साझेदारी पर आधारित कूटनीति पर आगे बढ़ने की भारत की वैदेशिक नीति बदलते वैश्विक परिदृश्य में बेहद प्रभावकारी है। यह नीति विभिन्न देशों को परस्पर निर्भरता के साथ पारस्परिक लाभ की दिशा में आगे बढ़ाती है। भारत ने विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलित संबंध स्थापित कर अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत किया है। इजराइल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के दौरान हुए विभिन्न समझौतों ने भारत की रक्षा नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव को स्पष्ट किया है। पहले भारत की प्राथमिकता तैयार हथियारों की खरीद पर केंद्रित रहती थी,लेकिन अब भारत केवल आयातक देश बने रहना नहीं चाहता। वह तकनीक हस्तांतरण और संयुक्त उत्पादन के माध्यम से आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
भारत और इजराइल के बीच रक्षा,साइबर सुरक्षा,ड्रोन तकनीक,मिसाइल प्रणाली और खुफिया सहयोग जैसे क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ी है। यह सहयोग शोध,अनुसंधान और नवाचार पर आधारित है। मेक इन इंडिया अभियान के तहत भारत अपने रक्षा उद्योग को मजबूत करना चाहता है जिससे हथियारों और रक्षा उपकरणों का निर्माण देश में ही हो सके। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अमेरिका,फ्रांस और अन्य प्रमुख रक्षा साझेदारों के साथ भी इसी प्रकार की नीति को बढ़ावा दिया है।
इससे भारतीय वैज्ञानिकों,इंजीनियरों और युवाओं को उच्च तकनीक के क्षेत्र में नए अवसर मिलेंगे इसके साथ ही रक्षा क्षेत्र में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। इससे देश में स्टार्टअप और नवाचार की उम्मींदे भी बढ़ेंगी। कूटनीतिक और रणनीतिक दृष्टि से यह भारत की विदेश नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन है। अब भारत केवल एक बड़े उपभोक्ता बाजार होने के साथ ही साझेदारी आधारित शक्ति के रूप में उभरना चाहता है। अपने विशाल बाजार और युवा मानव संसाधन का लाभ उठाकर भारत महाशक्तियों के साथ समानता और सहयोग पर आधारित संबंध मजबूत कर रहा है। यह नीति आत्मनिर्भर भारत और वैश्विक मंच पर भारत की सशक्त भूमिका की दिशा में एक निर्णायक कदम है।
साझेदारी-आधारित कूटनीति केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत नहीं करती,बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारत जैसे उभरते राष्ट्र के लिए यह नीति उसे एक जिम्मेदार, आत्मनिर्भर और बहुआयामी वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने का प्रभावी माध्यम बन रही है। भारत की रक्षा नीति में आया यह बदलाव कूटनीतिक स्तर के साथ देश की औद्योगिक और तकनीकी क्षमता को भी नई दिशा दे रहा है। बीते दौर में भारत की छवि हथियारों के आयातक की रही थी लेकिन अब भारत साझेदारी पर आधारित कूटनीति पर आगे बढ़ते हुए तकनीक हस्तांतरण,संयुक्त उत्पादन और स्वदेशी निर्माण पर जोर दे रहा है।
यह परिवर्तन मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। इस नीति से रक्षा उत्पादन क्षेत्र में गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी। जब अत्याधुनिक तकनीक भारत में विकसित और निर्मित होगी तो उत्पादन की लागत कम होगी,पारदर्शिता बढ़ेगी और भारतीय कंपनियों को वैश्विक मानकों के अनुरूप काम करने का अवसर मिलेगा। शोध एवं विकास को प्रोत्साहन मिलने से भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की क्षमता भी सशक्त होगी। आने वाले समय में इसका सीधा लाभ यह होगा कि भारत अपनी सुरक्षा जरूरतों को पूरा करते हुए रक्षा निर्यात भी बढ़ाएगा।
