जापान आए हैं तो मातृभाषा बोलिए या जापानी!
अतिथि की कलम से...
-बालेन्दु दाधीच
दिसंबर 2008 के मध्य में टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज के आमंत्रण पर जापान की यात्रा पर रवाना होने से पहले किताबों और
पत्र-पत्रिकाओं में पढ़े वहाँ के कुछ प्रतीक मेरे मन में थे। जैसे कि वहाँ के बौद्ध मठ-मंदिर, जापानी राजवंश, बीते जमाने के समुराई योद्धा, नए जमाने के सूमो पहलवान, महिलाओं का परिधान किमोनो, अनूठे हाथ-पंखे, जापानी गुड़ियाएँ, बहुचर्चित गीशा, माउंट फूजी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस का जापान प्रवास, एक नन्हा-सा देश होकर भी विश्व की नंबर दो आर्थिक महाशक्ति होने का चमत्कार, हिरोशिमा और नागासाकी की दुखद यादें आदि।
लेकिन, मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा था कि हमारी हिंदी भाषा से अपने संबंधों को लेकर भी जापान किसी किस्म का गौरव महसूस करता होगा। जापान में हिंदी के अध्यापन और प्रसार में जुटे विद्वान प्रोफेसर सुरेश ऋतुपर्ण ने जब बताया कि उनकी टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज में हिंदी के अध्यापन के सौ साल पूरे हो गए हैं तो आधुनिक भारत और जापान के संबंधों की गहराई का अहसास हुआ।
जापान विश्वविद्यालय में भारतीय अध्ययन की शुरुआत तो 1879 में ही हो गई थी, यानी कोई 130 साल पहले, जब भारत ब्रिटिश राज के अधीन हुआ करता था। यह 1868 में जापान के स्व-निर्वासन से बाहर आने के बाद की बात है, यानी मेईजी पुनर्स्थापन (सम्राट मेईजी के रेस्टोरेशन) के बाद की।
अपने एक सप्ताह के जापान प्रवास के दौरान अनेक बार महसूस होता रहा कि भारत, भारतीयता और भारतभाषा से जापानियों का संबंध महज उत्सुकता तक सीमित नहीं है। कहीं वह भगवान बुद्ध के जन्मस्थान के प्रति गहरी श्रद्धा के रूप में अभिव्यक्त हो रहा है तो कहीं हमारी आर्थिक प्रगति तथा तकनीकी उपलब्धियों की प्रशंसा भरी स्वीकारोक्ति के रूप में। मैंने अनेक अवसरों पर पाया कि भारत के प्रति जापानियों के मन में स्वाभाविक-सा लगाव या 'सॉफ्ट कॉर्नर' जरूर है।
सब सूना-सूना : ग्यारह दिसंबर 2008 की सुबह-सुबह हम एअर इंडिया के विमान से जापान की राजधानी टोक्यो पहुँचे पहुँचे तो देखा कि नरीता हवाई अड्डा तो एकदम सूना पड़ा है। न यात्रियों की भीड़, न सुरक्षा अधिकारियों की पंक्तियाँ और न बदहवासी की हालत में इधर-उधर भटकते हवाई अड्डा अधिकारी। जिज्ञासा हुई कि सब लोग आखिर कहाँ चले गए और क्यों? बाद में पता चला कि यह शांत सूनापन उस स्वतःस्फूर्त अनुशासन का हिस्सा है, जो दुनिया में सर्वाधिक घनी आबादी वाले टोक्यो शहर (वहाँ तीन करोड़ से अधिक लोग रहते हैं) के लोगों ने अपना लिया है।
दिल्ली की तुलना में लगभग ढाई गुना आबादी वाला शहर इतना शांत और सूना हो सकता है, यह मेरी कल्पना से बाहर था। लेकिन यही सच था। टोक्यो के बाजारों में, सड़कों पर, पार्कों में दिन के समय इक्का-दुक्का लोग ही दिखाई देते हैं। दिन में अगर वे दिखेंगे तो लोकल ट्रेन या ट्राम में और शाम को नजर आएँगे तो सुपरमार्केट में, रेस्तराओं में, मनोरंजन के स्थलों पर। दिन में सबके सब अपने दफ्तरों में या घरों में होंगे।
दुनिया की सबसे बड़ी और प्रसिद्ध ऑटोमोबाइल कंपनियाँ जापानी हैं, लेकिन सड़कों पर ट्रैफिक जाम की कोई समस्या नहीं। सबकी सब सड़कें खाली। यह चमत्कार कैसे हुआ? जापानियों ने निजी वाहनों को हतोत्साहित करते हुए सार्वजनिक यातायात को बढ़ावा देकर यह चमत्कार कर दिखाया। दिल्ली में घर से दफ्तर तक महज चार किलोमीटर की दूरी में एकाधिक स्थानों पर ट्रैफिक जाम से दो-चार होने वाले मुझ जैसे व्यक्ति के लिए तो यह सपना देखने जैसा था। मैं अनेक बार सोचता रहा कि क्या हम इस अनुशासन, स्वच्छंदता से विचरण करने की आजादी और समस्याहीनता को अपने यहाँ आयात नहीं कर सकते?
