बड़े नगरों को नरक बनाता वायु प्रदूषण

Author अनिल जैन|
कभी दिल्ली को वर्ल्ड क्लास सिटी बनाने की बात होती है तो कभी मुंबई को जैसा शहर बनाने की। कभी काशी यानी वाराणसी को क्योतो जैसी शक्ल देने का तो कभी किसी और शहर को जैसा बनाने का शिगूफा छोड़ा जाता है।
 
देश के लगभग 100 शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने की भी खूब चर्चा हो रही है। इसी तरह की चर्चाओं के बीच अब एक खबर आई है कि प्रदूषण के मामले में भारत की स्थिति दुनिया के अन्य कई विकसित और विकासशील देशों के मुकाबले काफी बदतर है।
 
बढ़ते शहरीकरण और औद्योगीकरण से भारत की वायु गुणवत्ता में अत्यधिक कमी आई है। दुनियाभर में घर और बाहर के से प्रतिवर्ष 30 लाख मौतें होती हैं, इनमें से सबसे ज्यादा भारत में होती हैं। देश की राजधानी दिल्ली तो दुनिया के 10 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में से एक है और वायु प्रदूषण के मामले में उसने चीन की राजधानी बीजिंग को भी पीछे छोड़ दिया है।
 
कई सर्वेक्षण बताते हैं कि वायु प्रदूषण से देश में प्रतिवर्ष होने वाली मौतों के औसत से दिल्ली में 12 फीसदी अधिक मौतें होती हैं। दिल्ली जैसा ही हाल कमोबेश देश के अन्य महानगरों और महानगर बनने की ओर अग्रसर देश के बड़े शहरों का है।
 
अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी के अध्ययन के मुताबिक ताजा एनवॉयरमेंट परफॉर्मेंस इंडेक्स (ईपीआई) में 178 देशों में भारत का स्थान 32 अंक गिरकर 155वां हो गया है। वायु प्रदूषण के मामले में भारत की स्थिति ब्रिक्स देशों (ब्राजील, भारत, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका) में सबसे खस्ताहाल है। इंडेक्स में सबसे ऊपर स्विट्‌जरलैंड है।
 
अध्ययन के मुताबिक प्रदूषण के मामले में भारत की तुलना में पाकिस्तान, नेपाल, चीन और श्रीलंका की स्थिति बेहतर है जिनका इस इंडेक्स में स्थान क्रमशः 148वां, 139वां, 118वां और 69वां है। इस इंडेक्स को 9 कारकों- स्वास्थ्य पर प्रभाव, वायु प्रदूषण, पेयजल एवं स्वच्छता, जल संसाधन, कृषि, मछली पालन, जंगल जैव-विविधता, जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा के आधार पर तैयार किया गया है।
 
इंडेक्स के अनुसार दुनिया में 5 सबसे स्वच्छ देश हैं- स्विट्‌जरलैड, लक्जमबर्ग, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और चेक गणराज्य। येल यूनिवर्सिटी की ओर से जारी बयान में कहा गया है, 'प्रदूषण से स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान के मामले में भारत का प्रदर्शन अच्छा नहीं है।' 
 
वैसे ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए जिम्मेदार गैसें पिछले कुछ वर्षों में रिकॉर्ड मात्रा में विश्व के वायुमंडल में घुली हैं। वर्ष 2009 में करीब 8.6 अरब मीट्रिक टन कार्बन डाई ऑक्साइड वायुमंडल में पहुंची थी। यह मात्रा 2014 में लगभग 10 अरब मीट्रिक टन हो गई। ये गैसें सबसे ज्यादा चीन, भारत और अमेरिका से निकली हैं। इन तीनों ही देशों को दुनिया में सर्वाधिक प्रदूषण फैलाने वाला माना जाता है।
 
नासा सैटेलाइट द्वारा इकट्‌ठा किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि दिल्ली में पीएम-25 (पार्टिकुलेट मैटर- 2.5 माइक्रॉन से छोटे कण) की मात्रा सबसे ज्यादा थी। धुंध और वायु प्रदूषण के लिए कुख्यात चीन का बीजिंग शहर इस मामले में दिल्ली से पीछे छूट गया है। गाड़ियों की भारी संख्या और औद्योगिक उत्सर्जन से हवा में पीएम-25 कणों की बढ़ती मात्रा घनी धुंध का कारण बन रही है।
 
पिछले कुछ सालों में दिल्ली में धुंध की समस्या बढ़ती ही जा रही है। इसके बावजूद जहां धुंध के मामले में बीजिंग सुर्खियों में छाया रहता है और सरकार को एहतियात बरतने की चेतावनी तक जारी करनी पड़ती है, वहीं दिल्ली में इसे नजरअंदाज कर दिया जाता है। हॉर्वर्ड इंटरनेशनल रिव्यू के मुताबिक 5 में से हर 2 दिल्लीवासी श्वसन संबंधी बीमारी से ग्रस्त हैं।
 
