सांप्रदायिक दंगों पर शहीद भगत सिंह की 5 बातें बताती हैं कि 100 साल में भी नहीं बदल सका हिंदुस्तान

Author संदीपसिंह सिसोदिया|
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सांप्रदायिक दंगों पर 1928 में 'कीर्ति' पत्रिका में छपा का एक लेख आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना लगभग 100 साल पहले था। दरअसल 1919 के जालियांवाला बाग हत्याकाण्ड के बाद ब्रिटिश सरकार ने सांप्रदायिक बंटवारे की राजनीति (Divide and Rule)के फॉर्मूले को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते हुए साम्प्रदायिक दंगों का खूब प्रचार शुरू किया।


इसके कारण 1924 में कोहाट (वर्तमान पाकिस्तान) में बहुत ही भयानक हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए। भारी खून-खराबे के बाद तत्कालीन राष्ट्रीय राजनीतिक चेतना में साम्प्रदायिक दंगों पर लम्बी बहस चली। इन्हें समाप्त करने के लिए कई नेताओं ने हिन्दू-मुस्लिम धार्मिक नेताओं से सुलहनामा लिखाकर दंगों को रोकने के प्रयत्न किए।

इस समस्या और समाधान के लिए क्रान्तिकारी आन्दोलन के शहीद भगतसिंह के विचारों को उनकी शहादत के बाद "धर्मावर फ़साद ते उन्हां दे इलाज", साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज (Religious Riots and Their Solution) शीर्षक से कीर्ति पत्रिका में जून, 1928 में प्रकाशित किया गया था। इस लेख में साम्प्रदायिक दंगों की समस्या और समाधान पर शहीद भगतसिंह के विचारों के अंश हैं।


उल्लेखनीय है कि भगत सिंह ने जेल में रहकर सांप्रदायिकता सहित अन्य सम-सामयिक विषयों पर कई खत और लेख लिखे थे जिनका कालांतर में प्रकाशन होता रहा।

1. भगत सिंह लेख की शुरुआत वर्तमान हालातों पर अफसोस जताते हुए कहते हैं कि की दशा इस समय बड़ी दयनीय है। एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं। अब तो एक धर्म का होना ही दूसरे धर्म का कट्टर शत्रु होना है।

यह मार-काट इसलिए नहीं की गई कि कौन दोषी है, वरन इसलिए कि कोई हिन्दू है, सिख है या मुसलमान है। बस किसी व्यक्ति का दूसरे धर्म का होना ही उसकी जान लेने के लिए पर्याप्त तर्क था। जब स्थिति ऐसी हो तो हिन्दुस्तान का ईश्वर ही मालिक है। ऐसी स्थिति में हिन्दुस्तान का भविष्य बहुत अन्धकारमय नज़र आता है। इन ‘धर्मों’ ने हिन्दुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया है और अभी पता नहीं कि यह धार्मिक दंगे हिंदुस्तान का पीछा कब छोड़ेंगे।

भगत सिंह कहते हैं कि इन कौमी दंगों ने संसार की नजरों में भारत को बदनाम कर दिया है। और हमने देखा है कि धार्मिक अंधविश्वास के सैलाब में सभी बह जाते हैं। धर्म के यह नामलेवा अपने धर्म के रौब को कायम रखने के लिए डण्डे-लाठियां, तलवारें-छुरे हाथ में पकड़ लेते हैं और आपस में लड़कर मर जाते हैं। कुछ तो फांसी चढ़ जाते हैं और कुछ जेलों में फेंक दिए जाते हैं। इतना रक्तपात होने पर इन ‘धर्मजनों’ पर अंग्रेजी सरकार का डण्डा बरसता है और फिर इनके दिमाग का कीड़ा ठिकाने आ जाता है।
2. भगत सिंह उस समय के नेताओं और मीडिया पर भी सवाल उठाते हुए लिखते हैं कि देखा गया है, इन दंगों के पीछे सांप्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ है। वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतन्त्र कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज्य-स्वराज्य’ के नारे लगाते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाए चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले हैं।

