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गाली पर इतना बवाल क्यों? भाषा बिगड़ रही है, या समाज का असली चेहरा सामने आ रहा है?

gen z protest
इन दिनों गालियां फिर राष्ट्रीय बहस का विषय हैं। कभी किसी स्टैंड-अप कॉमेडियन के कारण, कभी किसी ओटीटी सीरीज़ के कारण, कभी किसी यूट्यूबर की भाषा को लेकर, तो कभी किसी छात्र आंदोलन में इस्तेमाल हुए जार्गन पर।

ऐसा लगता है मानो देश के सामने सबसे बड़ा संकट बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य या अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि शब्दों का हो। लेकिन असली सवाल यह है—क्या गालियां अचानक पैदा हुई हैं, या पहली बार माइक्रोफोन पर सुनाई देने लगी हैं?

गाली का इतिहास, इंटरनेट से कहीं पुराना है
यदि कोई यह मानता है कि गालियां इंटरनेट, ओटीटी, जेन-जी या सोशल मीडिया की देन हैं, तो उसे एक बार बनारस के अस्सी घाट की शामें, उत्तर भारत के गांवों की चौपालें, पुलिस थानों की भाषा, ट्रक चालकों की बातचीत और शादी-ब्याह में गाए जाने वाले पारंपरिक 'गारी गीत' याद कर लेने चाहिए।

भारतीय लोकसंस्कृति में गालियों का इतिहास लगभग उतना ही पुराना है, जितना लोकगीतों का। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले वे चौपालों, घाटों और आंगनों में गूंजती थीं, आज एल्गोरिदम उन्हें ट्रेंड करा देता है।
काशीनाथ सिंह ने अपने चर्चित उपन्यास 'काशी का अस्सी' में बनारस की उस भाषा को दर्ज किया है, जिसमें गाली हमेशा अपमान नहीं होती। वह आत्मीयता भी है, ठहाका भी, अपनापन भी और सत्ता से बेखौफ होकर बात करने का अंदाज़ भी। बनारस में कई बार गाली रिश्ते की दूरी नहीं, बल्कि निकटता का प्रमाण होती है।

उत्तर भारत के अनेक विवाहों में आज भी 'गारी' एक रस्म है। दूल्हे और उसके परिवार को गाकर सुनाई जाने वाली ये गालियां अपमान के लिए नहीं, बल्कि सदियों पुराने सामाजिक संकोच को तोड़ने, रिश्तों में सहजता लाने और औपचारिकता की दीवार गिराने के लिए होती हैं।

यानी भारतीय समाज ने गाली को केवल आक्रोश की भाषा नहीं बनाया; कई बार उसे हास्य, अपनत्व और लोकसंस्कृति का भी हिस्सा बनाया है।
दिलचस्प यह है कि यही समाज कबीर का भी है—

"ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय॥"

यानी हमारी संस्कृति में मधुर वाणी भी है और ठेठ गाली भी। दोनों सदियों से साथ-साथ चली हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले गालियां मोहल्ले तक सीमित थीं, अब राष्ट्रीय बहस का विषय हैं।

असली समस्या गाली नहीं, हमारा पाखंड है
हिंदी भाषी समाज शायद दुनिया के सबसे दिलचस्प भाषाई विरोधाभासों में से एक है।
औपचारिक मंच पर हम शालीनता की प्रतिमूर्ति बन जाते हैं। "आदरणीय", "माननीय", "श्रद्धेय" जैसे शब्दों से वाक्य शुरू करते हैं। लेकिन सड़क पर, ट्रैफिक में, क्रिकेट मैच के दौरान, दोस्तों की महफिल में, पुलिस थानों में और कभी-कभी घरों के भीतर भी वही समाज ऐसी भाषा बोलता है, जिसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने में संकोच करता है।

यानी हमारी भाषा दो हिस्सों में बंट चुकी है—एक कैमरे के लिए, दूसरी कैमरे के पीछे।
रहीम ने बहुत पहले चेताया था—

"रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गई सरग पाताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥"

लेकिन लगता है कि हमने इस दोहे को दीवार पर टांग दिया, व्यवहार में नहीं।
ओटीटी ने भाषा नहीं बिगाड़ी, उसने मेकअप उतार दिया
हर नई वेब सीरीज़ के बाद कहा जाता है कि ओटीटी समाज को बिगाड़ रहा है।
क्या सचमुच?
या उसने सिर्फ वही भाषा रिकॉर्ड कर ली, जिसे समाज वर्षों से ऑफ रिकॉर्ड बोलता आया है?
जिस समाज में पुलिस की डांट अक्सर गाली से शुरू होती हो, जहां चुनावी मंचों से लेकर विधानसभाओं और संसद तक कई बार असंसदीय शब्द रिकॉर्ड से हटाने पड़ते हों, वहां ओटीटी पर नैतिकता का पूरा बोझ डाल देना आसान रास्ता है।
आईना हमेशा दोषी नहीं होता। कई बार चेहरा भी देख लेना चाहिए।

