इस्मत चुगताई : बिंदास और बेबाक रचनाकार


चुगताई उर्दू ही नहीं भारतीय साहित्य में भी एक चर्चित और सशक्त कहानीकार के रूप में विख्यात हैं। उन्होंने आज से करीब 70 साल पहले महिलाओं से जुड़े मुद्दों को अपनी रचनाओं में बेबाकी से उठाया और पुरुष प्रधान समाज में उन मुद्दों को चुटीले और संजीदा ढंग से पेश करने का जोखिम भी उठाया।
आलोचकों के अनुसार इस्मत ने शहरी जीवन में महिलाओं के मुद्दे पर सरल, प्रभावी और मुहावरेदार भाषा में ठीक उसी प्रकार से लेखन कार्य किया है जिस प्रकार से प्रेमचंद ने देहात के पात्रों को बखूबी से उतारा है। इस्मत के अफसानों में औरत अपने अस्तित्व की लड़ाई से जुड़े मुद्दे उठाती है।

ऐसा नहीं कि इस्मत के अफसानों में सिर्फ महिला मुद्दे ही थे। उन्होंने समाज की कुरीतियों, व्यवस्थाओं और अन्य पात्रों को भी बखूबी पेश किया। यही नहीं वह अफसानों में करारा व्यंग्य भी करती थीं जो उनकी कहानियों की रोचकता और सार्थकता को बढ़ा देता है।
में सआदत हसन मंटो, इस्मत, कृष्णचंदर और राजिंदर सिंह बेदी को कहानी के चार स्तंभ माना जाता है। इनमें भी आलोचक मंटो और चुगताई को ऊँचे स्थानों पर रखते हैं क्योंकि इनकी लेखनी से निकलने वाली भाषा, पात्रों, मुद्दों और स्थितियों ने उर्दू साहित्य को काफी समृद्ध किया।

जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में प्राध्यापक असगर वजाहत ने बताया कि इस्मत की रचनाओं में सबसे आकर्षित करने वाली बात उनकी निर्भीक शैली थी। उन्होंने अपनी रचनाओं में समाज के बारे में निर्भीकता से लिखा और उनके इसी दृष्टिकोण के कारण साहित्य में उनका खास मुकाम बना।

वजाहत ने कहा कि आज साहित्य तथा समाज में स्त्री विमर्श की बात प्रमुखता से चल रही है। इस्मत ने आज से 70 साल पहले ही स्त्री विमर्श को प्रमुखता से साहित्य में स्थान दिया था। इससे पता चलता है कि उनकी सोच अपने समय से कितनी आगे थी।

उन्होंने अपनी कहानियों में स्त्री चरित्रों को बेहद संजीदगी से उभारा और इसी कारण उनके पात्र जिंदगी के बेहद करीब नजर आते हैं। वजाहत ने कहा कि इस्मत ने ठेठ मुहावरेदार गंगा-जमुनी भाषा का इस्तेमाल किया जिसे हिन्दी-उर्दू की सीमाओं में कैद नहीं किया जा सकता। उनका भाषा प्रवाह अद्भुत है। इसने उनकी रचनाओं को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस्मत अपनी ‘लिहाफ’ कहानी के कारण खासी मशहूर हुई। 1941 में लिखी गई इस कहानी में उन्होंने महिलाओं के बीच समलैंगिकता के मुद्दे को उठाया था। उस दौर में किसी महिला के लिए यह कहानी लिखना एक दुस्साहस का काम था। इस्मत को इस दुस्साहस की कीमत चुकानी पड़ी क्योंकि उन पर अश्लीलता का मामला चला, हालाँकि यह मामला बाद में वापस ले लिया गया।

आलोचकों के अनुसार उनकी कहानियों में समाज के विभिन्न पात्रों का आईना दिखाया गया है। इस्मत ने महिलाओं को उनकी असली जुबान के साथ अदब में पेश किया। उर्दू अदब में इस्मत के बाद सिर्फ मंटो ही ऐसे कहानीकार हैं जिन्होंने औरतों के मुद्दों पर बेबाकी से लिखा है। ऐसा माना जाता है कि 'टेढ़ी लकीरे' उपन्यास में इस्मत ने अपने जीवन को ही मुख्य प्लाट बनाकर एक महिला के जीवन में आने वाली समस्याओं को पेश किया है।
21 अगस्त 1915 में जन्मी इस्मत के लोकप्रिय कहानी संग्रहों में चोटें, छुईमुई, एक बात आदि शामिल हैं। टेढ़ी लकीर, जिद्दी, एक कतरा-ए-खून, दिल की दुनिया, मासूमा और बहरूप नगर उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं। 'टेढ़ी लकीर' पर उन्हें 1974 में गालिब अवार्ड मिला था। इस्मत ने ‘कागजी हैं पैरहन’ शीर्षक से अपनी आत्मकथा लिखी थी। उर्दू अदब की यह महान कहानी लेखिका 24 अक्टूबर 1991 को इस दुनिया से रुखसत हो गई।
भारतीय समाज में महिलाओं के मुद्दे, नजरिए और समस्याओं को बुलंदी से उठाने वाली का उर्दू अदब में खास मुकाम है और उन्होंने अपनी विशिष्ट शैली और मुहावरेदार जुबान के कारण अपने अफसानों में जिंदगी के तमाम रंगों को खूबसूरती से उकेरा है।

इस्मत का कैनवास काफी व्यापक था, जिसमें अनुभव के मुख्तलिफ रंग उकेरे गए हैं।



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