दिलीप कुमार : एक महानायक की गाथा

पगडंडी से राजमार्ग का सफर

Dilip Kumar
IFM
सरवर खान देवलाली और मुंबई के बीच आवाजाही किया करते थे। परिवार घर में प्रसन्न था। लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध के समय देवलाली को फौजी स्टेशन घोषित कर दिया गया और यहाँ की सारी इमारतें सरकार ने अपने कब्जे में ले लीं। खान परिवार को भी अपना बंगला छोड़कर मुंबई आना पड़ा। पहले तो उसने बांद्रा में पाली माला रोड पर एक मकान किराए पर लिया, जो के पाली हिल रोड स्थित बंगले से बहुत दूर नहीं है। मुंबई में यूसुफ और उसके छोटे भाई नासिर ने अंजुमन इस्लामिया स्कूल में दाखिला लिया, जहाँ दोनों भाइयों ने मुकरी (हास्य कलाकार) की दोस्ती पाई।

इस स्कूल से यूसुफ ने हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसके बाद यूसुफ की दिलचस्पी अँगरेजी और उर्दू साहित्य की पढ़ाई करने में थी, लेकिन पिता के आदेश पर उन्होंने विज्ञान स्नातक होने के लिए विल्सन कॉलेज में दाखिला लेकर बॉटनी, जूलाजी और मैथ्‍स पढ़ना शुरू किया। इस कॉलेज में उसे फुटबॉल खेलने का अवसर नहीं मिला तो यूसुफ ने खालसा कॉलेज में दाखिला ले लिया। स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई के दौरान फुटबॉल यूसुफ का पहला प्यार था। अपने कॉलेज के दिनों में वह एक लोकप्रिय खिलाड़ी था। आसपास के सिख टैक्सी ड्राइवर उसका खेल देखकर बहुत खुश होते थे। वे अपने इस प्रिय फुटबॉलर को यूसुफ शाहजी कहकर पुकारा करते। यूसुफ एक स्थानीय क्लब बॉम्बे मुस्लिम्स की तरफ से भी फुटबॉल खेलता था। उसका दूसरा प्रिय खेल क्रिकेट था।

देविका रानी से मुलाकात
पिता के व्यवसाय में घाटा हो जाने के कारण यूसुफ को कॉलेज की पढ़ाई अधूरी छोड़नी पड़ी। उन्होंने पुणे के फौजी कैंटीन में मामूली नौकरी कर ली और फलों का व्यवसाय भी जारी रखा। अँगरेजी आती थी इसलिए वे ब्रिटिश सैनिकों में घुलमिल गए और उनके साथ फुटबॉल भी खेलने लगे। वे बहुत खुशनुमा दिन थे। वे कमा रहे थे और घर पैसे भी भेज रहे थे। यहीं उन्हें एक महाराष्ट्रीयन लड़की से प्रेम हुआ। छह महीने बाद वे पुणे से मुंबई लौट आए। यह 1943 का साल था। मुंबई में यूसुफ अपने पिता के व्यवसाय को फिर से शुरू करने की सोच ही रहे थे कि अब्बा ने उन्हें राय-मशविरे के लिए पारिवारिक मित्र डॉ. मसानी के पास भेजा।

डॉ. मसानी को पता था कि यूसुफ की उर्दू अच्छी है और साहित्य में भी उनकी रु‍चि है, इसलिए उन्होंने उन्हें देविका रानी से मिलने की सलाह दी जो उन दिनों बॉम्बे टॉकिज का संचालन कर रही थीं। बॉम्बे टॉकिज उन दिनों प्रसिद्ध फिल्म निर्माण संस्था थी। डॉ. मसानी देविका रानी के भी पारिवारिक चिकित्सक थे। यूसुफ ने देविका रानी से भेंट की और रायटर (लेखक) के रूप में रखने का अनुरोध किया, लेकिन यूसुफ की शक्ल को देखकर उन्होंने उन्हें एक हजार रुपए प्रतिमाह पर अभिनेता के रूप में नियुक्ति दे दी। देविका रानी ने ही यूसुफ खान को अपना फिल्मी नाम दिलीप कुमार रखने की सलाह दी थी।

झूठ बोले : कौआ नहीं काटा!
यूसुफ खान ने जब बॉम्बे टॉकिज में काम शुरू किया तो अपने अब्बा को नहीं बताया कि एक्टर बन गया हूँ। सरवर खान फिल्मी लोगों के बारे में अच्‍छे विचार नहीं रखते थे। उनका फिल्मी नाम दिलीपकुमार रखा गया तो उन्होंने राहत महसूस की। उन्होंने बताया कि मैं ग्लैक्सो कंपनी में काम करता हूँ। पिता ने तुरंत खुश होकर आदेश दिया कि नियमित रूप से ग्लैक्सो कंपनी के बिस्किट घर में आते रहना चाहिए। क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध की वजह से खाद्यान्न का बड़ा टोटा था और परिवार बड़ा था। इससे दिलीप कुमार एक नई मुसीबत में फँस गए।

ऐसे में कॉलेज का एक मित्र काम आया, जो शहर में जहाँ भी ग्लैक्सो बिस्किट मिलते, इकट्‍ठे करके पार्सल दिलीप तक पहुँचा देता। दिलीप स्टूडियो से घर लौटते समय खोका कुछ इस तरह ले जाते मानो माल सीधे फैक्टरी से चला आ रहा है। लेकिन एक दिन राजकपूर के दादा दीवान बशेशरनाथ ने भांडा फोड़ ही दिया, जिन्हें सरवर खान 'कंजर' कहकर ताना मारते थे, क्योंकि उनका बेटा पृथ्वीराज फिल्मों में काम करता था। एक दिन बशेशरनाथ फिल्म 'ज्वारभाटा' का पोस्टर लेकर ही क्राफोर्ड मार्केट की दुकान पर पहुँच गए और यूसुफ का चित्र दिखाया। सरवर ने कहा, लगता तो यूसुफ जैसा ही है। दीवानजी ने फरमाया, यूसुफ ही है। अब तू भी कंजर हो गया। कुछ समय नाराज रहने के बाद उन्होंने यूसुफ को माफ कर दिया।

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दिलीप कुमार की फिल्म 'शहीद' उन्होंने परिवार के साथ बैठकर देखी थी और फिल्म उन्हें पसंद आई थी। फिल्म का अंत देखकर उनकी आँखों में आँसू आ गए थे और उन्होंने यूसुफ से कहा था कि आगे से अंत में मौत देने वाली फिल्में मत करना। इत्तफाक देखिए कि दिलीप कुमार ने ‍फिल्मों में ‍जितने मृत्यु दृश्य किए हैं, उतने किसी अन्य भारतीय अभिनेता ने नहीं दिए। यही नहीं, वे हिन्दी सिनेमा में 'ट्रेजेडी-किंग' कहलाए।



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