भारत ने लंबे समय तक रक्षा क्षेत्र में गहरे और भरोसेमंद संबंध रूस के साथ विकसित किए। सोवियत काल से ही रूस भारत का प्रमुख रक्षा आपूर्तिकर्ता रहा है। ब्रह्मोस मिसाइल परियोजना जैसे संयुक्त उपक्रमों ने यह दिखाया कि भारत तकनीकी साझेदार भी बन सकता है। इस मॉडल ने भारत के सामर्थ्य और वैज्ञानिक क्षमता को दिखाया। अब यही साझेदारी आधारित दृष्टिकोण अधिक व्यापक रूप ले रहा है। भारत ने फ़्रांस के साथ राफेल विमान सौदे के माध्यम से आधुनिक तकनीक प्राप्त की तथा औद्योगिक सहयोग और ऑफसेट नीति के जरिए घरेलू रक्षा उद्योग को भी मजबूती दी है। इसी प्रकार इजराइल के साथ ड्रोन,मिसाइल प्रणाली,साइबर सुरक्षा और निगरानी तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ा है। यह विस्तार दर्शाता है कि भारत अब बहुध्रुवीय रणनीति अपना रहा है। वह किसी एक देश पर निर्भर रहने की नीति से आगे बढ़कर विभिन्न महाशक्तियों के साथ संतुलित और साझेदारी-आधारित संबंध विकसित कर रहा है। इसका उद्देश्य साफ है,तकनीक हस्तांतरण,संयुक्त अनुसंधान,स्वदेशी उत्पादन और निर्यात क्षमता का विकास।
इजराइल अत्याधुनिक रक्षा तकनीकों,साइबर सुरक्षा,ड्रोन,मिसाइल प्रणाली और खुफिया तंत्र के क्षेत्र में अग्रणी देशों में माना जाता है। सीमित भौगोलिक आकार के बावजूद उसने अनुसंधान,नवाचार और रक्षा तकनीक में वैश्विक प्रतिष्ठा अर्जित की है। ऐसे देश के साथ भारत के मजबूत होते संबंध सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। गौरतलब है की भारत को इजराइल से न केवल आधुनिक हथियार प्रणालियां मिलती हैं, बल्कि तकनीक हस्तांतरण, संयुक्त अनुसंधान और उत्पादन के अवसर भी प्राप्त होते हैं। ड्रोन तकनीक,मिसाइल रक्षा प्रणाली और सीमा निगरानी जैसे क्षेत्रों में सहयोग भारत की सुरक्षा क्षमताओं को नई मजबूती देता है। इससे आतंकवाद-रोधी रणनीतियों और सीमा प्रबंधन में भी सुधार होता है। भारत और इजराइल के बीच बढ़ती यह साझेदारी केवल तकनीकी लाभ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके स्पष्ट कूटनीतिक संदेश भी है। भारत के इजराइल जैसे उच्च-तकनीकी राष्ट्र के साथ खुले और सुदृढ़ संबंध पाकिस्तान,चीन और तुर्की जैसे भारत के प्रतिद्वंदी देशों को एक कड़ा संदेश है। जाहिर है भारत अपनी सुरक्षा और सामरिक हितों को लेकर गंभीर है और इसीलिए वैश्विक स्तर पर मजबूत साझेदारियां विकसित कर रहा है।
कूटनीतिक दृष्टि से भी यह भारत की विदेश नीति में अहम बदलाव के संकेत है। रणनीतिक स्वायत्तता बनाएं रखते हुए भारत अपने विशाल बाजार,तकनीकी क्षमता और युवा शक्ति का उपयोग कर वैश्विक रक्षा व्यवस्था में एक सशक्त और विश्वसनीय भागीदार के रूप में उभर रहा है। रूस की हथियार कंपनी रोसोबोरोनएक्सपोर्ट भारत के साथ मिलकर तीसरे देशों को हथियार बेचने की योजना पर आगे काम कर रही है। रोसोबोरोनएक्सपोर्ट रूस की एकमात्र सरकारी हथियार निर्यातक कंपनी है,जो रोस्टेक का हिस्सा है। यह टी-90 जैसे आधुनिक टैंक,अत्याधुनिक विमान और रक्षा प्रणालियों का निर्यात करती है। यह भारत के लिए प्रमुख रक्षा भागीदार है जो मेक इन इंडिया के तहत तकनीक हस्तांतरण और संयुक्त रक्षा उत्पादन में सहयोग करती है। अब इजराइल के साथ रक्षा नीति में साझेदारी पर आधारित संबंध भारत के लिए दीर्घकालिक रूप से लाभकारी सिद्ध होंगे। इससे देश की सामरिक शक्ति मजबूत होगी और विश्व बाजार में भारत का रुतबा एक विश्वसनीय रक्षा उत्पादक देश के रूप में स्थापित होगा।