लोकगंध में पगी कहानी - मेरी बई, बरत और बारता

Nari
Women
कहावत तो की है, पर हमारी बई के तो सात वार में नौ बरत आते थे। कभी सोमवार के साथ ग्यारस आ जाती तो कभी गुरुवार के साथ प्रदोष। ये भी सही है कि उनके लिए बरत किसी त्योहार से कम न होते। बई और बरत का संबंध शाख-पात सा था। गोया दोनों एक-दूजे के लिए बने हों।

मुझे तो शादी के बाद ही अधिकांश व्रतों के नाम पता चले। मेरे पास जितने रंग की साड़ियां थीं, उससे कहीं अधिक तरह के करती थी हमारी बई। बई के आधे से ज्यादा बरत एकासना के होते। बाकी व्रतों में वे रोज की तरह दो के बजाय तीन कप चाय पी लेतीं। कभी बस दो राजगिरे के लड्डू खा लेती या बहुत हुआ तो दो केले।

उन्हें बरत से कहीं ज्यादा उत्साह रहता था बरत की बारता केने का। हर व्रत की कहानी उन्हें मुंह जबानी याद थी। घर-संसार के कामों से निवृत्ति ले चुकी बई के कामों की सूची में सिर्फ दो ही काम थे, नहाना और पूजा करना। ये दोनों हो गए तो बई निश्चिंत और इनमें देर हुई कि बई का जीव ऊपर नीचे होने लगता। सुबह नहाकर मैं रसोई में जाती और बई नहाकर, सोला (साफ धुली साड़ी) पहनकर पूजा घर में। वे सोला (पवित्रता) बहुत मानती थीं।


नहाकर सोला पहनने से लेकर पूजा होना तक वे किसी चीज को नहीं छूतीं। गलती से छू लिया तो कहतीं, 'जाने कसे बेभूल में चोटी गई। अबार न्हई लूं।' और तुरंत दोबारा नहातीं। कभी शंका होने पर पूछतीं, 'हूं चोटी थी कई?' और हम साफ मना कर देते, 'नी बई तम तो परदा से नरा दूर था या बई यो पाटलो तो धोई ने ज धरयो थो।' बई मान जाती पर मन समझाने को कहतीं, 'वा जदे गोमातिर (गोमूत्र) छींटी दे। 'पूजा घर में छूआछूत की कोई शंका होने पर वे गंगा जल छींटतीं।

मेरा रसोई का काम परवान चढ़ता नहीं कि बई आवाज देकर बुला लेतीं। मैं माथा ढांकते हुए झुककर उनकी बात सुनूं तब तक तो वह चावल के चार दाने मेरी हथेली में दबाते हुए बारता सुनने बिठा लेतीं। फिर मेरा काम खोटी होय तो होय।

बई बड़े धीरज से मीठी मालवी में बारता कहतीं और मैं हुंकारा देते हुए सुनती। बारता के अंत में वे जैसे ही कहती 'गजानन गणपति ने जसे उनकी सुणी,वसे सबकी सुणे।' और मैं हाथ के चावल प्रभु चरणों में चढ़ाने को उद्यत होती कि वे टोकतीं, 'अबार ठेर। आरती करी लां।' धीरज से आरती गातीं, फिर पुष्पांजलि और प्रदक्षिणा के मंत्र शुद्ध संस्कृत में बोलती तब कहीं जाकर मुझे छुट्टी मिलती, इस आदेश के साथ कि 'यो तरभाना को पानी तुलसा जी में चढ़ई दे, न यो लोटा को उनी तिरवेनी में।' बई को पूजा के सारे मंत्र, सभी देवों के अष्टक कंठस्थ थे। शुद्ध उच्चारण और सही क्रम। कहती थीं, बचपन में दादा बा से सुनकर याद हो गए थे। किताब उठाकर तो आज तक कोई मंत्र नहीं पढ़ा।

