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अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस पर कविता : पर्वतराज हिमालय

Updated: गुरुवार, 8 दिसंबर 2022 (16:54 IST)
वह अटल खड़ा है उत्तर में, 
शिखरों पर उसके, हिम किरीट।
साक्षी, विनाश निर्माणों का,
उसने सब देखी, हार-जीत।
 
उसके सन्मुख जाने कितने,
इतिहास यहां पर रचे गए।
जाने कितने, आगे आए,
कितने अतीत में चले गए। 
 
उसके उर की विशालता से,
गंगा की धार निकलती है।
जो शस्य-श्यामला धरती में,
ऊर्जा, नव-जीवन भरती है।
 
इसकी उपत्यकाएं सुंदर,
फूलों से लदी घाटियां हैं।
औ‍षधियों की होती खेती,
केशर से भरी क्यारियां हैं।
 
कंचनजंघा, कैलाश शिखर,
देवत्व यहां पर, रहा बिखर।
ऋषियों-मुनियों का आलय है,
यह पर्वतराज हिमालय है।
लेखक के बारे में
श्रीमती इन्दु पाराशर
रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर, बी.एड, संस्कृत-को विद। ब्राह्मण इंटरनेशनल महिला अध्यक्ष, राज्यस्तरीय श्रेष्ठ नवाचारी शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित। कई पुस्तकें प्रकाशित.... और पढ़ें

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