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झूठ का प्रमोशन

Promotion of lies
समय के साथ झूठ ने खासी तरक्की कर ली है। पहले झूठ के पांव नहीं होते थे। पर अब थोड़े कमजोर ही सही झूठ के भी पांव होने लगे हैं। वह खुद के पांव पर खड़ा भी होने लगा है। नई जानकारी ये है कि अपने पांव को मजबूत बनाने के लिए वह एक्सपर्ट्स की सलाह और देखरेख में लगातार फिजियोथैरिपी करा रहा है। एक्सपर्ट्स ने उसे यकीन दिलाया कि वह इसी शिद्दत से लगा रहा तो उसके पांव अंगद के पांव जितने मजबूत हो सकते हैं। ऐसा होने पर सच तुम्हारे मुकाबले कहीं टिकेगा ही नहीं।
 
सच को यकीन ही नहीं हो रहा कि यह बुद्ध और गांधी का देश है : यह खबर सुनने के बाद से ही सच सदमे में है। चाहत तो सच की भी है कि उसके पांव भी मजबूत हों, पर बेचारे के न खुद के संसाधन हैं न लोगों का सपोर्ट। जिसे देखो वह झूठ को ही प्रमोट कर रहा है। कुछ लोग तो मानों झूठ की खेती ही कर रहे हैं। बेचारे सच की इस दुर्दशा की किसी को तनिक भी फिक्र नहीं हैं। सच को यकीन ही नहीं हो रहा है कि सत्य और अहिंसा के पुजारी महात्मा बुद्ध, महावीर जैन और गांधी इसी देश के थे।
 
सच की हार और हताशा तब और बढ़ जा रही है जब कुछ लोग उसकी उदासी और अकेलापन देखकर लोगों के चेहरे के भाव अजीब सा हो जाता है। ऐसा जैसे मानों सच होना इस दौर का सबसे बड़ा गुनाह हो। कुछ लोग तो उसके मुंह पर ही बोल देते हैं...वह देखो बेचारे सच को क्या हालत हो गई है। उपेक्षा के ये भाव सच को और पराजित, अपमानित और हताश कर जाता है।
 
सच के परिजनों ने बताया कि उपेक्षा के नाते ये खुदकुशी पर आमादा हैं। सच के प्रति सहानुभति और सदाशयता रखने वाले कुछ लोग हाल ने उसका हालचाल लेने उसके घर भी गए थे। सदमे में होने के कारण सच तो कुछ बता नहीं सका। पर उसके कुनबे के आदर्श, वसूल, सिद्धांत, नैतिक और ईमानदार ने बताया कि इनके हालात बहुत खराब हैं। कभी कभी तो इन्होंने खुदकुशी की भी कोशिश की। इनको नींद नहीं आती है। आ भी गई तो बुरे बुरे सपने आते हैं। चीखते हैं मुझे मार डालो, मुझे दफन कर दो। इस दौर में मेरी जरूरत नहीं।
 
डॉक्टर भी कहते हैं अब इन्हें दवा से अधिक दुआ की जरूरत : सच के परिजनों के अनुसार हम लोगों ने इनको मनोरोग विशेषज्ञ को दिखाया। एडमिट करवाया। इलाज और काउंसलिंग का लंबा सिलसिला चला। ये सिलसिला अब भी जारी है। पर हालात सुधरने की बजाय धीरे धीरे बिगड़ ही रहे हैं। हम लोगों को बहुत डर लग रहा है। डॉक्टरों ने भी उम्मीद छोड़ दी है। उनका कहना है कि अब इनके लिए दवा से जरूरी दुआ है। लोगों की दुआओं और ऊपर वाले पर भरोसा करें। इससे ही संभव है कि कोई चमत्कार ही हो जाए। उसके बाद से हम लोग बेहद डरे हुए हैं।
 
आगे क्या होता है। पता नहीं। आप लोगों से सिर्फ एक ही अनुरोध है कि इनकी सलामती के लिए दुआ करें। 
लेखक के बारे में
गिरीश पांडेय
गिरीश पांडेय को विभिन्न मीडिया संस्थानों में तीन दशक से भी ज्यादा समय तक कार्य करने का अनुभव है। राजनीतिक, सामाजिक एवं समसामयिक मुद्दों पर इनकी गहरी पकड़ है। .... और पढ़ें
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