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महारानी कुंती: सिर्फ एक रानी नहीं, संघर्षों की मिसाल
- सुखीदेवी दासी 'सुनीता'
जब भी हम महाभारत की बात करते हैं, तो हमारे सामने बड़े-बड़े वीरों और युद्धों की तस्वीर आती है। लेकिन क्या हमने कभी उस महिला के बारे में गहराई से सोचा है, जिसने पर्दे के पीछे रहकर पूरे परिवार को बांधे रखा? वह थीं महारानी कुंती।
सच कहूं तो, कुंती का जीवन कोई महलों का ऐश-ओ-आराम नहीं, बल्कि चुनौतियों का एक लंबा सिलसिला था। आज के समय में अगर हमें जरा सी मुसीबत घेर ले, तो हम टूट जाते हैं। पर सोचकर देखिए, क्या आज के दौर में कोई इतना धैर्य रख सकता है जितना कुंती ने रखा? शायद नहीं।
उनका संघर्ष तो बचपन से ही शुरू हो गया था। पहले अपना घर छूटा, फिर शादी के बाद पति का साथ जल्दी छूट गया। आप अंदाजा लगाइए, एक अकेली मां और पांच छोटे बच्चे, ऊपर से महल की राजनीति और दुश्मनी। कोई और होता तो शायद घुटने टेक देता, लेकिन कुंती ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने बेटों को सिर्फ पाल-पोसकर बड़ा नहीं किया, बल्कि उन्हें ऐसे संस्कार दिए कि वे हमेशा सच्चाई और 'धर्म' के रास्ते पर टिके रहे।
अक्सर मुझे लगता है कि कुंती की सबसे बड़ी शक्ति उनकी ममता नहीं, बल्कि उनका साहस था। उन्होंने कर्ण जैसी सच्चाई को अपने मन में दबाए रखा, जो किसी भी मां के लिए सबसे बड़ा बोझ हो सकता है। क्या यह त्याग हम आज सोच भी सकते हैं?
आज जब हम महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, तो कुंती हमारे लिए एक बहुत बड़ा उदाहरण हैं। उन्होंने सिखाया कि परिस्थिति चाहे कितनी भी खराब क्यों न हो, अगर मन में सच्चाई और हिम्मत है, तो आप पूरी दुनिया से लड़ सकते हैं।
मेरे नजरिए से, कुंती महाभारत की वो नींव हैं, जिसके बिना पांडवों की जीत मुमकिन नहीं थी। हमें उन्हें सिर्फ एक पौराणिक पात्र की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसी प्रेरणा की तरह देखना चाहिए जो हमें हर मुश्किल में खड़ा रहना सिखाती है।
(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)