येल यूनिवर्सिटी के अध्ययन के मुताबिक 2.5 माइक्रॉन व्यास से छोटे कण मनुष्य के फेफड़ों और रक्त उत्तकों में आसानी से जमा हो जाते है जिसके कारण हृदयाघात से लेकर फेफड़ों का कैंसर तक होने का खतरा होता है। इस वर्ष बीजिंग में पहली बार 15 जनवरी की रात को पीएम-25 की मात्रा 500 को पार कर गई थी, लेकिन दिल्ली में 8 दिन तक प्रदूषण का यह स्तर बना रहा।
 
दिल्ली में 3 सप्ताह में एक बार पीएम-25 की मात्रा 300 से नीचे पहुंची, जो डब्ल्यूएचओ द्वारा सुझाई गई मात्रा से 12 गुना ज्यादा है। येल सेंटर ऑफ एनवॉयरोन्मेट लॉ एंड पॉलिसी से जुड़े डॉ. एंजेल ह्यू कहते हैं, 'मुझे हमेशा यह बात हैरान करती है कि प्रदूषण के मामले हमेशा चीन की चर्चा होती है न कि भारत की।' 
 
अमेरिका स्थित एक स्वास्थ्य संस्थान के अध्ययन में दावा किया गया है कि भारत में वायु प्रदूषण लोगों के स्वास्थ्य का 5वां सबसे घातक दुश्मन बन चुका है। साथ ही दिल्ली देश के सबसे गंभीर प्रदूषित क्षेत्रों में से एक है। अन्य 4 सबसे अधिक प्रदूषित क्षेत्रों में उत्तरप्रदेश के गाजियाबाद, मध्यप्रदेश के ग्वालियर, झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिला और छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का नाम लिया गया है।
 
अध्ययन में दावा किया गया है कि भारत में वायु प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों की चपेट में आकर हर वर्ष 6.2 लाख लोगों की मौत हो जाती है। वर्ष 2000 के मुकाबले इस संख्या में 6 गुना इजाफा हुआ है। अध्ययन के अनुसार उच्च रक्तचाप, घरेलू वायु प्रदूषण, तम्बाकू, धूम्रपान और कुपोषण के बाद हत्यारों की सूची में वायु प्रदूषण का नाम लिया जा सकता है।
 
ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज, जिसे अमेरिका स्थित हैल्थ इफेक्ट इंस्टीट्‌यूट ने तैयार किया है, में वायु प्रदूषण को दुनिया के शीर्ष 10 हत्यारों की सूची में रखा गया है और दक्षिण एशिया में इसे 6ठा सबसे खतरनाक हत्यारा कहा गया है।
 
2 महीने पहले विधानसभा चुनाव के दौरान जिस दिल्ली को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने वर्ल्ड क्लास सिटी बनाने के सब्जबाग लोगों को दिखाए थे उस दिल्ली की हकीकत यह है कि वह आज एक दम तोड़ता शहर है।
 
दिल्ली में जल प्रदूषण की स्थिति तो पहले से ही भयावह है। यमुना नदी प्रदूषण का खतरनाक स्तर पार कर चुकी है और कई रिपोर्टों में इस तथ्य की भी पुष्टि हो चुकी है कि लोगों को पीने के लिए जिस पानी की आपूर्ति दिल्ली जल बोर्ड द्वारा की जाती है वह बेहद प्रदूषित होता है और राजधानी के लगभग 60 फीसदी बाशिंदे प्रदूषित पानी पीते हैं।
 
राजधानी की सड़कों पर गंदगी का आलम भी जगजाहिर है और वायु प्रदूषण बढ़ते जाने का अनुभव तो यहां के लोगों को रोज ही होता है। दिल्ली के वायु प्रदूषण के बारे में येल यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट के अलावा भी कई देशी-विदेशी संस्थानों के अध्ययनों से इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि दिल्ली का वायुमंडल बुरी तरह प्रदूषित हो चुका है।
 
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) भी अपनी रिपोर्ट में बता चुका है कि भारत की राजधानी दिल्ली दुनिया के 10 सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में से एक है।  

दिल्ली में खतरे की घंटी
-दिल्ली में बीजिंग से दोगुना ज्यादा वायु प्रदूषण
-दुनिया के 10 सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल है दिल्ली
-पिछले वर्ष के मुकाबले इस साल वायु प्रदूषण में 44 फीसदी की वृद्धि
-दिल्ली में 81 लाख गाड़ियां पंजीकृत हैं (1970 में 8 लाख गाड़ियां थीं)
-रोजाना 1400 से ज्यादा गाड़ियां ट्रैफिक में शामिल हो रही हैं
-हर 5 में से 2 व्यक्ति श्वास की बीमारी से पीड़ित 
-60 फीसदी लोग प्रदूषित पानी पीते हैं
 