स्वभाव से हम दोनों विपरीत ध्रुव पर थे। बई जितनी धीरजवाली, मैं उतनी ही उतावली। बई ने भूख को बस में कर रखा था और मुझे भूख ने। दस बजते न बजते मेरे पेट में चूहे कूदते और बई के एकासना में साथ देने के लिए कम से कम एक बजे तक रुकना पड़ता। पर बई ने कभी मुझ पर भूखे रहने के लिए जोर नहीं डाला। अक्सर कहती, 'दनभर फिरकी सरकी घूमी ने काम करे तो खाना में कमी मत करया कर। जद भूख लगे जद खई लिया कर। आखो घर भरयो हे।' बस उनके ये बोल ही मेरी इच्छा को तृप्ति में बदल देते और मैं एक बजे तक रुकी रहती।

कितने ही पकवान बने हों, एकासने में भी बई दो रोटी ही खाती। कहती, 'जित्तो पचे, उत्तो ज खाणू। पर थाली भरीपूरी पसंद थी उन्हें। दाल, सब्जी के साथ जरा सा जीरावन, कच्ची पत्तेदार भाजी, घी, गुड़ उन्हें आनंद से भर देता।' मुझे भी खाने में जल्दबाजी नहीं करने देती। बैठते ही कहती, 'निरात से खाजे।'

सबकी सेहत का ध्यान रखते हुए मैं दाल, दो सब्जियां, चटनी, सलाद बनाती और बई स्वाद लेकर, तारीफ करते हुए खाती। मीठा पसंद था पर थोड़ा ही खातीं।

एकादशी बई अकेली करती थी, पर साबूदाने की खिचड़ी पूरे परिवार के लिए बनती थी। जो सबकी फरमाइश पर वे ही बनाती थीं। अनूठा स्वाद था उनके हाथ की खिचड़ी में। लाख कोशिशों के बावजूद मैं वो स्वाद आज तक न ला सकी।

साल भर में वो तरह-तरह के उपवास करतीं। पोस में अलोने (बिना नमक के) सफेद दितवार करती, केवल दूध चावल खाकर तो कभी पीले गुरूवार करती। सावन में कुछ नियम लेती तो कार्तिक में कुछ और। दोनों नवरात्रि तो बहुत नियम धरम से करती। पहले दो दिन लौंग के, फिर तीन दिन केले के और अष्टमी तक एक कप चाय पर। इतने कठिन व्रत के बाद भी उनके चेहरे पर मां दुर्गा सी चमक दिखती।

बई ने बताया था कि एक बार दा साब की तबियत बहुत खराब हो गई थी, कोई इलाज असर नहीं कर रहा था। तब किसी के सुझाने पर उन्होंने मांगे मंगलवार किए थे। इसमें मंगलवार को किसी परिचित के घर भोजन के बाद अचानक जाना और जो बचा हो वह खाना होता है। एक बार तो उन्हें सिर्फ आधी रोटी ही मिली थी। पर पांचवे मंगलवार तक दा साब को बहुत आराम हो गया था, बताते हुए उनके चेहरे की चमक देखने लायक थी।

मेरी शादी होने तक तो वे दो बार संकट सोमवार कर चुकी थीं, बेलपत्र और मिश्री के। मेरे सामने तो उन्होंने चूरमे के किए। खाना बनने के बाद मैं चूल्हा, रसोई धो देती। बई खुद सोले (साफ धुले वस्त्र) में चूरमा बनाती। तब मैं भी तीसरे पहर कथा सुनकर शाम को ही खाना खाती। संकट सोमवार कर उन्होंने जिंदगी के हर संकट को टाला।

बई को गणपतिजी का इष्ट था। चतुर्थी को तो इक्कीस बार का पाठ करतीं। शाम तक मालवी में गणपति गाती रहतीं। चालो गजानन जोशी कां चालां से लेकर तम तो बेगा-बेगा चालो हो गणेश तक गीतों की मधुर धुन हमारे कानों में रस घोलती रहती। चतुर्थी की बारता दिन में कहतीं और रात को चांद देखकर व्रत खोलतीं।

बई को जितना भरोसा बरत में था उतना ही दान-पुण्य में। सब दिन के दान भी तय थे। मुझे सब समझा दिया था, कब सीदा देना है, कब सवा सेर और कब फल-मिठाई।

