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ध्यान की कला: स्वयं की खोज की ओर एक यात्रा

Updated: गुरुवार, 18 जून 2026 (16:53 IST)
प्रतिवर्ष 21 दिसंबर को विश्व ध्यान दिवस मनाया जाता है। इस दिन को मनाने की शुरुआत 2024 से हुई जब संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly) ने 21 दिसंबर को विश्व ध्यान दिवस के रूप में घोषित किया है। ध्यान को अंग्रेजी में मेडिटेशन कहते हैं लेकिन इसके लिए यह सही शब्द नहीं है। अवेयरनेस इसके ज्यादा करीब है। 
 
ध्यान की कला: स्वयं की खोज की ओर एक यात्रा
"ध्यान हमारा स्वभाव है, जिसे हमने संसार की चकाचौंध में कहीं खो दिया है।"- ओशो
 
अक्सर लोग पूछते हैं कि ध्यान कैसे करें? यह सवाल वैसा ही है जैसे पूछना कि 'कैसे जिएं' या 'कैसे प्यार करें'। जिस तरह हंसना और रोना सीखा नहीं जाता, वैसे ही ध्यान भी सिखाया नहीं जाता; इसे बस पुनः खोजा जाता है।
 
ध्यान के चार मूलभूत स्तंभ:-
यदि आप ध्यान की शुरुआत करना चाहते हैं, तो इन चार तत्वों पर ध्यान देना अनिवार्य है:
1. श्वास की गति (Breath)
2. मानसिक हलचल (Mental Chatter)
3. ध्यान का लक्ष्य (Object of Focus)
4. होशपूर्वक जीना (Mindful Living)
 
1. श्वास की गति: (भीतर और बाहर का सेतु)
श्वास ही वह कड़ी है जो हमें बाहरी दुनिया से आंतरिक जगत से जोड़ती है।
गति का विज्ञान: क्रोध में श्वास तेज होती है, शांति में धीमी। श्वास को नियंत्रित कर आप अपने मन और आयु, दोनों को नियंत्रित कर सकते हैं।
ध्यान में उपयोग: जब मन भटके, तो बस अपनी आती-जाती श्वास पर ध्यान टिका दें। गहरी श्वास लेना और उसे धीरे-धीरे छोड़ना मस्तिष्क को स्थिर कर देता है।
 
2. मानसिक हलचल: (विचारों के शोर को थामना)
ध्यान में जाने के लिए मन की गति को समझना जरूरी है। विचारों और कल्पनाओं के प्रवाह को रोकने के लिए ये 3 सरल उपाय अपनाएं:
पुतलियों की स्थिरता: आंखें बंद करें और अपनी पुतलियों को हिलने न दें।
जीभ को विराम: ध्यान के दौरान अपनी जीभ को बिल्कुल स्थिर रखें।
तत्काल सजगता: जैसे ही कोई विचार आए, बिना जोर-जबरदस्ती के उसके प्रति सजग हो जाएं और सोचना बंद कर दें।
 
3. ध्यान के प्रकार और लक्ष्य:  
आप अपनी रुचि के अनुसार 'आकार' या 'निराकार' विधि चुन सकते हैं:-
निराकार ध्यान: बंद आंखों के सामने के अंधेरे को देखें या सन्नाटे की गूंज (ॐ की ध्वनि) को सुनने का प्रयास करें। यह आपको शून्यता और गहरे मौन से जोड़ता है।
आकार ध्यान: किसी प्राकृतिक दृश्य, पहाड़ या अपने इष्टदेव की कल्पना करें। यह शुरुआती साधकों के मन को भटकने से रोकने में कारगर है।
 
4. होशपूर्वक जीना: (यंत्रवत जीवन से मुक्ति)
क्या आप वाकई होश में जी रहे हैं? अक्सर हम मशीन की तरह काम करते हैं- गाड़ी चलाते वक्त या चलते वक्त हमारा मन कहीं और होता है।साधना: जो भी कार्य करें, पूरे होश के साथ करें। महसूस करें कि आपका हाथ कहाँ है, पैर कहाँ हैं।
द्रष्टा भाव: खुद को 'गूगल अर्थ' की तरह देखें। कल्पना करें कि कोई ऊपर से आपको देख रहा है- वह 'कोई' और नहीं, आपका अपना ही जागरूक स्वरूप है।सार: इस यंत्रवत (Automatic) जीवन को छोड़ देना और हर क्षण के प्रति जागृत हो जाना ही वास्तविक ध्यान है।
 
 
 
लेखक के बारे में
अनिरुद्ध जोशी
पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों से साहित्य, धर्म, योग, ज्योतिष, करंट अफेयर्स और अन्य विषयों पर लिख रहे हैं। वर्तमान में विश्‍व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं। दर्शनशास्त्र एवं ज्योतिष: मास्टर डिग्री (Gold Medalist), पत्रकारिता: डिप्लोमा। योग, धर्म और ज्योतिष में विशेषज्ञता।.... और पढ़ें

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