यूरोप पर आतंकवाद के भयावह बादल

Author राम यादव|
की कार्टून मैगजीन 'शार्ली एब्दो' के कार्टून विवाद का जिन्न एक बार फिर उठ खड़ा हुआ है। फ्रांस के नीस स्थित चर्च में एक कट्‍टरपंथी ने तीन लोगों की हत्या कर दी। इब्राहिम नामक यह हमलावर ट्‍यूनीशिया का रहने वाला है। इस घटना के बाद पूरी दुनिया में इस्लामी कट्‍टरपंथ को लेकर एक बार फिर से बहस शुरू हो गई है। वहीं, इस्लामी देशों में कार्टून को लेकर फ्रांस एवं राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रों के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। भारत में भी कई स्थानों पर इस तरह के प्रदर्शन हुए हैं। 
 
वर्ष 2015 में जब 'शार्ली एब्दो' के दफ्तर पर हमला हुआ था तब यूरोपीय मामलों के जानकार एवं वरिष्ठ लेखक राम यादव ने वेबदुनिया के लिए एक विस्तृत आलेख लिखा था। वर्तमान में हम इसे हम जस का तस प्रस्तुत कर रहे हैं। 

रविवार, 11 जनवरी 2015 का दिन फ्रांस, सारे यूरोप और संभवतः समूचे विश्व के लिए एक अपूर्व पीड़ा का दिन था। चार ही दिन पहले 12 पत्रकार व चित्रकार इस्लामी की बलि चढ़ गए थे। उनकी याद में सरकार ने पेरिस में एकजुटता-रैली का आह्वान किया था। अपार जनसागर के बीच से बाँहों में बाँहें डाले विश्वभर से आए 44 नेताओं के साथ राष्ट्रपति फ्रोंस्वा ओलांद का पैदल मार्च कुछ ऐसा ही था, मानो वे देश की जनता से धार्मिक सहिष्णुता बनाए रखने की भीख माँग रहे हों। सरकार का ढाँढस बंधाने की अपील कर रहे हों। 
 
व्यंग्यचित्र साप्ताहिक 'शार्ली एब्दो' के सहकर्मियों की सामूहिक हत्या को लोकतंत्र में अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला बताकर एकजुटता प्रदर्शन का आह्वान करना सरल और स्वाभाविक है, किंतु इस स्वतंत्रता की अक्षुण्णता बनाए रखना उतनी ही दुरूह और दुष्कर। प्रदर्शन सरकारी था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के फ्रांस में सबसे बड़ा प्रदर्शन था। सुनियोजित और सुरक्षित था। एक लाख से अधिक सुरक्षाबल और सैनिक उसे सुरक्षा कवच प्रदान कर रहे थे। पर, क्या यही सुरक्षा हर दिन, हर किसी को हर जगह दी जा सकती है?
विभिन्न धर्मों के लोगों के इस ऐतिहासिक जमघट की मीडिया में प्रशंसा के जो पुल बाँधे जा रहे हैं, क्या वे तब भी नहीं टूटेंगे, जब अगले दिनों में ऐसे ही कुछ और आतंकवादी हमले होंगे? हमले तो होंगे। पेरिस में 'शार्ली एब्दो' के कार्यालय और बाद में एक यहूदी सुपर बाज़ार पर हुए हमले की ज़िम्मेदारी क्रमशः अल कायदा और आईएस (इस्लामी ख़लीफ़त) ने ली है। उनका तो काम ही है हमले करना। मरना और मारना।> > डर तो यह है कि अब प्रतिशोधी हमलों की भी झड़ी लग जाएगी। मुसलमानों ही नहीं, उनसे मिलते-जुलते दिखने वाले सभी विदेशियों की भी शामत आ जाएगी। फ्रांस के साथ बिरादराना एकजुटता दिखा रहे दूसरे देश भी अछूते नहीं रह पाएंगे।
 
क्रिया-प्रतिक्रिया लंबी चल सकती है : इस क्रिया-प्रतिक्रिया के कम से कम दो मुख्य कारण हैं। एक तो यह कि लगभग सभी प्रमुख पत्रकार और चित्रकार खो देने के बाद भी साप्ताहिक 'शार्ली एब्दो' का प्रकाशन, पहले की ही तरह पैने शब्द-बाणों और चुटीले चित्रों के साथ न केवल पूर्ववत जारी है, उसकी माँग रॉकेटी तेज़ी के साथ इतनी बढ़ गई है कि बुधवार, 14 मई को 16 भाषाओं में प्रकाशित नए अंक की 30 लाख प्रतियाँ देखते ही देखते बिक गईं।
उसके मुखपृष्ठ पर बने पैगंबर मुहम्मद के दो बूँद आँसू बहाते कार्टून पर लिखा है, 'सब माफ़ कर दिया' (तूत ए पार्दों) और नीचे 'मैं शार्ली हूँ' (जे स्युइ शार्ली)। तय हुआ है कि अगली बार 25 देशों में बिक्री के लिए अरबी भाषा सहित कई भाषाओं में 50 लाख प्रतियाँ छापी जाएंगी। एक डिजिटल संस्करण भी उपलब्ध किया जाएगा। इससे इस्लामी जगत में फैले रोष और क्रोध की आग में घी पड़ना अभी जारी रहेगा। 
 
दूसरा मुख्य कारण यह है कि इस्लामी जगत के नेता, धर्माधिकारी और अधिकतर बुद्धिजीवी भी इस्लामवादी आतंकवादी गिरोहों और उनके आतंकी हमलों की दोटूक निंदा करने, फ़तवा जारी करने, उनका सामाजिक बहिष्कार करने या आतंकवादियों को दंडित करने के प्रश्न पर कुछ कहने-करने से कतराते रहे हैं।

यह कहकर हाथ झाड़ लेते रहे हैं कि 'आतंकवाद का से कोई संबंध ही नहीं है' या 'आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता।' उनकी यह तोतारटंत सुन-सुनकर जनसाधारण के कान पक गए हैं। यह संदेह पक्का होता लगने लगा है कि इस्लामी जगत मन ही मन आतंकवादियों के साथ है और शायद सोचता है कि वे यदि दुनिया का इस्लामीकरण करना चाहते हैं, तो कुरान के आदेश का ही तो पालन कर रहे हैं! इस्लामी जगत की सोच में हालांकि अब कुछ आत्मचिंतन भी जरूर आया है, किंतु पश्चिमी संवेदनाओं की दृष्टि से वह पर्याप्त नहीं है। 
फतवा जारी करने में क्यों लगे 13 साल... पढ़ें अगले पेज पर....



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