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लघुकथा : पुण्य लाभ

Updated: बुधवार, 7 अक्टूबर 2020 (15:05 IST)
काकी आज बहुत खिन्न नजर आ रही थी। पड़ोस में रहने वाली अनुष्का से रहा नहीं गया। वह पूछ बैठी- काकी क्या हुआ? आपको कभी ऐसे बैचेन और नाराज नहीं देखा। 
 
काकी ने कहा- देख बहू, अधिकमास चल रहा है। बहुत सालों के बाद दान-पुण्य का शुभ मुहूर्त आया है। पर इस महामारी में कुछ नहीं कर पा रहीं हूं। न देव-दर्शन, न सत्संग और तो और बिटिया और जमाई भी इतनी दूर कि उन्हें भी नहीं बुला सकती।
 
अनुष्का ने कहा- काकी, मैंने और सहेलियों ने मिलकर अधिकमास में जो क्वारंटाइन हुए उनको खाना पहुंचाने की जिम्मेदारी हैं। जो बुजुर्ग अकेले रह रहे हैं। उनको आवश्यकता अनुसार दवाइयां, फल और जरूरत का सामान पहुंचा रहे हैं। हम सभी के घरों में काम करने बाई आती है, इनके बच्चों की ऑनलाइन क्लासेस चल रही है, हमने इनके मोबाइल में नेट सुविधा उपलब्ध करवा दी। कापियां, पेन और अन्य सामग्री दी। इस तरह शिक्षा के पुण्य काम में योगदान दे रहे हैं। 
 
काकी समय और आवश्यकता को देखते हुए आप यह काम कर के भी पुण्य लाभ ले सकती है। हां, अनुष्का तुमने सही रास्ता दिखाया। आज से मैं इस पर अमल करती हूं। मैं अपनी बेटी को भी फोन कर उसे अपने एरिया में इस तरह मदद करने के लिए बोलती हूं।
लेखक के बारे में
आरती चित्तौडा

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