योगिनी एकादशी व्रत रखने का महत्व और कथा
Yogini Ekadashi Vrat Katha: सनातन धर्म में एकादशी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। वर्ष भर आने वाली 24 और अधिकमास सहित 26 एकादशियों में योगिनी एकादशी का स्थान अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। यह व्रत भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित होता है और मान्यता है कि श्रद्धा एवं विधि-विधान से इस व्रत का पालन करने से व्यक्ति के पापों का क्षय होता है, जीवन की बाधाएं दूर होती हैं तथा सुख-समृद्धि और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।ALSO READ: Yogini Ekadashi 2026: योगिनी एकादशी का व्रत कब रखा जाएगा?
आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाई जाने वाली योगिनी एकादशी का उल्लेख विभिन्न धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में मिलता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने, भगवान विष्णु की पूजा करने, विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने तथा दान-पुण्य करने से अनेक यज्ञों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। यह एकादशी केवल आध्यात्मिक उन्नति का ही नहीं, बल्कि आत्मसंयम, सात्विक जीवन और ईश्वर के प्रति समर्पण का भी संदेश देती है।
आइए जानते हैं योगिनी एकादशी व्रत का महत्व और इसकी पौराणिक व्रत कथा:
योगिनी एकादशी व्रत का महत्व:
योगिनी एकादशी का महत्व स्वयं भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था। इसकी मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने का फल: शास्त्रों के अनुसार, योगिनी एकादशी का व्रत रखने से मिलने वाला पुण्य 88,000 ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर होता है।
पापों और श्रापों से मुक्ति: यदि किसी व्यक्ति से जाने-अनजाने में कोई बड़ा पाप हो गया हो या वह किसी के श्राप से पीड़ित हो, तो इस व्रत के प्रभाव से उसे मुक्ति मिल जाती है।
कुष्ठ और अन्य रोगों का नाश: यह एकादशी शारीरिक कष्टों, विशेषकर कुष्ठ रोग (Skin Diseases) और असाध्य बीमारियों से मुक्ति दिलाने वाली मानी गई है।
मोक्ष की प्राप्ति: जो व्यक्ति पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ यह व्रत रखता है, उसे अंत में भगवान विष्णु के चरणों में स्थान यानी वैकुंठ धाम मिलता है।
योगिनी एकादशी की पौराणिक व्रत कथा
पद्म पुराण के अनुसार, अलकापुरी नगरी में कुबेर नाम का एक राजा रहता था। वह भगवान शिव का परम भक्त था और रोज उनकी पूजा करता था। हेमा नाम का एक माली राजा कुबेर के लिए पूजा के फूल लाया करता था। हेमा माली अपनी पत्नी विशालाक्षी से अगाध प्रेम करता था और वह बहुत सुंदर थी। एक दिन, हेमा माली मानसरोवर से शिव पूजा के लिए फूल तो ले आया, लेकिन घर आने पर वह अपनी पत्नी के प्रेम मोह में खो गया और राजा कुबेर के दरबार में फूल पहुंचाना भूल गया।
वहां राजा कुबेर दोपहर तक पूजा के लिए फूलों का इंतजार करते रहे। जब माली नहीं आया, तो राजा ने अपने सैनिकों को भेजा। सैनिकों ने आकर बताया कि हेमा माली घर पर अपनी पत्नी के साथ आमोद-प्रमोद में व्यस्त है। यह सुनकर कुबेर क्रोध से आगबबूला हो गए और उन्होंने तुरंत हेमा माली को दरबार में हाजिर करने का आदेश दिया।
डर से कांपता हुआ हेमा माली राजा कुबेर के सामने उपस्थित हुआ। कुबेर ने क्रोध में आकर कहा: 'अरे पापी! तूने भगवान शिव का अनादर किया है। मैं तुझे श्राप देता हूं कि तू स्त्री के वियोग का दुख भोगेगा और मृत्युलोक/ पृथ्वी पर जाकर कुष्ठ रोगी बनेगा।'
कुबेर के श्राप के प्रभाव से हेमा माली स्वर्ग से सीधे पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसकी पत्नी उससे अलग हो गई और उसके पूरे शरीर में कोढ़ यानी कुष्ठ रोग हो गया। वह जंगलों में भूख-प्यास से भटकता रहा। शिव जी की पूजा के प्रभाव के कारण उसकी बुद्धि नष्ट नहीं हुई थी, इसलिए उसे अपने पाप का अहसास था। भटकते-भटकते एक दिन वह मार्कंडेय ऋषि के आश्रम में पहुंचा। हेमा माली ने ऋषि के चरणों में गिरकर रोते हुए अपनी पूरी कहानी सुनाई।
मार्कंडेय ऋषि को उस पर दया आ गई। उन्होंने कहा, 'तुमने सबकुछ सच बोला है, इसलिए मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूं। तुम आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो। इस व्रत के पुण्य से तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।' हेमा माली ने ऋषि के कहे अनुसार पूरी श्रद्धा के साथ योगिनी एकादशी का व्रत रखा। इस व्रत के प्रभाव से उसका कुष्ठ रोग पूरी तरह ठीक हो गया, वह फिर से अपने दिव्य रूप में आ गया और स्वर्ग लौटकर अपनी पत्नी के साथ खुशी-खुशी रहने लगा।
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