लघुकथा - मेरा घर ?

 House

हूं ..अ !
है ये !
...नहीं बाबा नहीं, कोई घर नहीं है मेरा ! जब तक मेरी शादी नहीं हुई थी, तब तक भी यह कहने को ही मेरा घर था। अब यह आपका और भाई का घर है ...और वो घर, जहां आपने मेरी शादी की ...वो भी नहीं है मेरा घर !
जब उनके मन में आए, कह देते हैं - निकल जा मेरे घर से।
चली जा अपने बाप के घर और यहां आती हूं तो लगता ही नहीं कि अब इस घर पर भी मेरा कोई अधिकार है।
मेहमान सी आती हूं, मन में अपराध बोध लिए।
नहीं बाबा, नहीं !
मत दो मुझे ये झूठी दिलासा कि ये घर, मेरा घर है !
सच तो ये है, बाबा - एक ब्याहता का, एक औरत का कोई घर नहीं होता।
वह तो केवल सुबह से रात तक बस सबके हुक्म की गुलाम होती है।
अपनी खुशियों को दफन कर सबकी ख्वाहिश पूरी करने वाली।
जरा कमी हुई नहीं कि सुना दिया जाता है - ये तेरा घर नहीं !
कहते ...कहते ..राधा फिर अचेत हो गई। बाबा उसके पास अस्पताल में बैठे डबडबाई आंखों से उसे देखते रहे।

कब सोचा था उन्होंने कि अपनी जान से प्यारी बेटी की ससुराल में इतनी दुर्गति होगी।
एक खुशहाल जीवन के लिए अपनी सामर्थ्य के अनुरूप सब कुछ तो दिया था उन्होंने अपनी लाड़ली को।

...पर बात-बात पर मारपीट और उलाहनों से तंग आकर, मायके-ससुराल के बीच पेंडुलम बनी उनकी गुड़िया ने आज उन्हें ये सोचने पर विवश कर दिया था कि क्या वाकई एक स्त्री का अपना कोई घर नहीं होता ?
बस घर होने का उसे झूठा एहसास भर होता है !
वे ये सोच ही रहे थे कि तभी अर्धचेतन अवस्था में राधा ने अपने बाबा का हाथ कसकर थाम लिया और कहा- बाबा ! अब मत देना किसी को दहेज में कोई सामान।
यदि उनकी हैसियत नहीं तो क्यों करते हैं अपने बेटों की शादी ?
ओ... हां ! बेटी के पिता को तो देना ही होता है न। यही जग की रीत है न !
...तो ...बाबा ! बस बेटी के नाम से एक घर खरीद कर देना। जहां वो विषम स्थिति में अपने स्वाभिमान को बरकरार रखते हुए रह तो सके, संघर्ष से अपने पैरों पर खड़ी तो हो सके। किसी की भी मोहताज तो न बने। कोई ये तो न कह सके - ये तेरा घर नहीं।
....और ...और ... मेरी यह बात दूर-दूर तक पहुंचा देना, बाबा !
अब बेटी की शादी में दहेज का कोई सामान नहीं, उसे उसका अपना घर देना ...बाबा।
छोटा सा उसका अपना घर।
...कहते कहते राधा फिर अचेत हो गई।
बाबा, मन ही मन प्रार्थना करते हुए बुदबुदाए - हां, मेरी लाड़ो।
ठीक ही तो कहती है तू- वाकई औरत का कोई घर नहीं होता।


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