कुछ दिनों पहले स्वयंसेवी संगठन 'ग्रीनपीस' द्वारा कराए गए सर्वे में भी यह तथ्य उजागर हुआ था कि राजधानी की हवा डब्ल्यूएचओ की ओर से तय किए गए निरापद-स्तर से 10 गुना ज्यादा प्रदूषित हो चुकी है। ग्रीनपीस ने दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में स्थित 5 स्कूलों में सर्वे कर दिल्ली में वायु प्रदूषण की भयावहता को उजागर किया था। यह सर्वे 23 जनवरी से 12 फरवरी के बीच किया गया था। हवा की जांच इन स्कूलों के भीतर हुई थी। इससे यह धारणा ध्वस्त हो जाती है कि वायु प्रदूषण की भयावहता सिर्फ सड़कों पर ही है।
 
जाहिर है, दिल्ली के बच्चे चाहे सड़क पर हो या स्कूल के भीतर या खेल के मैदान में, जहरीली हवा में सांस लेने को विवश हैं। ऐसे में उनका कैसा शारीरिक और मानसिक विकास होगा? यह सवाल कभी इतने जोर से नहीं उठता कि कोई व्यापक बहस शुरू हो सके। शायद यह सवाल जोर-शोर से उठने ही नहीं दिया जाता इसलिए कि फिर सड़कों पर गाड़ियों की रोजाना बढ़ती संख्या से लेकर विकास के प्रचलित मॉडल तक अनेक असुविधाजनक सवाल उठेंगे। ऐसे सवालों की अनदेखी लोगों की सेहत की कीमत पर ही की जा सकती है।
 
हालांकि दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कहना है कि मौजूदा वायु प्रदूषण की मुख्य वजह मौसम है और सालाना औसत के लिहाज से दिल्ली अब भी बीजिंग से पीछे है। हालांकि दिल्ली सरकार 4 वर्ष पहले ही अपनी एक आधिकारिक रिपोर्ट में यह मान चुकी है कि राजधानी की आबोहवा में पूरी तरह जहर घुल चुका है और यहां हर रोज करीब 21 लोगों की मौत श्वसन तंत्र से जुड़ी बीमारियों के कारण हो रही है और इनमें से अधिकांश के लिए वाहनों से होने वाला प्रदूषण जिम्मेदार है। दिल्ली में बीते 1 दशक के दौरान श्वास की बीमारी से होने वाली मौतों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है और प्रतिवर्ष औसतन 7 हजार लोगों की मौत हो रही है।
 
दिल्ली में वायु प्रदूषण के दिनोदिन खतरनाक रूप लेते जाने की जगजाहिर हकीकत के बावजूद केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से लेकर दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति तक सभी हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रहे हैं। इस निष्क्रियता के बरक्स दिल्ली हाई कोर्ट ने गत 26 मार्च को ही दिल्ली के प्रदूषण से संबंधित एक रिपोर्ट का स्वतः संज्ञान लेते हुए दिल्ली सरकार और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति को वायु प्रदूषण से निपटने के लिए विस्तृत कार्ययोजना पेश करने को कहा है।
 
हाई कोर्ट ने जिस रिपोर्ट का हवाला दिया है उसके मुताबिक दिल्ली की हवा में सल्फर डाई ऑक्साइड, बैंजीन, नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड, कॉर्बन डाई ऑक्साइड आदि रासायनिक तत्वों की मौजूदगी खतरे की सीमा से काफी आगे जा चुकी है।
 
केंद्रीय पर्यावरण और वनमंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भी पिछले दिनों राज्यसभा में पूरक प्रश्नों के जवाब में स्वीकार किया कि दिल्ली में वायु प्रदूषण निर्धारित मानदंडों से 3 गुना अधिक खतरनाक स्तर पर है। उन्होंने कहा कि उनका मंत्रालय इस समस्या को गंभीरता से ले रहा है और उसने पिछले 4 महीनों में दिल्ली सरकार के साथ इस बारे में 4 बैठकें की हैं। 
 
ऐसा नहीं है कि वायु प्रदूषण सिर्फ दिल्ली में ही खतरे की सीमा पार कर चुका है, देश के अन्य महानगरों और बड़े शहरों के हालात भी दिल्ली से अलहदा नहीं हैं। इस सिलसिले में मुंबई, कोलकाता, लखनऊ, पटना, कानपुर, आगरा, इंदौर, ग्वालियर, रायपुर, नागपुर जैसे तमाम शहरों के नाम भी लिए जा सकते हैं, जो भीषण वायु प्रदूषण की चपेट में आ चुके हैं और जहां के बाशिंदे तेजी से श्वसन तंत्र से संबंधित बीमारियों के शिकार होते जा रहे हैं।
 