सिर्फ यही क्यों, हमारे आयात करने के लिए तो और भी बहुत कुछ है जापान में। उनका शालीन व्यवहार, दूसरों की निजता का सम्मान, किसी भी कार्य को बेहद लगन और मेहनत के साथ पूर्णता तक ले जाने की प्रवृत्ति, अपराधों का लगभग अभाव, अपने देश, संस्कृति और भाषा के प्रति गहरा सम्मान आदि आदि। जापान में अंग्रेजी की स्थिति शायद वैसी ही है जैसी हमारे यहाँ पुर्तगाली या कोरियाई भाषा की होगी। एक जापानी व्यक्ति किसी अन्य जापानी से अंग्रेजी में वार्तालाप करने की सोच भी नहीं सकता।
जापानी ही क्यों, वे तो किसी विदेशी से भी अंग्रेजी में बात नहीं करते। अपनी भाषा के प्रति गौरव का भाव रखने वाला कोई व्यक्ति भला किसी विदेशी भाषा में क्यों व्यवहार करना चाहेगा? आपको जापान के साथ व्यापार करना है, वहाँ व्यवसाय स्थापित करना है, नौकरी करनी है या घूमने जाना है तो जापानी सीखिए। जापानी भाषा के प्रति उनका यह आत्मविश्वास भरा गौरव भाव और हिंदी के प्रति हम बहुत सारे भारतीयों की हीनभावना दो विपरीत ध्रुवों के समान प्रतीत होते हैं।
अंग्रेजी तभी जब अपरिहार्य हो : प्रख्यात गीतकार कुँवर बेचैन और मैं जब टोक्यो से दिल्ली लौटने के लिए बस का इंतजार कर रहे थे तो
मैंने वहाँ पंक्तिबद्ध खड़े पच्चीस-तीस यात्रियों से पूछा कि क्या आपमें से कोई अंग्रेजी जानता है, यदि हाँ तो कृपया बताएँ कि क्या नरीता हवाई अड्डे के लिए बस यहीं से मिलती है? जवाब आना तो दूर कोई मेरे सवाल को समझा तक नहीं।दिसंबर 2008 के मध्य में टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज के आमंत्रण पर जापान की यात्रा पर रवाना होने से पहले किताबों और
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लेकिन, मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा था कि हमारी हिंदी भाषा से अपने संबंधों को लेकर भी जापान किसी किस्म का गौरव महसूस करता होगा। जापान में हिंदी के अध्यापन और प्रसार में जुटे विद्वान प्रोफेसर सुरेश ऋतुपर्ण ने जब बताया कि उनकी टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज में हिंदी के अध्यापन के सौ साल पूरे हो गए हैं तो आधुनिक भारत और जापान के संबंधों की गहराई का अहसास हुआ।
जापान विश्वविद्यालय में भारतीय अध्ययन की शुरुआत तो 1879 में ही हो गई थी, यानी कोई 130 साल पहले, जब भारत ब्रिटिश राज के अधीन हुआ करता था। यह 1868 में जापान के स्व-निर्वासन से बाहर आने के बाद की बात है, यानी मेईजी पुनर्स्थापन (सम्राट मेईजी के रेस्टोरेशन) के बाद की।
अपने एक सप्ताह के जापान प्रवास के दौरान अनेक बार महसूस होता रहा कि भारत, भारतीयता और भारतभाषा से जापानियों का संबंध महज उत्सुकता तक सीमित नहीं है। कहीं वह भगवान बुद्ध के जन्मस्थान के प्रति गहरी श्रद्धा के रूप में अभिव्यक्त हो रहा है तो कहीं हमारी आर्थिक प्रगति तथा तकनीकी उपलब्धियों की प्रशंसा भरी स्वीकारोक्ति के रूप में। मैंने अनेक अवसरों पर पाया कि भारत के प्रति जापानियों के मन में स्वाभाविक-सा लगाव या 'सॉफ्ट कॉर्नर' जरूर है।
