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बाल कविता : महाराजा के घर

बुधवार,जून 17, 2020
Children Story
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सूरज से किरणे उतरी हैं, बैठ धूप के घोड़ों पर। नजर लगी है शीला के घर, बनते गरम पकोड़ों पर।
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मेरी गुड़िया पाठ पढ़ेगी, नन्हें-नन्हें छोटे से। पापा लेकर आए कॉपी, मम्मी लाई पेन।
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शहर छोड़ नानी घर आए। कूद नदी में खूब नहाए। पत्थर मार आम गिराए। नानी से सब सुनी कहानी। ठंडा है मटके का पानी।
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कोल्ड ड्रिंक भले हो बिकता, भाता सबको पानी है, दादा-दादी ताऊ-ताई पानी पीती नानी है
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लस्सी-शरबत-ठंडाई,पियो खूब, गर्मी आई! सड़कों पर है सन्नाटा-मारे लू सबको चांटा- दुबके रहे घरों में यार,
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मीठा है खट्टा है, कुछ-कुछ नमकीन। पी लो तो तबियत, हो जाए रंगीन। आम का पना है यह, आम का पना।
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हम बच्चे हिन्दुस्तान के। बच्चे हम संसार के।। कल-कल बहती नदियां हों, जल में पलता जीवन हो।
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पानी बादल से आता है,पानी नल से आता है। अगर कहीं छत टूटी हो तो, छत से भी आ जाता है।
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मैं नतमस्तक हो बाबा, श्रद्धा के फूल चढ़ाऊं, जय भीमा, जय भीमा, तेरे चरणों की धूल कहाऊं!! अर्थशास्त्री, कानून के ज्ञाता, भीमाबाई धर्मज्ञा माता,
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सूरज शिक्षक सरकारों को, नहीं दया हम पर आती है। किरणों के चाबुक से हमको, भरी दुपहरिया पिटवाती है।
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कल रात सपने में आया कोरोना.... उसे देख जो मैं डरातो मुस्कुरा के बोला मुझसे डरो ना... उसने कहा- कितनी अच्छी है तुम्हारी संस्कृति। न चूमते,न गले लगाते
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होली की मजेदार कविता- रम्मू जी ने पिचकारी में, रंग लबालब ठूंसा। दौड़े गम्मू के पीछे यूं, मार रहे हों घूंसा।
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हम भी पढ़े लिखे हैं भैया, हम भी पढ़े लिखे हैं। एक सुदूर गांव में रहते, करते रोज किसानी।
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पूछ रहे बिल्ली के बच्चे, डूबे गहन विचार में। चूहे क्यों न बिकते हैं मां, मेलों या बाज़ार में।
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परीक्षा के होते हैं, कितने ही रूप-रंग। कभी लिखित कभी मौखिक, तो कभी प्रकृति के संग।
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शीत लहर के पंछी आ गए, रुई के पंखे लगा-लगा कर। चारों तरफ धुंध दिन में भी, कुछ भी पड़ता नहीं दिखाई।
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कड़क ठंड है कहीं न जाएं। घर में रहकर मौज मनाएं। सूरज जब हड़ताल पर बैठा, पाएं न हम भी क्यों छुट्टी।
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बाल कविता : समय का मूल्य

बुधवार,फ़रवरी 12, 2020
रोज सुबह तड़के उठकर अब, सैर-सपाटे करना है। बड़े लगन से मेहनत करके,
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न से नफरत झ से झगड़ा कभी न पढ़ना भाई।
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