लोकमाता अहिल्या: तीन युगों की महानता का संगम
- सुखी देवी दासी (सुनीता)
भारतीय इतिहास में नारी शक्ति ने हर युग में समाज को दिशा दी है। अक्सर जब मैं जीवन की चुनौतियों और अपनी समस्याओं के सामने खड़ी होती हूं, तो मेरा मन प्रेरणा की खोज में इतिहास के पन्नों को पलटता है। वहां मुझे लोकमाता अहिल्याबाई होलकर का व्यक्तित्व सबसे प्रभावशाली और वर्तमान के निकट मिलता है। मेरे दृष्टिकोण से, उनका जीवन शास्त्रों की उन महान नारियों का जीवंत संगम है, जिनसे हम आज भी सीधा जुड़ाव महसूस कर पाते हैं।
लोकमाता अहिल्याबाई के चरित्र में मुझे सतयुग की माता देवहूति जैसी वैराग्य भावना दिखाई देती है। देवहूति माता ने राजसी सुखों के बीच रहकर भी जैसा वैराग्य साधा, वही छवि मुझे अहिल्याबाई के सादगीपूर्ण जीवन में मिलती है।
यह मुझे सिखाता है कि हम अपनी व्यस्तता और जिम्मेदारियों के बीच भी मन को ईश्वर में कैसे लगाए रख सकते हैं। वहीं, त्रेतायुग की महारानी तारा जैसी कूटनीतिक सूझबूझ उनके शासन में झलकती है, जो मुझे कठिन समय में सही निर्णय लेने का विवेक देती है।
मैं व्यक्तिगत रूप से महारानी कुंती के चरित्र से बहुत अधिक प्रभावित हूं और मुझे लोकमाता अहिल्याबाई में उनकी स्पष्ट छवि दिखाई देती है। जिस तरह महारानी कुंती ने हर धर्म-संकट में केवल 'धर्म' को चुना, वैसा ही कठिन संघर्ष अहिल्याबाई के जीवन में भी था।
उनका जीवन केवल व्यक्तिगत दुखों तक सीमित नहीं था, बल्कि वह भीषण संकटों और राजनैतिक चुनौतियों से भरा था। इसके बावजूद, वे कुंती महारानी की भांति अपने कर्तव्य पथ पर हिमालय की तरह अडिग रहीं। पुत्र-मोह को त्यागकर उन्होंने जो न्याय किया, वह मुझे सत्य के साथ खड़े होने का साहस देता है। यही वह दृढ़ संकल्प और अटूट भावना है, जिससे मैं गहराई से जुड़ पाती हूं।
लोकमाता अहिल्याबाई ने इंदौर को अपनी ममता से सींचा और महेश्वर को अपनी राजधानी बनाकर उसे एक विशेष पहचान दी। उन्होंने मन, कर्म और वचन से प्रजा के साथ आत्मीय संबंध रखा और आध्यात्मिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक स्तर पर समाज का सर्वांगीण विकास किया।
देश की रक्षा के साथ-साथ उन्होंने हथकरघा उद्योग को बढ़ावा दिया और विशेष रूप से महेश्वरी साड़ी की परंपरा शुरू कर लोगों को स्वावलंबी बनाया। उन्होंने भगवान शिव को अपना आराध्य मानकर उन्हीं की शक्ति और अटूट विश्वास से सोमनाथ से काशी तक मंदिरों का पुनरुद्धार किया। उनका यह निष्काम कर्मयोग और अटूट धर्म-निश्चय ही आज हम सबके लिए सच्ची प्रेरणा है।
लेख का सार (शिक्षा): लोकमाता अहिल्याबाई के जीवन का सबसे बड़ा सार यह है कि दुख और अभाव मनुष्य को तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के आंसू पोंछने की शक्ति देने के लिए आते हैं। वे हमें सिखाती हैं कि सच्ची नारी शक्ति अधिकारों के शोर में नहीं, बल्कि कर्तव्यों के मौन पालन और समाज को स्वावलंबी बनाने में निहित है। उनका चरित्र इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जब कर्म को 'ईश्वर-अर्पण' कर दिया जाए, तो शासन भी तपस्या बन जाता है।
(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)
लेखक के बारे में
WD Feature Desk
अनुभवी लेखक, पत्रकार, संपादक और विषय-विशेषज्ञों द्वारा लिखे गए गहन और विचारोत्तेजक आलेखों का प्रकाशन किया जाता है।....
और पढ़ें