सब सूना-सूना : ग्यारह दिसंबर 2008 की सुबह-सुबह हम एअर इंडिया के विमान से जापान की राजधानी टोक्यो पहुँचे पहुँचे तो देखा कि नरीता हवाई अड्डा तो एकदम सूना पड़ा है। न यात्रियों की भीड़, न सुरक्षा अधिकारियों की पंक्तियाँ और न बदहवासी की हालत में इधर-उधर भटकते हवाई अड्डा अधिकारी। जिज्ञासा हुई कि सब लोग आखिर कहाँ चले गए और क्यों? बाद में पता चला कि यह शांत सूनापन उस स्वतःस्फूर्त अनुशासन का हिस्सा है, जो दुनिया में सर्वाधिक घनी आबादी वाले टोक्यो शहर (वहाँ तीन करोड़ से अधिक लोग रहते हैं) के लोगों ने अपना लिया है।
दिल्ली की तुलना में लगभग ढाई गुना आबादी वाला शहर इतना शांत और सूना हो सकता है, यह मेरी कल्पना से बाहर था। लेकिन यही सच था। टोक्यो के बाजारों में, सड़कों पर, पार्कों में दिन के समय इक्का-दुक्का लोग ही दिखाई देते हैं। दिन में अगर वे दिखेंगे तो लोकल ट्रेन या ट्राम में और शाम को नजर आएँगे तो सुपरमार्केट में, रेस्तराओं में, मनोरंजन के स्थलों पर। दिन में सबके सब अपने दफ्तरों में या घरों में होंगे।
दुनिया की सबसे बड़ी और प्रसिद्ध ऑटोमोबाइल कंपनियाँ जापानी हैं, लेकिन सड़कों पर ट्रैफिक जाम की कोई समस्या नहीं। सबकी सब सड़कें खाली। यह चमत्कार कैसे हुआ? जापानियों ने निजी वाहनों को हतोत्साहित करते हुए सार्वजनिक यातायात को बढ़ावा देकर यह चमत्कार कर दिखाया। दिल्ली में घर से दफ्तर तक महज चार किलोमीटर की दूरी में एकाधिक स्थानों पर ट्रैफिक जाम से दो-चार होने वाले मुझ जैसे व्यक्ति के लिए तो यह सपना देखने जैसा था। मैं अनेक बार सोचता रहा कि क्या हम इस अनुशासन, स्वच्छंदता से विचरण करने की आजादी और समस्याहीनता को अपने यहाँ आयात नहीं कर सकते?
सिर्फ यही क्यों, हमारे आयात करने के लिए तो और भी बहुत कुछ है जापान में। उनका शालीन व्यवहार, दूसरों की निजता का सम्मान, किसी भी कार्य को बेहद लगन और मेहनत के साथ पूर्णता तक ले जाने की प्रवृत्ति, अपराधों का लगभग अभाव, अपने देश, संस्कृति और भाषा के प्रति गहरा सम्मान आदि आदि। जापान में अंग्रेजी की स्थिति शायद वैसी ही है जैसी हमारे यहाँ पुर्तगाली या कोरियाई भाषा की होगी। एक जापानी व्यक्ति किसी अन्य जापानी से अंग्रेजी में वार्तालाप करने की सोच भी नहीं सकता।
जापानी ही क्यों, वे तो किसी विदेशी से भी अंग्रेजी में बात नहीं करते। अपनी भाषा के प्रति गौरव का भाव रखने वाला कोई व्यक्ति भला किसी विदेशी भाषा में क्यों व्यवहार करना चाहेगा? आपको जापान के साथ व्यापार करना है, वहाँ व्यवसाय स्थापित करना है, नौकरी करनी है या घूमने जाना है तो जापानी सीखिए। जापानी भाषा के प्रति उनका यह आत्मविश्वास भरा गौरव भाव और हिंदी के प्रति हम बहुत सारे भारतीयों की हीनभावना दो विपरीत ध्रुवों के समान प्रतीत होते हैं।
अंग्रेजी तभी जब अपरिहार्य हो : प्रख्यात गीतकार कुँवर बेचैन और मैं जब टोक्यो से दिल्ली लौटने के लिए बस का इंतजार कर रहे थे तो
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वह अलग बात है कि थोड़ी देर बाद वहाँ टिकट बाँटने वाले व्यक्ति ने मुझसे अंग्रेजी में सवाल किया कि क्या आपके पास रिजर्वेशन है? शायद उसे लगा होगा कि मैं थोड़ी बहुत जापानी भाषा जानता हूँ, लेकिन अंग्रेजी में बोलना पसंद कर रहा हूँ। कुछ देर की प्रतीक्षा के बाद उसे अहसास हो गया कि मैं जापानी बिलकुल नहीं जानता तो उसने अंग्रेजी में एक-दो वाक्य बोलना जरूरी समझा। इसके बरक्स जरा सोचिए कि हम क्या करते हैं?
