धूम्रपान एक व्यसन या एक रोग

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धूम्रपान से किसी का भला नहीं होता। तंबाकू में एक भी स्वास्थ्यवर्धक गुण नहीं है। धूम्रपान न सिर्फ सिगरेट या बीड़ी पीने वालो की सेहत खराब करता है बल्कि उन लोगों को भी अपनी चपेट में ले लेता है जो खुद सिगरेट या बीड़ी नहीं पीते लेकिन उन लोगों के साथ जीवन बिताने के लिए विवश हैं। सिगरेट या बीड़ी से कोसों दूर रहने वाले रिश्तेदार तथा ऑफिस में काम करने वाले सहकर्मी बेवजह पैसिव स्मोकिंग के शिकार होते हैं।

धूम्रपान करने वाले भाइयों और बहनों को मेरा प्यार भरा सलाम। वो एक ऐसे समुदाय के सदस्य हैं जिन्होंने इस भारत भूमि से जल्दी रुखसत होने का इंतजाम किया है ताकि उनके हिस्से की रोटी किसी और को नसीब हो सके। उन्हें इसलिए भी सलाम कि वो सचमुच ऐसी आदत के गुलाम हैं जिससे सांप्रदायिक सद्भाव और सामजिक समानता की झलक मिलती है।

सच है कि सिगरेट या बीड़ी का धुआँ किसी मजहब और प्रांत को नहीं पहचानता, किसी रिजर्वेशन या राजनीतिक झुकावों को नहीं जानता। उसका सबके लिए एक ही पैगाम है, और वह है मौत।

तंबाकू का धुआँ हर साल लाखों लोगों को असमय काल के गाल समा देता है। इसमें ज्यादातर लोगों में मौत का कारण हृदयाघात या लकवा होता है। उम्र के 25 साल पूरे होने से पहले धुआँ उड़ाने वालों की औसत आयु 10 वर्ष तक कम हो जाती है। इसका अर्थ यह हुआ कि 65 वर्ष जीने की संभावना घटकर 55 पर आ जाती है।

इसका दुखद पहलू यह भी है कि इससे होने वाली हृदय या दिमाग की बीमारी इंसान के सबसे सुनहरे वर्षों को लील जाता है। 45-60 वर्ष की आयु में ही व्यक्ति अपने करियर के शिखर पर होता है और उन्हीं दिनों में ये बीमारी वार करती है।

तंबाकू का धुआँ हृदय और दिमाग की नाड़ियों पर कई तरह से वार करता है। एक तो ये कि हृदय का रोग तेज रफ्तारी के साथ बहुत कम उम्र में जकड़ लेता है। दूसरे बीमारी एक बार पनपने के बाद बढ़ती भी बहुत जल्दी है। ऐसे में बार-बार तकलीफ होने की आशंका बनी रहती है। तीसरे नाड़ियों का आकार भी घट जाता है।

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डॉ. इदरीस ख़ा
जिससे कि एंजियोप्लास्टी अथवा बायपास का रिजल्ट भी खराब होता है। यदि एंजियोप्लास्टी या बायपास करवाकर भी ये व्यसन नहीं छोड़ा तो अगली प्रक्रिया के लिए भी पहले ही सामान बंध जाता है। बशर्ते कि जीवित रहे।

 

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