रुकें, सोचें फिर करें हाथी की सवारी
बेशक! हाथी शान की सवारी है। राजा-महाराजा हाथियों पर चलते रहे हैं। कभी युद्धभूमि में हाथी सवार सैनिकों की भूमिका निर्णायक होती थी—अक्सर जीत का सेहरा भी उनके सिर बंधता था।
लेकिन इतिहास में अपवाद भी हैं। सिकंदर और पोरस की लड़ाई इसका उदाहरण है। कहा जाता है कि पोरस की सेना के कुछ हाथी बिदक गए और अपने ही सैनिकों को कुचलने लगे। भगदड़ मची… और एक स्वाभिमानी राजा को शिकस्त झेलनी पड़ी। तभी से 'पोरस के हाथी' मुहावरा बदनामी का बोझ ढोता चला आ रहा है।
अब ज़रा वर्तमान पर आएं। उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं। माहौल बन रहा है, और कुछ लोग फिर से “हाथी” पर सवार होने का मन बना रहे हैं। उन्हें हाथी में अचानक ब्रह्मा-विष्णु-गणेश के दर्शन होने लगे हैं। बचपन की “हाथी और दर्जी” वाली कहानी भी याद आने लगी है—मानो हाथी सबसे समझदार जीव हो!
लेकिन सच थोड़ा अलग है। हाथी समझदार ज़रूर होता है, पर उसकी समझदारी काफी हद तक उसके महावत पर निर्भर करती है। महावत जितना संतुलित और अनुभवी होगा, हाथी भी उतना ही संयमित रहेगा। फिर भी… हाथी कब बिदक जाए, कोई गारंटी नहीं।
समस्या तब और बढ़ती है जब महावत और सवार बदलते रहते हैं। पुराने महावत की ट्रेनिंग पा चुका हाथी, नए महावत के निर्देशों से भ्रमित हो जाता है। ऊपर से नए-नए सवार—कन्फ्यूजन को और बढ़ा देते हैं। ऐसे में हाथी की चाल भी अनिश्चित हो जाती है। उसके बिदकने की संभावना और उससे होने वाला जोखिम बढ़ जाता है। महावत और सवार दोनों के लिए।
हाथी की सवारी आन-बान-शान की प्रतीक है, लेकिन इसके खतरे भी कम नहीं। इसलिए जो लोग इस बार उस पर सवार होने का मन बना रहे हैं—एक बार ठहरें, सोचें, फिर निर्णय लें। हां, हमारे यहां कहावत है—'मरा हुआ हाथी भी नौ लाख का।' पर नौ लाख के हाथी को पालना आसान नहीं। वह असल में महावत का ही वफादार होता है; सवारों से उसे खास मतलब नहीं। खासकर तब, जब कई लोग उसकी पीठ पर अपनी शान बढ़ाकर बाद में साइकिल या किसी और सवारी पर निकल लिए हों।
ऐसे में संभव है, इस बार नए सवारों के प्रति हाथी की बेरुखी और बढ़ जाए—और जोखिम भी। इसलिए एक बार फिर आगाह करता हूँ—रुकें, सोचें… फिर हाथी की सवारी करें। और अगर मन पक्का है, तो मेरी ओर से शुभकामनाएं—आपकी यात्रा मंगलमय हो।