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Written By WD Feature Desk

अंधेरे में जलती एक अटूट लौ: माता गांधारी देवी का जीवन दर्शन

आंखों पर पट्टी बांधें गांधारी का फोटो
- सुखी देवी दासी (सुनीता)
 
क्या कभी हमने विचार किया है कि प्रकाश के मध्य रहकर भी, स्वयं को जीवनभर के अंधकार में सौंप देना कितनी बड़ी तपस्या है? प्रायः हम महाभारत को युद्ध की दृष्टि से देखते हैं, किंतु इसके केंद्र में माता गांधारी देवी का व्यक्तित्व एक ऐसी मौन क्रांति है, जिसने त्याग की परिभाषा ही परिवर्तित कर दी।
 

एक कठिन विकल्प की आत्मीयता

 
गांधारी देवी का अपनी आंखों पर पट्टी बांधना कोई विवशता नहीं, अपितु एक हृदयस्पर्शी संकल्प था। राजमहलों में पली-बढ़ी उस राजकुमारी ने जब जाना कि उनके जीवनसाथी को संसार का प्रकाश दिखना संभव नहीं, तो उन्होंने उसी क्षण अपनी आंखों की ज्योति का मोह त्याग दिया। यह प्रेम की वह पराकाष्ठा है जहां व्यक्ति दूसरे के दुःख को केवल बांटता नहीं, बल्कि उसे पूर्णतः अपना लेता है। आज के युग में जहां हम अपनी सुख-सुविधाओं के लिए अपनों को त्याग देते हैं, वहां गांधारी देवी का यह दृढ़ निश्चय हमें 'साथ निभाने' का वास्तविक अर्थ सिखाता है।
 

ममता के ऊपर धर्म की विजय

 
एक माता के लिए उसकी संतान का मोह सबसे बड़ी दुर्बलता होती है। गांधारी देवी के सौ पुत्र थे, परंतु उनकी आंखों की पट्टी ने उन्हें कभी उचित-अनुचित के प्रति अंधा नहीं होने दिया। वास्तव में, गांधारी देवी एक महान भक्त थीं और भक्ति के गूढ़ सिद्धांतों को भली-भांति जानती थीं। वह भली-भांति जानती थीं कि श्रीकृष्ण की इच्छा और धर्म ही सर्वोपरि है। जब दुर्योधन युद्ध से पूर्व विजय का आशीर्वाद मांगने आया, तो एक माता का हृदय विचलित अवश्य हुआ होगा, किंतु उनके शब्दों ने इतिहास रच दिया। महाभारत के स्त्री पर्व में इसका सुंदर प्रमाण मिलता है, जहां उन्होंने स्पष्ट कहा:
 
"न च धर्मं परित्यक्ष्ये पुत्रार्थे कुलपांसन ।
यतो धर्मस्ततो जयः इति स्म मतिराश्रिता ॥"
(अर्थ: मैं कुल को कलंकित करने वाले पुत्र के लिए धर्म का परित्याग नहीं कर सकती, क्योंकि जहां धर्म है, वहीं विजय है।)
 
यह उनकी आत्मा की वह सुदृढ़ता है, जो आज के समाज को सिखाती है कि अपनों के प्रति आसक्ति हमें सत्य का मार्ग छोड़ने के लिए विवश नहीं करनी चाहिए।
 

वर्तमान पीढ़ी और गांधारी देवी का संयम

 
आज के आपाधापी भरे जीवन में, जहां हम अल्प कठिनाई आने पर भी धैर्य खो देते हैं, वहां गांधारी देवी का मौन और धैर्य हमें रुककर विचार करने हेतु प्रेरित करता है। उन्होंने राजसी ऐश्वर्य और अपने कुल के विनाश के मध्य भी अपने चित्त की शांति को कभी नहीं खोया, क्योंकि उनकी जड़ें भक्ति में गहरी थीं।
 
गांधारी देवी आज केवल एक पौराणिक पात्र नहीं, अपितु हर उस व्यक्ति की अंतरात्मा की ध्वनि हैं जो कोलाहल भरी इस दुनिया में शांतिपूर्वक अपने सिद्धांतों पर अडिग रहता है। उनका जीवन एक संदेश है कि वास्तविक शक्ति चक्षुओं की ज्योति में नहीं, बल्कि मनुष्य के चरित्र और उसकी भक्ति के प्रकाश में निहित होती है।
 
(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)
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