होली की सुबह थी। आंगन में धूप ऐसे उतर आई थी मानो आकाश ने स्वयं गुलाल ओढ़ लिया हो। गली के बच्चे रंग और पिचकारियों के साथ दौड़ रहे थे, पर शर्मा जी के घर का दरवाज़ा अब भी आधा बंद था।
अंदर, सत्तर वर्षीया सावित्री देवी चुपचाप चौकी पर बैठी थीं। सामने पीतल की थाली में सूखा गुलाल रखा था, पर उनकी आंखों में कोई रंग नहीं था। पिछले वर्ष इसी दिन उनके पति चले गए थे। तब से होली उनके लिए शोर भर रह गई थी, उत्सव नहीं।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
'दादी, रंग नहीं लगाएंगी क्या?' पड़ोस की आठ वर्ष की चंचल ने झांकते हुए पूछा।
सावित्री देवी ने फीकी मुस्कान से कहा, 'अब हमारी होली कैसी, बिटिया? जिनके साथ रंग खेलते थे, वे ही चले गए।'
चंचल कुछ पल चुप रही, फिर धीरे से बोली, 'दादी, मेरी मम्मी कहती हैं कि जो लोग हमें बहुत प्यार करते हैं, वे रंग बनकर हमारे पास ही रहते हैं। अगर आप रंग नहीं लगाएंगी तो उन्हें बुरा लगेगा।'
सावित्री देवी की पलकें भीग गईं। 'सच?' उन्होंने धीमे स्वर में पूछा।
'हां,' चंचल ने थाली से थोड़ा गुलाल उठाया, ' दादाजी भी तो चाहते होंगे कि आप मुस्कुराएं।'
उस मासूम स्पर्श ने जैसे भीतर जमी बरसों की धूल हटा दी। सावित्री देवी ने कांपते हाथों से चंचल के गाल पर हल्का सा रंग लगा दिया।
'यह तेरे लिए नहीं,' उन्होंने भर्राए स्वर में कहा, 'यह उस स्मृति के लिए है जो कभी फीकी नहीं पड़ती।'
चंचल खिलखिला उठी। 'तो फिर आप बाहर चलिए। सबको रंग लगाइए। आप तो हमारी सबसे प्यारी दादी हैं।'
कुछ देर बाद वही सावित्री देवी आंगन में थीं। उनके सफेद बालों पर गुलाबी आभा थी। चेहरे पर संकोच था, पर भीतर कहीं एक नई उजास भी थी। उन्होंने पड़ोस की बहू को गले लगाया, बच्चों को आशीर्वाद दिया।
गली में रंग उड़ रहे थे, पर सावित्री देवी के भीतर जो रंग जगा था, वह सबसे गहरा था स्मृति का, स्वीकार का और जीवन को फिर से गले लगाने का।
सांझ को जब सब थककर लौटे, सावित्री देवी ने दीपक जलाया और आकाश की ओर देखा।
'देखिए,' उन्होंने मन ही मन कहा, 'मैंने आज रंगों से डरना छोड़ दिया। आप सही थे, जीवन हर बार नया रंग मांगता है।'
उस दिन होली ने केवल गाल नहीं रंगे; एक शोकाकुल हृदय को फिर से जीने की प्रेरणा दे दी।
(वेबदुनिया पर दिए किसी भी कंटेट के प्रकाशन के लिए लेखक/वेबदुनिया की अनुमति/स्वीकृति आवश्यक है, इसके बिना रचनाओं/लेखों का उपयोग वर्जित है...)