Poem :जीना सीखिए
कवयित्री: पूर्वा मेहता
जीना सीखिए
जाना निश्चित है, इसलिए खुलकर जीना सीखिए,
कोई ग़म मिले अगर, तो उसे मुस्कुराकर पीना सीखिए।
ग़म के बादल आज हैं, कल छँट जाएँगे,
कभी बिन मौसम बरसात में भी भीगना सीखिए।
काँटे तो मिलेंगे राह में हर कदम पर,
चुभ जाएँ अगर, तो दर्द सहना सीखिए।
काँटे हैं अगर, तो फूल भी खिलेंगे ज़रूर,
उन काँटों के बीच से फूल चुनना सीखिए।
अकेले हो अगर कभी, तो कोई बात नहीं,
अपनी ही सोहबत में खुश रहना सीखिए।
साथ हो अगर कोई हमफ़र तुम्हारा,
तो एक-दूसरे के रंग में ढलना सीखिए।
जो मिला है तुम्हें, शायद किसी और को न मिला हो,
इसलिए जो पास है, उसी में खुश रहना सीखिए।
शुरुआत में सब आसान लगे, ज़रूरी तो नहीं,
हर नए बदलाव के साथ ढलना सीखिए।
कभी आग तो कभी दरिया है यह जीवन,
सूरज की तरह तपना और जलना सीखिए।
चलते-चलते अगर पाँव थक जाएँ कभी,
तो राह में दो पल ठहरना सीखिए।
रुक जाने से कोई कभी हारता नहीं,
फिर नई हिम्मत से आगे बढ़ना सीखिए।
मन में दबी हो कोई बात अगर,
तो अपनों से खुलकर कहना सीखिए।
बिन कहे भी कोई समझ ले भावनाएँ,
तो उस अनकहे अहसास को समझना सीखिए।
दूर सही मंज़िल, और मुश्किलें भी हैं हज़ार,
थोड़ा-सा धैर्य रखकर इंतज़ार करना सीखिए।
भूल हो जाए अगर कभी इंसान से,
उस भूल को खुलकर स्वीकारना सीखिए।
दिल से कोई माँगे अगर माफ़ी तुमसे,
तो मोम की तरह पिघलना सीखिए।
नामुमकिन कुछ भी नहीं, जो ठान लिया जाए,
हम किसी से कम नहीं, यह मान लिया जाए।
सिर्फ़ एक कदम बढ़ाओ आगे की तरफ़,
सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर चढ़ना सीखिए।
चाँद नहीं बन सके, तो तारा ही सही,
तारों की तरह रात में चमकना सीखिए।
विश्वास, सहारा और हिम्मत, वही ख़ुदा देगा,
ग़ैरों के बजाय उसी पर उम्मीद रखना सीखिए।
वो साथ है तुम्हारे हर एक लम्हे में,
धीरे-धीरे ही सही, वक़्त के साथ चलना सीखिए।
हर नई सुबह एक नया पैग़ाम लाती है,
इसलिए हर नए दिन मुस्कुराना सीखिए।
ज़िंदगी एक अनमोल सफ़र है जनाब,
इसे हर पल दिल से निभाना सीखिए।
जब तक साँस है, तब तक आस रखना सीखिए,
हर अँधेरे के बाद उजास रखना सीखिए।
वक़्त बदलता है, यह यक़ीन दिल में बसाए रखिए,
हर हाल में अपने रब पर भरोसा रखना सीखिए।
जो मिला है, उसका शुक्र अदा करना सीखिए,
और जो न मिला, उसके लिए सब्र करना सीखिए।
(समाप्त)

