महाराष्ट्र की सियासत में ठाकरे ब्रांड का सूर्यास्त!, निकाय चुनाव में 40 साल बाद ढहा BMC का किला, उद्धव-राज ठाकरे की जोड़ी बेअसर
महाराष्ट्र में नगर निगम चुनाव में भाजपा की अगुवाई वाले महायुति गठबंधन की प्रचंड जीत के साथ प्रतिष्ठा की लड़ाई वाले BMC में पहली बार भाजपा का मेयर बनता हुआ दिख रहा है। निकाय चुनाव के नतीजे और रुझान बता रहे है कि 40 साल तक ठाकरे परिवार के वर्चस्व वाले मुंबई महानगर पालिका (BMC) में पहली बार भगवा लहराने जा रहा है। निकाय चुनाव से ठीक पहले उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के एक साथ आने के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में जिस चमत्कार की उम्मीद की जा रही थी, उसने चुनाव नतीजों के बाद दम तोड़ दिया है।
चुनाव से ठीक पहले जब राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे ने मराठी मानुष के नाम पर हाथ मिलाया, तो लगा था कि महाराष्ट्र राजनीति का पुराना दौर लौट आएगा और एक बार ठाकरे परिवार का दबादबा दिखाई देगा। निकाय चुनाव में दोनों भाइयों ने संयुक्त रैलियां कीं, दादर के शिवाजी पार्क से हुंकार भरी और मातोश्री के बाहर समर्थकों का सैलाब उमड़ा, लेकिन आज जब ईवीएम खुली, तो कहानी कुछ और ही निकली।
दशकों तक मुंबई और महाराष्ट्र की धड़कन को नियंत्रित करने वाला ठाकरे परिवार आज अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। मुंबई नगर निगम पर 40 साल तक जिस शिवसेना का कब्जा था, वहां पर उसकी बुरी तरह हार हुई है और पहली बार भाजपा का मेयर बनता दिख रहा है।ठाकरे परिवार की ताकत का असली स्रोत मुंबई नगर निगम था। दशकों तक इस पर ठाकरे परिवार का एकछत्र राज रहा। लेकिन हालिया BMC चुनावों के परिणामों ने इस वर्चस्व को पूरी तरह खत्म कर दिया।
निकाय चुनाव से ठीक पहले मराठी वोट को एकजुट करने के लिए उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक साथ आए। राज ठाकरे ने 2005 में शिवसेना छोड़ी थी और 2006 में MNS बनाई थी, इसके बाद यह पहली बार था जब दोनों भाई एक साथ चुनावी मैदान में आए। MNS और शिवसेना (UBT) का गठबंधन भावनात्मक तौर पर मजबूत दिखता है, लेकिन चुनाव नतीजे बताते है कि जमीन पर इसका असर नहीं दिखाई दिया।
महाराष्ट्र मे ठाकरे परिवार के पतन की पटकथा 2024 के लोकसभा चुनावों में ही लिखी जाने लगी थी। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को असली 'शिवसेना' का दर्जा मिलने और धनुष-बाण का प्रतीक मिलने के बाद उद्धव ठाकरे की 'शिवसेना (UBT) के पास केवल सहानुभूति का सहारा बचा था। चुनाव परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया कि मुंबई और कोंकण जैसे गढ़ों में भी मतदाताओं ने ठाकरे परिवार के 'मराठी कार्ड' और 'सहानुभूति कार्ड' को नकारते हुए विकास और हिंदुत्व के नए समीकरण को चुना। इसके साथ ही 2024 के अंत में हुए विधानसभा चुनावों ने ठाकरे परिवार की कमर तोड़ दी। महाविकास अघाड़ी (MVA) के भीतर उद्धव ठाकरे की स्थिति कमजोर हुई और सीटों के बंटवारे में भी उन्हें संघर्ष करना पड़ा।महाराष्ट्र निकाय चुनावों के नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि राजनीति में सरनेम और 'इमोशनल कार्ड' हमेशा काम नहीं आते।
महाराष्ट्र की सियासत में अब ठाकरे परिवार का वह असर और आकर्षण नहीं रहा जो 90 के दशक या 2000 की शुरुआत में था। विचारधारा से समझौता (कांग्रेस के साथ गठबंधन) और परिवार के भीतर की बगावत ने एक ऐसे साम्राज्य का अंत कर दिया, जिसे कभी अजेय माना जाता था। महाराष्ट्र की राजनीति के जानकार कहते है कि अब महाराष्ट्र की राजनीति क्षेत्रीय अस्मिता से आगे निकलकर विकास और राष्ट्रीय विमर्श की ओर बढ़ चुकी है, जहाँ ठाकरे परिवार फिट नहीं बैठ पा रहा है।