वोट की राजनीति पर चोट करते हुए वे आगे लिखते हैं कि इस समय सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो साम्प्रदायिक आन्दोलन में जा मिले हैं, जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं। जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं। और साम्प्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आई हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे। ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है।
3. तत्कालीन मीडिया पर कड़ी टिप्पणी करते हुए भगत सिंह पत्रकारिता के काले पक्ष को उजागर करते हुए लिखते हैं कि साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में अखबार विशेष हिस्सा लेते रहे हैं। पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊंचा समझा जाता था। आज बहुत ही गन्दा हो गया है। यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएं भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौव्वल करवाते हैं। एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे लेखक बहुत कम हैं जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो।
अखबारों का असली कर्त्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएं मिटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था, लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, सांप्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आंसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि ‘हिंदुस्तान का बनेगा क्या?’
4. साम्प्रदायिक दंगों के सबसे बड़े कारण की ओर इशारा करते हुए भगत लिखते हैं कि यदि इन साम्प्रदायिक दंगों की जड़ खोजें तो हमें इसका कारण आर्थिक ही जान पड़ता है। असहयोग के दिनों में नेताओं व पत्रकारों ने ढेरों कुर्बानियां दी। उनकी आर्थिक दशा बिगड़ गई थी।

भूख और गरीबी को दंगों का बड़ा कारण मानते हुए भगत उदाहरण सहित बताते हैं कि विश्व में जो भी काम होता है, उसकी तह में पेट का सवाल जरूर होता है। कार्ल मार्क्स के तीन बड़े सिद्धान्तों में से यह एक मुख्य सिद्धान्त है। इसी सिद्धान्त के कारण ही तबलीग, तनकीम, शुद्धि आदि संगठन शुरू हुए और इसी कारण से आज हमारी ऐसी दुर्दशा हुई, जो अवर्णनीय है।
समस्या के साथ भगत इसका समाधान भी सुझाते हैं, वे लिखते हैं कि सभी दंगों का इलाज
भारत की आर्थिक दशा में सुधार से ही हो सकता है। दरअसल भारत के आम लोगों की आर्थिक दशा इतनी खराब है कि भूख और दुख से आतुर होकर मनुष्य सभी सिद्धान्त ताक पर रख देता है।

लेकिन वर्तमान स्थिति में आर्थिक सुधार होना अत्यन्त कठिन है क्योंकि सरकार विदेशी है और लोगों की स्थिति को सुधरने नहीं देती। इसीलिए लोगों को हाथ धोकर इसके पीछे पड़ जाना चाहिए और जब तक सरकार बदल न जाए, चैन की सांस न लेना चाहिए।
5. भगत सिंह गरीबी और धार्मिक उन्माद को दूर करने के लिए आर्थिक स्वतंत्रता का महत्व बताते हुए अपील करते हैं कि लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की जरूरत है। गरीब, मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूंजीपति हैं। इसलिए तुम्हें इनके हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए। संसार के सभी गरीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथों में लेने का प्रयत्न करो। इन यत्नों से तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी जंजीरें कट जाएंगी और तुम्हें आर्थिक आजादी मिलेगी।
भगत सिंह ने रूस का इतिहास बताते हुए लिखा कि जार के शासनकाल में रूस में भी ऐसी ही स्थितियां थीं, वहां भी कितने ही समुदाय थे जो परस्पर दंगे करते रहते थे। लेकिन जिस दिन से वहां श्रमिक-शासन हुआ है, वहां नक्शा ही बदल गया है। अब वहां कभी दंगे नहीं हुए। अब वहां सभी को 'इंसान' समझा जाता है, 'धर्मजन' नहीं। जार के समय लोगों की आर्थिक दशा बहुत ही खराब थी। इसलिए सब दंगे-फसाद होते थे। लेकिन अब रूसियों की आर्थिक दशा सुधर गई है और उनमें वर्ग-चेतना आ गई है इसलिए अब वहां से कभी किसी दंगे की खबर नहीं आई।

