पुराने मांजे से नई पतंग भला कित्ती उड़ेगी?
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मियां, इस मुल्क में अंगरेजों के जमाने से ई सिस्टम बदलने की खुराफातें चल रई हें। सिस्टम ने जब अपनी जनम कुंडली दिखवाई तो पता चला के उसका गुरु तो हमेशा से तगड़ा रिया हे। उसका कोई कुछ बिगाड़ना चाहे भी तो नई बिगाड़ सकता। उसे सारी इनर्जी अपने भीतर से मिलती हे। उसे कोई ने बनाया नई, वो खुद अपने वजूद में आ गया हे।
लोग उसके चेहरे को किसी एक एंगिल से देखने की कोशिश करते रेते हें ओर उसी में तब्दीली लाने का दम भरते रेते हें। मगर वो हे के खरे की माफिक कभी नई बदलता। कोई ने गुस्से में सिस्टम के पिछवाड़े भी चोट करी तो वो हंसने लगता हे। ये सोचकर के क्या उखाड़ लोगे मेरा।
कभी उसने जात-पांत का मुखोटा ओढ़ा तो कभी छुट्टे आर्थिक सांड की तरह लाज-शरम की हर दीवार को ढहाने की कोशिश करी। जब खास लोगों का समाज पे कब्जा होता दिखने लगा तो वो आम आदमी के नाम से सड़कों पे निकल पड़ी। अभी भेड़चाल का करसर इसी पे अटका हुआ हे। कुछ दिन बाद नई फाइल खुल जाएगी।
सिस्टम बोला के मियां, हेरानी इसी बात पे हे के लोग हमे बनाते ई इस नीयत से हें के उनकी दुकान चले। अभी कोन से फरक पड़ रिया हे। बस, लोग पुरानी दुकान पे नया बोर्ड लगवाना चाह रिए हें। सब को टोपी पिन्हाना चाह रिए हें। पर सवाल ये हे के मुझे बदलने के नारे से वोट ओर नोट भले मिल जाएं, पर खोट का इलाज कोन करेगा? मेरी खोट में ई तो दुकानदारी का खाद-पानी हे। लिहाजा मुझे कोई क्यूं बदलना चाहेगा। मेंने कोई का क्या बिगाड़ा हे?