गाली आखिर करती क्या है?
  • गाली केवल अश्लीलता नहीं है।
  • वह गुस्से का शॉर्टकट है।
  • हताशा का विस्फोट है।
  • व्यंग्य का हथियार है।
  • और कई बार प्रतिरोध की भाषा भी।
दार्शनिक लुडविग विट्गेंस्टाइन ने लिखा था— "मेरी भाषा की सीमाएँ ही मेरी दुनिया की सीमाएँ हैं।"
यदि समाज की भाषा अधिक आक्रामक हो रही है, तो संभव है कि समाज के भीतर बेचैनी भी उतनी ही बढ़ रही हो।

कई बार बहुत सारे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और पारिवारिक दबावों से बोझिल व्यक्ति के लिए अपनी असहायता, गुस्सा और झुंझलाहट निकालने का सबसे आसान माध्यम एक गाली ही बन जाती है। बिना हिंसा किए, अपमान, निरादर, क्षोभ और प्रतिरोध की जितनी तीखी अभिव्यक्ति कुछ हिंदी गालियां कर देती हैं, उतनी कई बार लंबे भाषण भी नहीं कर पाते।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर गाली जायज़ है। लेकिन हर गाली को केवल खराब संस्कार कह देना भी उतना ही अधूरा विश्लेषण है।

गाली और बराबरी का नया विमर्श
एक दिलचस्प बदलाव और आया है। सदियों तक अधिकांश गालियां स्त्रियों के शरीर और रिश्तों के माध्यम से पुरुष का अपमान करती रहीं। यानी भाषा भी पितृसत्ता का औज़ार बनी रही।
लेकिन आज वही गालियां महिलाएं भी बोल रही हैं।
  • क्या यह भाषा का पतन है?
  • या भाषाई बराबरी का दावा?
उत्तर आसान नहीं है।
महादेवी वर्मा ने लिखा था कि "श्रृंखलाएँ केवल लोहे की नहीं होतीं, भाषा की भी होती हैं।" (भावार्थ) संभव है कि नई पीढ़ी उन्हीं भाषाई श्रृंखलाओं को तोड़ने की कोशिश कर रही हो। कुछ इसे पतन कहेंगे, कुछ इसे समानता का दावा। दोनों दृष्टियाँ विचारणीय हैं।

लेकिन सावधान...
यह लेख गालियों का समर्थन नहीं है। क्योंकि जिस दिन तर्क की जगह गाली ले लेगी, उस दिन लोकतंत्र कमजोर होगा। असहमति आवश्यक है। अपमान नहीं।
व्यंग्य लोकतंत्र को जीवित रखता है। लेकिन गाली यदि विचार का विकल्प बन जाए, तो वह संवाद नहीं, शोर पैदा करती है। यहीं सबसे बड़ी सावधानी की जरूरत है।
आज की भाषा में मीम हैं, रील हैं, तंज हैं, वायरल वीडियो हैं और गालियां भी। इनसे असहमत होना आपका अधिकार है।
लेकिन इनके अस्तित्व से इनकार करना शायद वास्तविकता से इनकार करना है। आखिरकार, सवाल यह नहीं कि समाज गालियां क्यों दे रहा है।

सवाल यह है कि समाज इतना गुस्से में क्यों है?
क्योंकि शब्द अपने आप पैदा नहीं होते, वे समय की कोख से जन्म लेते हैं। गालियाँ भाषा का सौंदर्य नहीं हैं,

लेकिन वे समाज की मनःस्थिति का एक्स-रे अवश्य हैं।
इसलिए हर गाली की आलोचना कीजिए, लेकिन उसे जन्म देने वाली सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों की भी पड़ताल कीजिए। क्योंकि भाषा कभी निर्वात में पैदा नहीं होती।
वह हमेशा समाज का आईना होती है। और आईना, चाहे कितना भी असुविधाजनक क्यों न लगे, झूठ नहीं बोलता।
लेखक के बारे में
संदीप सिंह सिसोदिया
वन-लाइनर बायो: IIM इंदौर से प्रशिक्षित और 20+ वर्षों का अनुभव रखने वाले डिजिटल मीडिया लीडर व वरिष्ठ संपादक, जिन्होंने BBC,  DW, Yahoo और MSN जैसे वैश्विक संस्थानों के साथ कार्य किया है। वे जियो-पॉलिटिक्स, पर्यावरण और समसामयिक  मुद्दों पर अपने प्रखर लेखन और गहन विश्लेषण के लिए विशेष रूप से.... और पढ़ें
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