भगत सिंह अपनी बात को समझाने के लिए एक महत्वपूर्ण तथ्य बताते हैं कि कैसे कलकत्ते के दंगों में ट्रेड यूनियन के मजदूरों ने हिस्सा नहीं लिया और न ही वे परस्पर गुत्थमगुत्था ही हुए, वरन सभी हिन्दू-मुसलमान बड़े प्रेम से कारखानों आदि में उठते-बैठते और दंगे रोकने के भी प्रयत्न करते रहे। यह इसलिए कि उनमें वर्ग-चेतना थी और वे अपने वर्गहित को अच्छी तरह पहचानते थे। वर्ग-चेतना का यही सुन्दर रास्ता है, जो साम्प्रदायिक दंगे रोक सकता है।
भगत सिंह को युवाओं से बहुत उम्मीदें थी, उनकी सबसे बड़ी खुशी थी कि भारत के नवयुवक अब वैसे धर्मों से जो परस्पर लड़ाना व घृणा करना सिखाते हैं, तंग आकर हाथ धो रहे हैं। उनमें इतना खुलापन आ गया है कि वे भारत के लोगों को धर्म की नज़र से-हिन्दू, मुसलमान या सिख रूप में नहीं, वरन सभी को पहले इन्सान समझते हैं, फिर हिंदुस्तानी।

हिंदुस्तान के युवकों में इन विचारों के पैदा होने से पता चलता है कि भारत का भविष्य सुनहला है। हिंदुस्तानियों को इन दंगों आदि को देखकर घबराना नहीं चाहिए। उन्हें यत्न करना चाहिए कि ऐसा वातावरण ही न बने, और दंगे हों ही नहीं।
वे समझाते हैं कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है इसमें दूसरे का कोई दखल नहीं। न ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए क्योंकि यह सरबत को मिलकर एक जगह काम नहीं करने देता। इसलिए गदर पार्टी जैसे आन्दोलन एकजुट व एकजान रहे, जिसमें हिंदु-सिख और मुसलमान बढ़-चढ़कर फांसी पर चढ़े।

अंत में भारत में सैकड़ों सालों से चली आ रही साम्प्रदायिकता की समस्या को जड़ से मिटाने के लिए भगत सिंह कहते हैं कि धर्म को राजनीति से अलग करना चाहिए। झगड़ा मिटाने का यह भी एक सुन्दर इलाज है और हम इसका समर्थन करते हैं। यदि धर्म को अलग कर दिया जाए तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते हैं। धर्मों में हम चाहे अलग-अलग ही रहें। हमारा ख्याल है कि भारत के सच्चे हमदर्द हमारे बताए इलाज पर जरूर विचार करेंगे और भारत का इस समय जो आत्मघात हो रहा है, उससे हमें बचा लेंगे।
इस लेख को प्रकाशित हुए लगभग 100 साल होने आए लेकिन एक सदी में भी समस्याएं जस की तस बनी रहीं, साम्प्रदायिक दंगे न सिर्फ जान-माल का नुकसान करते हैं बल्कि यह विकास की दौड़ में भारत को कई कदम पीछे कर रहे हैं। बढ़ती धार्मिक कट्टरता के कारण अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारत की नीति से लेकर निवेश पर संदेह किया जा रहा है।

कई मायने में अब हम क्रूरता और वर्ग-विभाजन में अंग्रेज़ों से भी आगे निकल चुके हैं। इस समय कट्टरता और उन्माद लोगों इस कदर हावी हो चुका है की आपसी मतभेदों को सुलझाने के बजाए उसे किसी इंसान की जान लेने लायक पर्याप्त कारण माना जा रहा है जो एक ऐसा समाज बना रहा हैं जहां कोई भी सुरक्षित नहीं है.... भगत सिंह, क्या यही है आपके सपनों का हिंदुस्तान???



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