संक्रांति के व्रत का वर्णन किया गया है।
 
8. वृश्‍चिक संक्रांति vrshchik Sankranti: हर संक्रांति पर भगवान सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है जिससे सूर्य दोष और पितृ दोष समाप्त होता है।  मान्यता के अनुसार वृश्‍चिक संक्रांति के दिन गाय दान करना सबसे बड़ा पुण्य माना गया है। इस दिन श्राद्ध और तर्पण करने से पितरों को मुक्ति मिलती है और पितृ दोष समाप्त होता है।
 
9. धनु संक्रांति dhanu Sankranti: इस संक्रांति को हेमंत ऋतु शुरू होने पर मनाया जाता है। इसी संक्रांति से खरमास भी प्रारंभ होता है। खरमास के लगते ही मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है। मीन संक्रांति होने पर भी खरमास लगता है। सूर्य जब-जब गुरु की राशि यानी धनु राशि में रहता है तब तक खरमास माना जाता है। इस समय मांगलिक कार्य वर्जित रहते हैं। खरमास के प्रतिनिधि आराध्य देव भगवान विष्णु हैं। इसलिए इस माह के दौरान भगवान विष्णु की पूजा नियमित रूप से करना चाहिए। धनु संक्रांति के दिन भगवान सत्यनारायण की कथा का पाठ किया जाता है। भूटान और नेपाल में इस दिन जंगली आलू जिसे तारुल के नाम से जाना जाता है, उसे खाने का रिवाज है। जिस दिन से ऋतु की शुरुआत होती है उसकी पहली तारीख को लोग इस संक्रांति को बड़े ही धूम-धाम से मनाते हैं।
 
10. मकर संक्रांति makar Sankranti: मकर संक्रांति के समय सूर्य उत्तरायण की पूर्ण गति पर होता है। हलांकि सूर्य तो पहले से ही उत्तरायण हो चुका होता है। यह भारत में मनाया जाने वाला एक प्रमुख पर्व है। कहीं-कहीं पर मकर संक्रांति को उत्तरायण भी कहते हैं। 14 या 15 जनवरी को यह पर्व मनाया जाता है।
 
11. कुंभ संक्रांति kumbh Sankranti: सूर्य के कुंभ राशि में प्रवेश को कुंभ संक्रांति कहते हैं। कुंभ संक्रांति में ही विश्‍वप्रसिद्ध कुंभ मेले का संगम पर आयोजन होता है। इस दिन स्नान, दान और यम एवं सूर्यपूजा का खासा महत्व होता है। मान्‍यता है कि इस दिन गंगा नदी में स्‍नान करने से मोक्ष की प्राप्‍ति होती है। इस दिन सुख-समृद्धि पाने के लिए मां गंगा का ध्‍यान करें। अगर आप कुंभ संक्रांति के अवसर पर गंगा नदी में स्‍नान नहीं कर सकते हैं तो आप यमुना, गोदावरी या अन्‍य किसी भी पवित्र नदी में स्‍नान कर पुण्‍य की प्राप्‍ति कर सकते हैं।
 
12. मीन संक्रांति Meen kumbh Sankranti: जिस तरह चंद्रवर्ष के अनुसार फाल्गुन माह वर्ष का आखिरी माह है उसी तरह सौरवर्ष के अनुसार मीन संक्रांति आखिरी माह की संक्रांति होती है। मीन संक्रांति से खरमास प्रारंभ हो जाता है। खरमास के लगते ही मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है। सूर्यदेव का जब-जब गुरु की राशि धनु एवं मीन में परिभ्रमण होता है या धनु व मीन संक्रांति होती है तो वह मलमास कहलाती है। ऐसे में सभी तरह के मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं।  इस माह में अपने अराध्य देव की अराधना करें। सूर्यदेव को अर्घ्य दें। तिल, वस्त्र और अनाज का दान करें। गाय को चारा खिलाएं। गंगा, यमुना आदि पवित्र नदियों में स्नान करें। बृहस्पति का उपवास करें और उपाय भी करें। गुरुवार को मंदिर में पीली वस्तुएं दान करें।
 
ये बारह संक्रान्तियां सात प्रकार की, सात नामों वाली हैं, जो किसी सप्ताह के दिन या किसी विशिष्ट नक्षत्र के सम्मिलन के आधार पर उल्लिखित हैं; वे ये हैं- मन्दा, मन्दाकिनी, ध्वांक्षी, घोरा, महोदरी, राक्षसी एवं मिश्रिता। घोरा रविवार, मेष या कर्क या मकर संक्रान्ति को, ध्वांक्षी सोमवार को, महोदरी मंगल को, मन्दाकिनी बुध को, मन्दा बृहस्पति को, मिश्रिता शुक्र को एवं राक्षसी शनि को होती है। कोई संक्रान्ति यथा मेष या कर्क आदि क्रम से मन्दा, मन्दाकिनी, ध्वांक्षी, घोरा, महोदरी, राक्षसी, मिश्रित कही जाती है, यदि वह क्रम से ध्रुव, मृदु, क्षिप्र, उग्र, चर, क्रूर या मिश्रित नक्षत्र से युक्त हों।
 
27 या 28 नक्षत्र को सात भागों में विभाजित हैं- ध्रुव (या स्थिर)- उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपदा, रोहिणी, मृदु- अनुराधा, चित्रा, रेवती, मृगशीर्ष, क्षिप्र (या लघु)- हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित, उग्र- पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपदा, भरणी, मघा, चर- पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, स्वाति, शतभिषक क्रूर (या तीक्ष्ण)- मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, मिश्रित (या मृदुतीक्ष्ण या साधारण)- कृत्तिका, विशाखा। उक्त वार या नक्षत्रों से पता चलता है कि इस बार की संक्रांति कैसी रहेगी।