यदि आपसे पूछा जाए कि किसे कहते हैं भारत माता, तो आप क्या कहेंगे? निश्चित ही इस क्रम में सबसे पहले भारत की भूमि आती है। जिस भूमि ने हमें जन्म दिया वही तो माता है। भारत की भूमि- उत्तर में हिमालय, दक्षिण में हिंद महासागर, पूरब-पश्चिम में फैली नदियां, हरे-भरे जंगल और उपजाऊ मैदान- इस पूरे प्राकृतिक स्वरूप को हम सामूहिक रूप से 'भारत माता' कहते हैं, जो एक मां की तरह हमारा भरण-पोषण करती है, लेकिन बहुत दुख की बात है कि अब खुद भारतीयों ने अपनी मां का चीरहरण कर दिया है। भारत माता की छाती को चीर कर किया जा रहा देश का आज का विकास जिस रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, उसकी एक भारी कीमत हमारी प्रकृति और पर्यावरण चुका रहे हैं।
1. पहाड़ों का संकट (कंक्रीट के जंगल और खनन)
प्राकृतिक सुरक्षा चक्र: पहाड़ तूफानों, अत्यधिक गर्मी और हानिकारक अल्ट्रावॉयलेट (पराबैंगनी) किरणों से हमारी रक्षा करते हैं। ये मौसम के चक्र को बनाए रखकर इंसानों को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रखते हैं।
जल और जड़ी-बूटियों का भंडार: पहाड़ वर्षा जल को सहेजकर भू-जल स्तर बनाए रखते हैं और नदियों, झीलों व झरनों के स्रोत हैं। साथ ही, ये दुर्लभ औषधियों (जैसे धोसी पहाड़ी की वनस्पतियां) और वन्यजीवों का ठिकाना हैं।
विनाश के दुष्परिणाम: बाईपास सड़कों और खनिजों के लिए हजारों साल में बने पहाड़ों को कुछ ही वर्षों में नष्ट किया जा रहा है। इससे जलवायु बदल रही है, बीमारियां बढ़ रही हैं, जल स्तर घट रहा है और भूकंप का खतरा बढ़ रहा है।
2. नदियों का संकट और मानवीय प्रदूषण
अस्तित्व पर मंडराता खतरा: बांधों के निर्माण, रेत खनन, औद्योगिकीकरण और अत्यधिक दोहन के कारण गंगा, यमुना और नर्मदा जैसी प्रमुख नदियां लुप्त होने की कगार पर हैं।
धार्मिक और सामाजिक प्रदूषण: आस्था के नाम पर मूर्तियों का विसर्जन, शवों को बहाना, प्लास्टिक, टनों हार-फूल और सीवेज डालने से नदियां जहरीली हो रही हैं। अकेले गंगा में रोजाना 2 करोड़ 90 लाख लीटर कचरा, 138 बड़े नाले और 764 से अधिक फैक्ट्रियों का केमिकल गिर रहा है।
पारिस्थितिकी को नुकसान: नदियों का पानी अब फसलों की सिंचाई के लायक भी नहीं बचा है। प्रदूषण के कारण मीठे पानी की दुर्लभ डॉल्फिन, मगरमच्छ और हजारों जलीय जीवों का जीवन खतरे में है।
3. वनों की कटाई और ऑक्सीजन की कमी
जंगलों का सिकुड़ना: शहरीकरण के चलते जंगल छोटे हो रहे हैं, जिससे हानिकारक गैसों (CO2, CO, CFC) को सोखने और ऑक्सीजन देने की धरती की क्षमता घट रही है। इसके कारण वन्यजीव और दुर्लभ वनस्पतियां लुप्त हो रही हैं।
परियोजनाओं का प्रभाव: पुनासा डैम (इंदिरा सागर परियोजना) के कारण 41,111 हेक्टेयर वन भूमि जलमग्न हो गई और लाखों पेड़ कट गए। भारत के 5,700 से अधिक बड़े बांध वनों को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
कटाई के आंकड़े और ग्लोबल वार्मिंग: पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, विकास कार्यों के लिए हर साल 15 से 30 लाख पेड़ कानूनी रूप से और करोड़ों पेड़ अवैध रूप से काटे जाते हैं। 1 पेड़ के बदले 10 पौधे लगाने का नियम सिर्फ कागजों पर है, जिससे 'ट्री कवर' तेजी से घट रहा है और ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है।
4. खनन से खोखली होती भूमि
उत्खनन के 5 मुख्य क्षेत्र: भारत में पांच प्रमुख जगहों पर अंधाधुंध दोहन हो रहा है- नदियों के पास, पहाड़ों की कटाई, खनिज/धातु/हीरा क्षेत्रों में, समुद्री इलाकों में और पानी के लिए धरती के भीतर हजारों फीट गहरे बोरिंग। एक ही जिले में लाखों बोरिंग हो चुके हैं।
खदानों के सरकारी आंकड़े: भारतीय खान ब्यूरो के अनुसार देश में करीब 3,100 से अधिक सक्रिय बड़ी खदानें हैं। इनमें:
ईंधन खदानें (कोयला/लिग्नाइट): 550 से अधिक
धात्विक खदानें (लोहा/सोना/बॉक्साइट): 560 से अधिक
अधात्विक खदानें (चूना पत्थर/डोलोमाइट): 1,970 से अधिक
अग्रणी राज्य और अवैध खनन: मध्य प्रदेश (390+ ब्लॉक) और गुजरात (290+) खदानों की संख्या में आगे हैं, जबकि झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ भारी खनिजों के बड़े उत्पादक हैं। इसके अलावा लोकल स्तर पर रेत और गिट्टी के लिए हो रहा अवैध खनन प्रकृति को सबसे ज्यादा खोखला कर रहा है।
5. निष्कर्ष: क्या यह वाकई विकास है?
भविष्य का संकट: यदि यही रफ्तार रही तो आने वाली पीढ़ियां कभी असली पेड़ या पहाड़ नहीं देख पाएंगी और उनके हिस्से में सिर्फ एक बीमार और कमजोर धरती आएगी।
सतत विकास की मांग: सड़कें, अस्पताल और उद्योग जरूरी हैं, लेकिन यह प्रकृति की कीमत पर नहीं होना चाहिए। हमें पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली अपनानी होगी और विकास को प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर (Sustainable Development) आगे बढ़ाना होगा।