dharma sangrah

हिन्दी क‍‍विता : अन्नदाता

Updated: बुधवार, 5 सितम्बर 2018 (11:14 IST)
वे देश के अन्नदाता हैं
वो तमाम कष्ट सह
पेट पालता है तमाम जनता का 
अकाल, ओलावृष्टि, अतिवृष्टि
जैसी तमाम विपदाएं आ जाती हैं
उसके पास एक परम मित्र की तरह
या डायबिटीज की तरह 
बिना दरवाजे की कॉलबेल को बजाए
वह जिंदा रहता 
इन तमाम विपदाओं को झेलता 
मृत्यु से दो-दो हाथ करता
और देखता सुनता रहता है
तमाम दृश्य और श्रव्य माध्यमों पर 
इन विपदाओं को रोकने के 
सरकारी प्रयास को
बिना किसी प्रश्नचिन्ह के?
 

लेखक के बारे में
राकेशधर द्विवेदी

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