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अदरक का स्वाद जानें या नहीं, फ्रूटी का स्वाद खूब जानते हैं वृंदावन के बंदर

Vrindavan monkeys know taste of Frooti
Monkeys of Vrindavan: बंदर क्या जानें अदरक का स्वाद… अब ये मुहावरा कितना सच या झूठ है, कहना मुश्किल है। पर वृंदावन के बंदरों को फ्रूटी का स्वाद न सिर्फ पता है, बल्कि यह उन्हें खूब भाता भी है। सीजन चाहे जो हो, यहां रोज़ औसतन सात लाख से अधिक फ्रूटी की बिक्री होती है और उसका बड़ा हिस्सा बंदरों के हिस्से में चला जाता है।
 
फ्रूटी के दाम भी मौके की नज़ाकत के अनुसार तय होते हैं। ऐसे मौके आते ही रहते हैं। वहीं के रहने वाले आलोक शर्मा के मुताबिक, ऐसे समय फ्रूटी अमूमन दोगुने दाम में बिक ही जाती है, कभी-कभी उससे भी ज्यादा में। यहां के 'बंदरों के हाथ में उस्तरा' भले न हो, फ्रूटी के पैकेट ज़रूर दिख ही जाते हैं।
 
मोबाइल से है खासा प्रेम : वृंदावन आने वाले श्रद्धालुओं के चश्मे और मोबाइल यहां के बंदरों को सबसे ज़्यादा पसंद हैं। कभी-कभी मौका मिले तो महिलाओं के पर्स भी। आलोक के मुताबिक, हाल के वर्षों में मोबाइल उनकी सबसे पसंदीदा चीज़ बन गया है। शायद किसी जामवंत ने उन्हें बता दिया है कि आज का इंसान मोबाइल के बिना रह ही नहीं सकता। बंदरों को यह बात अच्छी तरह समझ में आ गई है। फिर तो 'सावधानी हटी, दुर्घटना घटी' उनके लिए मूल मंत्र बन गया है।
 
पॉकेट, हाथ या गाड़ी — कहीं भी मोबाइल या चश्मे को लेकर ज़रा-सी लापरवाही हुई नहीं कि वह उनके हाथ में। और वह कहीं पास के पेड़, ऊंची दीवाल या मंदिर के कंगूरे पर आपके चश्में या मोबाइल के साथ नजर आएंगे। हालांकि श्रद्धालुओं को आगाह करने के लिए जगह-जगह 'वॉल राइटिंग' की गई है। कोई शुभचिंतक होगा तो बार-बार चेताएगा भी। पंडे और पुजारी भी आपको जगह सावधान करेंगे।
 
पर मुश्किल ये है कि आप राधा-कृष्ण की पवित्र ब्रजभूमि में हैं। सोशल मीडिया पर बताने के लिए कभी न कभी फोटो, वीडियो या रील बनाने के लिए मोबाइल निकालना ही पड़ेगा। यहीं बंदरों को मौका मिल जाता है। फिर मोबाइल मिलेगा भी तो फ्रूटी के बदले, वह भी किसी एक्सपर्ट बंदर-मनाने वाले की मदद से। और इन दोनों के लिए आपकी जेब ढीली होनी तय है।
कितना खर्च होगा — ये पूरी तरह मौके की नज़ाकत पर निर्भर करता है। आलोक जी कहते हैं, 'यहां के बंदर बहुत बुद्धिमान हैं।' मैं कहता हूं — अपने पूर्वज जो ठहरे।
 
हंसते हुए वह कहते हैं, 'भाई साहब, ये सब कुछ बहुत जल्दी सीख लेते हैं। डर बस इस बात का है कि कहीं माचिस या लाइटर से आग लगाना न सीख लें। अगर सीख गए तो वृंदावन में हनुमान की तरह लंका कांड कर देंगे।' हम सब ठहाका लगाकर हंस पड़ते हैं।
 
विदा लेते हुए, विधवा आश्रम से आगे एक इश्तहार पर नज़र जाती है — मोटे और बड़े अक्षरों में लिखा था: सावधान! बंदर बहुत भयानक हैं, इनसे अपने सामान की सुरक्षा खुद करें! साथ आए अंशुल से मैं अनुरोध करता हूं कि इस इश्तहार के पास मेरी एक फोटो खींच लें। आजू-बाजू बंदरों को देखकर पहले वह मना करते हैं। जोखिम का एहसास उन्हें भी था। फिर जोखिम लेकर मोबाइल को कसकर पकड़ते हैं, जो फोटो खींचते हैं, वही आपके सामने है। फिर श्रीपत जी भी इस फोटो सेशन में शामिल हो जाते हैं — जिनके नाते दिल्ली से वापसी में वृंदावन जाकर बांके बिहारी के दर्शन का सौभाग्य मिला।
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