कथनी, सोच और करनी में फर्क — यही इस दौर में देश-दुनिया का सबसे बड़ा रोग है। यह रोग दिखता नहीं, पर है बेहद संक्रामक। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इससे पीड़ित व्यक्ति स्वयं को स्वस्थ मानता है। वह अमूमन बिना सोचे या सोच समझकर धोखा देने के मकसद से कुछ कहता है। और जो कहता है,उसे करता नहीं। क्योंकि यह उसकी नीयत में ही नहीं होता। कथनी और सोच के विपरीत जो करता है, उसके समर्थन में बाद में तर्क गढ़ लेता है। यह व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, धीरे-धीरे सामाजिक प्रवृत्ति बनती जा रही है।
इस संक्रामक रोग का सीजन साल भर रहता है, पर चुनाव के समय इसकी संक्रामकता कई गुना बढ़ जाती है। वादों का तापमान अचानक चढ़ता है, नैतिकता की भाषा मुखर हो जाती है, आदर्शों की परेड निकलती है। पर जैसे ही परिणाम आते हैं, वही आदर्श सुविधानुसार व्याख्यायित होने लगते हैं।
संयोग से हमारे देश में चुनाव लगभग साल भर चलते रहते हैं। कहीं न कहीं कोई न कोई चुनावी प्रक्रिया जारी रहती है। ऐसे में यह संक्रमण स्थायी हो चुका है। शब्दों की भरमार है, घोषणाओं की कमी नहीं, पर व्यवहार में निरंतरता दुर्लभ है।
यह प्रश्न किसी एक दल या व्यक्ति का नहीं है। यह व्यापक सामाजिक मनोविज्ञान का विषय है। हम सब, किसी न किसी स्तर पर, इस अंतर के सहभागी हैं। परिवार में, कार्यालय में, सार्वजनिक जीवन में — सिद्धांतों की चर्चा अलग और व्यवहार अलग।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस रोग को रोग मानने की इच्छाशक्ति भी क्षीण हो रही है। गलती स्वीकार करने का साहस कम होता जा रहा है। प्रायश्चित तो दूर, हम अपने आचरण को सही ठहराने के लिए कुतर्क के किसी भी स्तर तक उतर जाते हैं। समर्थकों की भीड़ से इस कुतर्क को पुरजोर समर्थन मिलता है।
ऐसे समय में प्रश्न उठता है — समाधान क्या है? क्या यह केवल नैतिक शिक्षा का विषय है? क्या यह राजनीतिक सुधार का प्रश्न है? या यह आत्मानुशासन का मामला है?
उत्तर जटिल नहीं है। जब सोच, कथन और कर्म एक दिशा में चलते हैं, तभी विश्वास जन्म लेता है। विश्वास ही लोकतंत्र की असली पूंजी है। संस्थाएं नियमों से चलती हैं, पर समाज नियम के साथ भरोसे से चलता है। महात्मा गांधी इसकी मिसाल हैं। लगातार जीत भी मनुष्य को असावधान बना सकती है, और लगातार हार उसे कटु। पर सबसे अधिक खतरनाक है आत्मसंतोष — यह मान लेना कि सब ठीक है, जबकि भीतर से क्षरण जारी है।
समाधान बाहर नहीं, भीतर से शुरू होगा। व्यक्तिगत स्तर पर ईमानदारी, सार्वजनिक स्तर पर जवाबदेही, और सामूहिक स्तर पर सजगता — यही इस संक्रमण की दवा है। इससे आगे क्या कहा जाए? शायद इतना ही कि हम पहले स्वयं से प्रश्न पूछें। क्या हमारी कथनी, सोच और करनी में समानता है? अगर इस प्रश्न का उत्तर ईमानदारी से दे दिया जाए, तो संभव है कि यह संक्रमण धीरे-धीरे काबू में आ जाए । इस मामूली सी बात को समझ तो सब रहे हैं। यकीनन आप भी। बस अमल की जरूरत है। हम सबका अधिकतम हित भी इसी में है।