कुछ महीने पहले जब मैं अमेरिका की एक यात्रा से लौटा तो दिल्ली के ही एक सज्जन एअर इंडिया के विमान में मेरे पास बैठे थे। विमान परिचारिका ने उन्हें नवभारत टाइम्स लाकर दे दिया तो उन्होंने नाराजगी के स्वर में कहा- प्लीज, गिव मी टाइम्स ऑफ इंडिया। आई कैन नॉट मैनेज विद हिंदी लैंग्वेज। मुझे बुरा लगा और मैं बोल पड़ा कि इन्हें टाइम्स दे दीजिए, नवभारत मेरे हवाले कीजिए क्योंकि आई कैन वेरी वेल मैनेज विद हिंदी। उन सज्जन ने अंग्रेजी अखबार लेते हुए मुझे तिरस्कार और दया मिश्रित दृष्टि से देखा।
परदेसी भाषा पर अब्दुल्ला क्यों हो दीवाना : अंग्रेजी प्रेम के ऐसे कुछ अनुभव हमें जापान में भी हुए लेकिन भारतीयों के द्वारा, न कि जापानियों द्वारा। हमारे दूतावास के कुछ बड़े अधिकारी इसी श्रेणी में आते थे। जापानी लोग तो भारतीयों को अंग्रेजी बोलते देखकर हिंदी की
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ऐसा नहीं कि वे दूसरी भाषाओं के विरोधी हैं, लेकिन उनके लिए अपनी मातृभाषा के तिरस्कार की कीमत पर किसी विदेशी भाषा को अपनाना अकल्पनीय है। यदि आप जापान में हैं तो जापानी बोलिए या फिर अपनी मातृभाषा हिंदी। अंग्रेजी का प्रयोग तभी कीजिए जब वह अपरिहार्य हो, जैसे कि हवाई अड्डे पर, मुद्रा विनिमय केंद्र पर या विदेशी पर्यटकों से संपर्क के दौरान।
टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज की ओर से आयोजित हिंदी-उर्दू शतवार्षिकी के जिस कार्यक्रम में मैं और विश्व भर से आए कुछ विद्वान आमंत्रित थे, वहाँ हिंदी का स्थान और सम्मान देखकर सुखद आश्चर्य हुआ। भारत से हजारों किलोमीटर दूर विदेशी धरती पर हिंदी की पताका गर्व से लहरा रही थी। सारे कार्यक्रम का आयोजन सिर्फ हिंदी भाषा में हुआ। अंग्रेजी का प्रयोग कहीं हुआ तो सिर्फ संदर्भ के तौर पर। तमाम भाषण हिंदी (या कुछ उर्दू में), सारी कंप्यूटर प्रस्तुतियाँ हिंदी में, कार्यक्रमों का विवरण हिंदी में, छात्रों द्वारा अभिनीत नाटक हिंदी और उर्दू में, जापानी छात्र-छात्राओं से वार्तालाप हिंदी में, सम्मेलन के प्रतिवेदन हिंदी में और स्मारिकाएँ, पत्रिकाएँ एवं अन्य सभी दस्तावेज भी हिंदी में। छात्र-छात्राओं ने बहुत सुंदर प्रार्थना भी सुनाई- 'पितु मातु सहायक स्वामी सखा, तुम ही इक नाथ हमारे हो'।
सभी जापानी विद्वान हिंदी बोल रहे थे। प्रो. युताका असादा साहब की खालिस उर्दू (उनका प्रारंभिक वाक्य ही था- तशरीफ़ आवरी के लिए शुक्रिया) और रेडियो जापान से जुड़ी रहीं श्रीमती मिवाको कोएजुका की त्रुटिहीन हिंदी और विशुद्ध भारतीय उच्चारण कानों में मिश्री-सा घोल गए। अमेरिका, जर्मनी, पोलैंड, मॉरीशस आदि देशों से आए विद्वान भी न सिर्फ हमारे साथ हिंदी में बात कर रहे थे बल्कि आपसी वार्तालाप के लिए भी हिंदी का ही प्रयोग कर रहे थे।
सात दिन की उस अवधि में हमने एक अंतरराष्ट्रीय माहौल में हिंदी को उसके विश्वरूप में देखा। वहाँ हिंदी एक अंतरराष्ट्रीय संपर्क भाषा का काम कर रही थी। कहीं अंग्रेजी का दखल नहीं, कहीं हिंदी में प्रवीणता को लेकर अपराध-बोध नहीं। काश, हिंदी का वह गौरव हम उसके अपने देश में भी स्थापित कर सकें।
अमेरिकी शैली अपनाई, भाषा नहीं : जापान की जीवनशैली पर अमेरिकी प्रभाव दिखाई देता है। हिरोशिमा-नागासाकी की विनाशलीला की दुखद
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