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Last Updated : गुरुवार, 4 जून 2026 (15:51 IST)

प्रकृति के साथ आत्मीयता: पर्यावरण संरक्षण का पहला कदम

Gurudev Sri Sri Ravi Shankar shows his affinity towards nature in this picture
- गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर
 
पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता और संरक्षण की भावना लोगों के मन में केवल शिक्षा के माध्यम से ही विकसित की जा सकती है। ऐसी शिक्षा जो केवल जानकारी देने तक सीमित न होकर जीवन के व्यापक दृष्टिकोण को भी जागृत करे। प्रकृति के प्रति श्रद्धा और सम्मान को पुनः स्थापित करे। पर्यावरण से हमारा संबंध मानवीय अनुभव का प्रथम स्तर है। जब हमारा परिवेश स्वच्छ, संतुलित और सकारात्मक होता है, तब उसका अनुकूल प्रभाव हमारे अस्तित्व के अन्य सभी आयामों पर भी पड़ता है।
 
इतिहास साक्षी है कि मानव मन और प्रकृति के बीच एक गहरा और आत्मीय संबंध बनाने का प्रयत्न सदा रहा है। जब हम प्रकृति और अपने स्वयं के अस्तित्व से दूर होने लगते हैं, तभी प्रदूषण और पर्यावरण विनाश की प्रवृत्तियां जन्म लेती हैं।
 
भारतीय परंपरा में प्रकृति को सदैव पूजनीय माना गया है। पर्वत, नदियां, वृक्ष, सूर्य, चंद्रमा और पंचमहाभूत, सभी श्रद्धा के पात्र रहे हैं। वस्तुतः विश्व की अनेक प्राचीन सभ्यताओं में भी प्रकृति के प्रति यही गहन आदरभाव विद्यमान था। आज आवश्यकता इस बात की है कि मानव मन को तनाव और लोभ से मुक्त कर पुनः उसी श्रद्धा और संवेदनशीलता से जोड़ा जाए।
 
हमारे अनुसंधान केंद्र में किए गए एक अध्ययन में यह पाया गया कि ध्यान और साधना की प्रक्रियाएं पर्यावरणीय कार्यों में सामुदायिक सहभागिता तथा व्यवहार परिवर्तन को प्रोत्साहित करती हैं। इसे ‘सामूहिक प्रभाव’ (Collective Effect) कहा जाता है, अर्थात वह सकारात्मक परिवर्तन जो समाज के लोगों के पर्यावरण के प्रति दृष्टिकोण और आचरण में दिखाई देता है।
 
पंचमहाभूत एक-दूसरे से अत्यंत गहराई से जुड़े हुए हैं। इनमें से किसी एक तत्व का प्रदूषण शेष चारों को भी प्रभावित करता है। इन्हें अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। यदि आप प्लास्टिक जलाते हैं, तो वह केवल पृथ्वी को ही नहीं, वायु को भी प्रदूषित करता है। यदि उसे जल में फेंक दिया जाए, तो वह जल को भी उतना ही दूषित कर देता है।
 
वृक्षों को धरती के फेफड़े कहा जाता है और यह उपमा पूर्णतः उचित है। इसलिए हमें अधिकाधिक वृक्षारोपण करना चाहिए। हमारे प्राचीन शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति एक वृक्ष काटे, उसे पांच नए वृक्ष लगाने चाहिए। प्रकृति स्वयं हमें सतत और संतुलित सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाती है। यदि हम किसी वन में जाएं, तो देखेंगे कि असंख्य जीव-जंतु वहां निवास करते हैं, परंतु वे मनुष्यों की भांति अपने परिवेश को गंदा नहीं करते।
 
प्रकृति में पांचों तत्व परस्पर भिन्न और कभी-कभी विरोधी प्रतीत होते हैं। पशु जगत में भी अनेक प्रजातियां एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी हैं, फिर भी प्रकृति में संतुलन बना रहता है। केंचुए इसका सुंदर उदाहरण हैं, जो अपशिष्ट को पुनर्चक्रित कर जीवन को पोषित करने वाली उर्वरता में परिवर्तित कर देते हैं।
 
जब हमें यह अनुभूति होती है कि हमारा जीवन पर्यावरण के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है, तब उसके प्रति संवेदनशीलता स्वतः विकसित होने लगती है। तापमान में कुछ डिग्री का परिवर्तन भी मनुष्य को असुविधा पहुंचा सकता है। इसी प्रकार वर्षा के समय में कुछ सप्ताह या महीनों का परिवर्तन कृषि व्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
 
पर्यावरणीय संवेदनशीलता तभी विकसित होती है जब हम अपने अस्तित्व की व्यापकता के प्रति सजग होते हैं और यह सजगता अध्यात्म के माध्यम से ही आती है।
 
अतः हमें अपनी आध्यात्मिक जड़ों की ओर लौटना होगा और इस जागरूकता को पुनः स्थापित करना होगा। हमें मानव मन के उस मूल स्रोत को संबोधित करना होगा, जहां से असंवेदनशीलता और उपेक्षा भी उत्पन्न होती है तथा करुणा और संरक्षण की भावना भी। जब हमारे भीतर करुणा और स्नेह का दीप प्रज्वलित होता है, तब उसका प्रतिबिंब हमारे पर्यावरण के प्रति व्यवहार में भी दिखाई देता है। प्रकृति के प्रति पवित्रता का भाव स्वतः विकसित हो जाता है।
 
हमें इस धरती के साथ आत्मीयता का संबंध स्थापित करना होगा। वृक्षों, नदियों और समस्त मानव समाज को अपना मानना होगा। प्रकृति और प्रत्येक प्राणी में ईश्वर का दर्शन करना होगा। यही दृष्टि संवेदनशीलता को जन्म देती है और जो व्यक्ति संवेदनशील होता है, वह प्रकृति के प्रति उदासीन नहीं रह सकता।
 
हमने अनेक आदिवासी और मूलनिवासी समुदायों में यह भाव स्पष्ट रूप से देखा है कि वे अपने परिवेश और प्रकृति को श्रद्धापूर्वक सम्मान देते हैं और उसकी रक्षा को अपना कर्तव्य मानते हैं। यही वह चेतना है जिसे आज पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।
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