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हिन्दी दिवस पर लघुकथा : अपनी हिन्दी कैसे बचाएं?

शुक्रवार,सितम्बर 13, 2019
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बिटिया, दामादजी कार लाए हैं क्या? पापा की आंखों में मुझे देख आशा के जो दीये जल उठते थे, उसे देख मुझे खौफ होता था।
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नीलोफर अपने अम्मी अब्बू को परेशान नहीं करना चाहती। मुस्तफा के पास तो अपना हथियार था ही,,बोल दिया- तलाक तलाक तलाक.. . मासूम मुरझाई नीलोफर शरीर पर चोट के निशान लिए आ गई अपने घर।
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वो प्रेम कली और भंवरे का प्रेम नहीं था, नदी और सागर का था- सदा अनुरक्त, एकनिष्ठ, समर्पित। नेहा और प्रणय मानों एक-दूजे के लिए ही बने थे। कॉलेज में जन्मा प्रेम अब विवाह की दहलीज पर आ पहुंचा था।
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मेरा घर है ये ! ...नहीं बाबा नहीं, कोई घर नहीं है मेरा ! जब तक मेरी शादी नहीं हुई थी, तब तक भी यह कहने को ही मेरा घर था। अब यह आपका और भाई का घर है ...और वो घर,
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लघुकथा : मौकापरस्त मोहरे!

गुरुवार,दिसंबर 20, 2018
वह तो रोज की तरह ही नींद से जागा था, लेकिन देखा कि उसके द्वारा रात में बिछाए गए शतरंज के सारे मोहरे सवेरे उजाला होते ही अपने आप चल रहे हैं।
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दीपावली का पर्व ज्यों-ज्यों पास आ रहा था, शोभा के चेहरे की आभा अपनी कांति खोती जा रही थी जिसे वह चाहकर भी छुपा नहीं पाती थी। उसे यह चिंता सता रही थी कि अगर दीपावली
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एक बड़ी रेल दुर्घटना में वह भी मारा गया था। पटरियों से उठा कर उसकी लाश को एक चादर में समेट दिया गया। पास ही रखे हाथ-पैरों के जोड़े को भी उसी चादर में डाल दिया गया। दो मिनट बाद लाश बोली,
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'नवरात्रि पर्व' के चलते ग्रामीण अंचल के कुछ व्यक्तियों से रमेश की मुलाकात हुई। वे 'कहीं' सलाह लेने आए थे। मुखिया थे किसी गांव के...
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लघुकथा : सत्यव्रत

बुधवार,अक्टूबर 17, 2018
'व्रत ने पवित्र कर दिया।' मानस के हृदय से आवाज आई। कठिन व्रत के बाद नवरात्रि के अंतिम दिन स्नान आदि कर आईने के समक्ष स्वयं का विश्लेषण कर रहा वह हल्का और शांत महसूस कर रहा था।
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#MeToo पर लघुकथा : सीढ़ियां

शुक्रवार,अक्टूबर 12, 2018
"इन लम्पट पुरुषों का चेहरा तो उजागर होना ही चाहिए....!" "और क्या... कमीनों की करतूतों के बारे में सबको पता तो चले..."
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मैं वह भाषा हूं, जिसमें तुम जीवन साज पे संगत देते मैं वह भाषा हूं, जिसमें तुम, भाव नदी का अमृत पीते मैं वह भाषा हूं, जिसमें तुमने बचपन खेला और बढ़े हूं वह भाषा, जिसमें तुमने यौवन, प्रीत के पाठ पढ़े...
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शिक्षक रामप्रसाद के हाथों में रवि की शादी का आमंत्रण था। रवि, रामप्रसाद का होनहार छात्र था, जो अब पढ़-लिखकर एक प्रतिष्ठित डॉक्टर बन गया था।
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अनिकेतजी रोज की तरह सुबह की सैर से लौटे। अखबार को गेट से निकाला व तारीख पर नजर पड़ते ही आंखों में जो नमी उतरी, उसने हर अक्षर को धुंधला दिया।
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लघुकथा : दशा

शुक्रवार,अगस्त 3, 2018
वह आनंदित मन से मोटर साइकिल चलाता हुआ जा रहा था कि ठीक आगे चल रही सिटी बस से धुंआ निकला और उसके चेहरे से टकराया
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आज न सुबह उठते ही स्नेहल के लिए टिफिन बनाने की जल्दी है, न ही सलिल को नाश्ता दे उनका टिफिन भेजना है, न ही सब कुछ जल्दी-जल्दी निपटाकर काम पर पहुंचने की मैराथन में दौड़ना है। आज रविवार जो है।
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’मां, पता है आज मैंने आपके जैसा हलवा बनाना सीख लिया।’ बेटे ने चम्मच भर गरमागरम हलवा मुंह में डालते हुए कहा।
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विमल बहुत परेशान था। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वो इस परिस्थिति से कैसे निबटे। वो अपनी मां को बहुत चाहता था किंतु उसकी पत्नी और बच्चे उसकी मां से बहुत दूर भागते थे
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एक दिन हरे और भगवे रंग में विवाद छिड़ गया। हरा रंग गुर्राकर बोला-
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वृद्धाश्रम के दरवाजे से बाहर निकलते ही उसे किसी कमी का अहसास हुआ, उसने दोनों हाथों से अपने चेहरे को टटोला और फिर पीछे पलटकर खोजी आंखों से वृद्धाश्रम के अंदर पड़ताल करने लगा।
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