- लेखिका: सुखी देवी दासी (सुनीता)
जब भगवान ने यह दुनिया बनाई, तो उन्होंने अपनी सबसे प्यारी और सबसे ताकतवर रचना 'स्त्री' को चुना। कितना आश्चर्यजनक है कि खुद भगवान नारायण ने स्त्री की महिमा को संसार के सामने प्रकट करने के लिए उन्हें अपनी लीलाओं में सर्वोच्च स्थान दिया; प्रभु ने उन्हें इतना महत्वपूर्ण समझा कि उनके बिना वे अपनी लीलाएं भी पूरी नहीं कर पाए। नारी भगवान का वह अनमोल उपहार है जो मां बनकर निस्वार्थ प्रेम देती है, बेटी बनकर घर में खुशियां लाती है, बहन बनकर साए की तरह साथ खड़ी रहती है और सखी बनकर उम्र भर हाथ थामे रखती है।
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महिला दिवस पर आइए जानते हैं उन 8 बड़ी बातों को, जो हमारे शास्त्रों में नारी के सम्मान के लिए कही गई हैं।
शास्त्रों के 8 स्वर्णिम प्रमाण
1. ईश्वर का आधा स्वरूप (श्रीमद्भागवतम् 3.12.52)
श्लोक: तयोस्तु यत् समुत्पन्नं मिथुनं द्विजसत्तम | ब्रह्मा तदभिधायाह मनु: स्वायम्भुव: स्वराट् ||
अर्थ: ब्रह्मा जी के शरीर से जो स्त्री-पुरुष का जोड़ा उत्पन्न हुआ, उनमें से पुरुष 'स्वायम्भुव मनु' कहलाए और स्त्री 'शतरूपा' हुई।
विवेक: स्त्री और पुरुष एक ही सत्ता के दो बराबर हिस्से हैं। सृष्टि को गति देने के लिए नारी का अस्तित्व पुरुष के समान ही अनिवार्य है।
2. ह्लादिनी शक्ति (चैतन्य चरितामृत, आदि 4.96)
श्लोक: राधा पूर्ण शक्ति, कृष्ण पूर्ण शक्तिमान | दुइ वस्तु भेद नाहि, शास्त्र-परमाण ||
अर्थ: श्री राधा पूर्ण शक्ति हैं और श्री कृष्ण पूर्ण शक्तिमान हैं। शास्त्रों के प्रमाण अनुसार इन दोनों में कोई वास्तविक भेद नहीं है।
विवेक: बिना शक्ति के 'शक्तिमान' भी अपनी लीला प्रकट नहीं कर सकते। ईश्वर का सारा आनंद और प्रेम नारी शक्ति में ही समाया है।
3. राष्ट्र का नेतृत्व (ऋग्वेद 10.125.3)
श्लोक: अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्।
अर्थ: मैं (नारी शक्ति) ही पूरे राष्ट्र की शासिका हूं, जो सभी को सुख-संपत्ति प्रदान करती है और ज्ञान में सर्वप्रथम है।
विवेक: शास्त्र स्पष्ट कहते हैं कि राजनीति और राष्ट्र के नेतृत्व का सामर्थ्य नारी में जन्मजात है। वह समाज को सही दिशा देने वाली अधिष्ठात्री है।
4. साक्षात् देवी स्वरूप (मार्कण्डेय पुराण 11.6)
श्लोक: विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु।
अर्थ: हे देवि! संसार की समस्त विद्याएं और जगत की समस्त स्त्रियाँ आपके ही स्वरूप के भिन्न-भिन्न रूप हैं।
विवेक: हर स्त्री उस 'आदि शक्ति' का प्रतिबिंब है। स्त्री का सम्मान करना साक्षात् उस विद्या और शक्ति का सम्मान है जो संसार चला रही है।
5. प्राण चेतना (देवी भागवत पुराण 9.1.96)
श्लोक: त्वं स्वाहा च स्वधा त्वं च दक्षिणा सर्वधारिणी।
अर्थ: आप ही स्वाहा, स्वधा, दक्षिणा और सभी को धारण करने वाली शक्ति हैं।
विवेक: जैसे शरीर बिना प्राण के जड़ है, वैसे ही समाज नारी की ऊर्जा के बिना गतिहीन है। कोई भी शुभ कार्य स्त्री के सहयोग के बिना पूर्ण नहीं होता।
6. सुख-समृद्धि का निवास (मनुस्मृति 3.56)
श्लोक: यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
अर्थ: जहां नारी का पूजन (सम्मान) होता है, वहां देवता रमण करते हैं (अर्थात ईश्वर का वास होता है)।
विवेक: जहां नारी सुरक्षित और खुश है, वहां मानसिक शांति और बरकत अपने आप आती है। नारी का सम्मान ही ईश्वर की सच्ची पूजा है।
7. संकट का अटूट सहारा (वाल्मीकि रामायण, अयोध्या कांड 2.39.29)
श्लोक: न भर्ता न सुतः स्वो न माता न सहायाः। प्रेत्य चेह च नारीणां पतिरेको गतिः सदा॥
अर्थ: संकट और विपत्ति के समय परिवार के लिए नारी ही सबसे बड़ा सहारा और शक्ति बनती है।
8. संस्कारों की जननी (स्कंद पुराण, काशी खंड 4.41)
श्लोक: सर्वावस्थासु नारीणां पूज्यता शास्त्रनिश्चयः।
अर्थ: शास्त्रों का यह निश्चित मत है कि हर अवस्था में नारी सदैव पूजनीय और वंदनीय है।
विवेक: नारी का सम्मान उसके किसी खास 'रिश्ते' के कारण नहीं, बल्कि उसके 'अस्तित्व' के कारण है। वह समाज की नैतिक और सांस्कृतिक रक्षक है।
निष्कर्ष:
ईश्वर ने अपनी लीलाओं से सिद्ध किया है कि नारी का अस्तित्व हमारे जीवन के हर क्षण में अत्यंत महत्वपूर्ण है। चाहे मां, बहन, बेटी या सखी का रूप हो, हमें उनसे मिलने वाली हर सहायता और स्नेह के लिए सदैव उनका ऋणी होना चाहिए। शास्त्रों का भी यही मत है:
"न वै स्त्री न पुमान् क्लीब: शास्त्रतोऽपि विचक्षणैः।"
(श्रीमद्भागवतम् 9.3.10)
भावार्थ: ज्ञानी जनों के अनुसार, आध्यात्मिक स्तर पर आत्मा न स्त्री है, न पुरुष और न ही नपुंसक; किंतु इस संसार के कल्याण और संचालन के लिए नारी का शक्ति स्वरूप ही समस्त मंगल का मूल है।
अतः नारी का सम्मान केवल इसलिए नहीं होना चाहिए कि आधुनिक समाज उन्हें पुरुषों के बराबर मानता है, बल्कि इसलिए क्योंकि उनके त्याग और साक्षात् शक्ति की नींव पर ही हम सब खड़े हैं। कृष्ण की ह्लादिनी शक्ति के रूप में नारी ही इस जगत का वास्तविक आधार है। हमारे लिए हर दिन 'महिला दिवस' होना चाहिए, जहां हम उनकी गरिमा का हृदय से सम्मान करें। उनके बिना हमारा जीवन और यह संसार, दोनों ही अर्थहीन हैं।
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(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)