कविता: लाल किला तुझे सलाम
देश की राजधानी दिल्ली में,
यमुना के तट पर
अडिग अविचल चुपचाप
खड़ा है लाल किला।
इस्लामी फ़ारसी तैमूरी
और हिन्दू शैलियों की
मिली जुली वास्तुकला का
बेजोड़ नमूना यह किला
बलुआ लाल पत्थरों की चादर
से खुद को ढांपे
अपने जख्मों को छुपाए
हंसता हुआ मिलता है
अपने दर्शनार्थियों-सैलानियों से।
अपने निर्माता शहंशाह शाहजहां से
लेकर अंतिम मुगल बादशाह
जर्जर बहादुर शाह जफर तक की
जीवित मृत कहानियों का
प्रत्यक्ष गवाह यह किला
आज भारत की आन है बान है शान है
और अनमोल धरोहर भी है।
आजादी ए जश्न का आधिकारिक
आंखों देखा हाल सर्व प्रथम
इसी ने सुनाकर
हमें किया था अभिभूत।
इसके गौरव और पतन की कथा
अतीत की गलियों से निकलकर
वर्तमान के चौराहों पर आकर हमें
करने लगती है उद्वेलित।
इसकी लाल आंखों ने
न जाने कितने
शौर्य के सिपाहियों
क्रांति दूतों, बलिदानियों के लहू से
कालिंदी को
लाल होते हुए देखा है।
आजादी के मोल का
स्मरण कराते इस किले पर
फहराता हमारा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा
अहर्निश हमें करता रहता है
रोमांचित-उल्लासित।
लाल किला तुझे सलाम।
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