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'अष्टांग योग गीत'

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चित्त की चंचल लहरें रोकें, 
अन्तस आलोक जगाएं हम।
आओ साधक! पतंजलि का, 
अष्टांग योग अपनाएं हम।
 
प्रथम सीढ़ी 'यम' की है भाई,
सत्य-अहिंसा मन में लाना।
अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह को, 
तुम जीवन का मूल बनाना।
शुचिता, संतोष, तप, स्वाध्याय,
'नियम' की राह दिखाता है।
ईश्वर-प्रणिधान का सुमिरन करना, 
मन का मैल मिटाता है।
बाहर भटक रहे तन मन को
अंतर्मुख कर लाएं हम।
आओ साधक! पतंजलि का, 
अष्टांग योग अपनाएं हम।
 
आसन, प्राणायाम, 
'आसन' से यह काया सधती
स्थिर-सुख का भाव जगे।
प्राणों का आयाम बढ़ाकर,
'प्राणायाम' में ध्यान लगे।
'प्रत्याहार' सिखाए हमको,
इन्द्रिय-वेग को कैसे रोकें।
भीतर की गंगा में डूब कर, 
बाहर के भ्रम कैसे टोकें।
पाकर परम शून्य का वैभव, 
शिवमय ही हो जाएं हम।
आओ साधक! पतंजलि का, 
अष्टांग योग अपनाएं हम।
 
'धारणा'' एकाग्र करें मन, 
लक्ष्य एक ही पाएं हम।
अविच्छिन्न चेतना की धारा,
'ध्यान'' रूप कहलाएं हम।
जब ध्याता और ध्यान मिटे, 
बस ध्येय मात्र रह जाता है।
वही विलोप 'समाधि' की
पावन वेला बन जाता है।
बहिरंग साधना से उठकर, 
अंतरंग हो जाएं हम।
आओ साधक! पतंजलि का 
अष्टांग योग अपनाएं हम।
 
चित्त की चंचल लहरें रोकें, 
अन्तस आलोक जगाएं हम।
आओ साधक! पतंजलि का, 
अष्टांग योग अपनाएं हम।

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लेखक के बारे में
सुशील कुमार शर्मा
वरिष्ठ अध्यापक, गाडरवारा.... और पढ़ें
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