एक बार तो अधिक मास में बई ने सवा लाख दान का संकल्प लिया। इसमें अधिक मास में प्रतिदिन कोई चीज गिनकर दान देना होती है। पूरा मास खतम होने तक गिनती सवा लाख हो जाना चाहिए। बई सामान बुलवाकर पूरे घर को गिनती करने बैठा देतीं। किसी दिन दो हजार चने दान करती, किसी दिन पांच सौ भिंडी तो किसी दिन हजार अंगूर। हमने मटर, मखाने, बताशे, बादाम, खारीक से लेकर गेहूं, मक्का तक गिनकर बई को दिए। मुझे याद है उन्होंने चावल में रखकर चांदी और चने की दाल में रखकर सोना भी सुहागन को दान दिया था। बई दान मंदिर में न देकर किसी भी जरूरतमंद को करती।

केल्या पूनम, दसामाता, हाथी बरत, जया पार्वती, गणगौर, अबोल्या, उब छट, बछ बारस जैसे कई व्रत की कथाएं तो मैंने पहली बार बई से ही सुनी। बई का हर बरत श्रद्धा भक्ति से भरा रहता। होंठ भी दिन भर भजन गुनगुनाने में मगन रहते। सीधी पल्ले की सूती साड़ी और ललाट तक ढंका सिर, लंबोतरे चेहरे पर कुमकुम लगा माथा मैं गौर से देखती तो बई में ही दैवीय दर्शन का लाभ ले लेती। सच, बई में ही मैंने राधा भी देखी है और गौरा भी। दुर्गा भी देखी है गायत्री भी।

उम्र बढ़ने के साथ बई की याददाश्त प्रभावित हुई थी। वे एक बरत की बारता कहते-कहते दूसरे की सुनाने लग जातीं। मैं समझ जाती पर बई को तब याद आती जब आधे घंटे की बारता को सुनाते डेढ़ घंटा हो जाता।

इसे सरल करने के लिए मैं व्रत कथाओं की एक पुस्तक ले आई। सोचा, इसमें से फटाफट पढ़ दिया करूंगी। पर बई ने उलट-पलटकर देखा और उस पुस्तक को सिरे से खारिज कर दिया। 'या तो कजनकसी हे। इकी बारता असल नी हे।' मैंने पढ़कर देखा, बई की बात सही थी। उसकी कथाओं में जरा भी रस न था।
बहुत देर भूखे रहने से बई को एसिडिटी रहने लगी तब सबने उन्हें व्रत न करने की सलाह देना शुरू कर दिया। जब भी तकलीफ होती, सब अपने-अपने तरीके से समझाते। मैंने कहा, 'बई उजमण (उद्यापन) कर दो सब बरत का।'

बई कुछ देर सोचती रही फिर मना कर दिया।' असो नी होय। इनको उजमण तो म्हारा साते ज होयगो।'

परिवार में किसी ने सलाह दी, 'बई से सारे बरत तुम ले लो। घर की बहू व्रत ले ले तो सास व्रत छोड़ सकती है।'
बई के कानों ने भी दूर की बात पास से सुन ली। एक दिन बारता सुनाने के बाद बहुत भावुक होकर बोली,' हूं थारी सेवा को कई मोल नी दी सकी। म्हारा कने कई हेज नी। पण हां, परधाम जाऊंगा जदे म्हार बरत म्हारा साते न उनका पुण्य परताप थारा साते। योज आसीरवाद रेगो।'

जीवन भर कमाए पुण्य एक क्षण में बई ने मेरे खाते में डाल दिए।

मैंने सोचा...सौ बार सोचा और पाया कि बई के बाद मैं बई जैसे बरत नहीं कर पाऊंगी। भूख-प्यास सह भी लूं तो वैसी श्रद्धा भक्ति कहां से लाऊंगी ? श्रद्धा भक्ति ले भी आऊं तो देव पूजने का धीरज कहां से लाऊंगी ? धीरज भी ले आऊं तो ... तो ...मुझे बारता कौन सुनाएगा ?



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