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में राज्यों के पर्यावरण मंत्रियों के सम्मेलन में देश के 10 शहरों में प्रदूषण की जांच के लिए एक इंडेक्स जारी किया है जिससे पता चलेगा कि हवा में कितना प्रदूषण है। इस तरह इन शहरों में प्रदूषण की जांच होती रहेगी।
 
लेकिन असल सवाल तो यह है कि प्रदूषण रोकने के लिए उपाय क्या किए जाएंगे? दिल्ली या कुछ और शहरों में वैकल्पिक ईंधन के इस्तेमाल से हालात में कोई खास फर्क नहीं पड़ा है। इन शहरों में वैकल्पिक ईंधन के इस्तेमाल से धुएं में जो कमी आई, उसकी कुछ ज्यादा ही भरपाई रीयल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर इंडस्ट्री से उड़ने वाली धूल से हो गई है। 
 
प्रधानमंत्री का यह कहना सही है कि जीवनशैली में बदलाव लाने की जरूरत है। लेकिन सप्ताह में एक दिन साइकल के इस्तेमाल या पूर्णिमा की रात को लाइट बंद करने जैसे उनके सुझावों से बात नहीं बनने वाली। प्रदूषण बढ़ाने में सबसे ज्यादा योगदान बड़ी औद्योगिक इकाइयों का होता है, जो प्रायः पर्यावरण मानकों को ठेंगे पर रखती हैं और ऊपर से शिकायत भी करती हैं कि पर्यावरण संबंधी शर्तों की वजह से वे ढंग से काम नहीं कर पा रही हैं।
 
मोदी सरकार पहले से मौजूद सभी कानूनों को हटाकर 'राष्ट्रीय पर्यावरण प्रबंधन प्राधिकरण' (एनईएमए) नाम से एक सिंगल विंडो व्यवस्था बनाना चाहती है। उसका कहना है कि इसका मकसद पर्यावरण संबंधी मंजूरी की प्रक्रिया में सरलता लाना है।
 
लेकिन विशेषज्ञों की आशंका है कि इसके जरिए मोदी सरकार परियोजनाओं की मंजूरी में पर्यावरणीय शर्तों को ढीला करने या हटाने के फिराक में है। यह बात सही है कि यूपीए सरकार के समय पर्यावरण मंजूरी की कई अर्जियों को लटकाए रखा गया, लेकिन इसका यह अर्थ यह नहीं कि हम समूची व्यवस्था को ही उलट-पुलट कर दें।
 
अगर सरकार को वाकई पर्यावरण की चिंता है तो उसे मौजूदा ढांचे में ही रास्ते ढूंढने चाहिए। उसे यह आशंका भी दूर करनी चाहिए कि प्रक्रिया सरल बनाने की बात निहित स्वार्थों को फायदा पहुंचाने के लिए तो नहीं कही जा रही।
 
सड़कों पर पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों की बढ़ती संख्या भी वायु प्रदूषण के बढ़ते खतरे के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं। अकेले राजधानी दिल्ली में ही हर रोज सड़कों पर लगभग 1,400 नए वाहनों का आगमन होता है।
 
हालांकि बसों, कारों और ऑटो रिक्शाओं में सीएनजी का उपयोग शुरू होने के बाद वायु प्रदूषण की स्थिति में काफी हद सुधार के दावे किए जाते रहे हैं लेकिन अब एक बार फिर हालात खराब होते जा रहे हैं। इसके पीछे जगह-जगह लगे मोबाइल फोन के टॉवर भी एक बड़ी वजह माने जा सकते हैं। इसके अलावा मेट्रो परियोजना और बड़े पैमाने पर जारी अन्य निर्माण कार्यों ने भी जमीन के साथ-साथ वायुमंडल में प्रदूषण फैलाने में अपना योगदान दिया है।
 
अगर मोबाइल फोन और सड़कों पर बढ़ती वाहनों की संख्या तथा निर्माण कार्यों को हम विकास का पैमाना मानते हैं तो वायुमंडल में बढ़ रहे प्रदूषण को हमें इस विकास का साइड इफेक्ट मानना पड़ेगा। यह साइड इफेक्ट हमारे अस्तित्व के लिए कितना खतरनाक है, इस बारे में सोचना सरकार की ही नहीं, बल्कि नागरिक समाज की भी जिम्मेदारी है। इस सिलसिले में नगर नियोजन के रंग-ढंग और प्राथमिकताओं में बदलाव करना होगा। ऐसा करके ही शहरों की पर्यावरणीय सेहत सुधारी जा सकती है।
 
 



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