कई सबक देती है बोस्टन धमाकों की घटना

PTI


पहला चेचन युद्ध सन 1994 से 1996 में हुआ था, जिसे रूस ने चेचन स्वतंत्रता आन्दोलन कुचलने के लिए किया। रूस के पास सेना और साधनों की कमी न होते हुए भी रूस चेचन के पहाड़ों पर गुरिल्ला युद्ध की वज़ह से अपना नियंत्रण नहीं कर पाया। एक लाख लोगों की जानें गईं। तब रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने बड़ी शर्मिन्दगी उठाकर युद्ध विराम घोषित किया और चेचन्या से शांति संधि की।

चेचन्या स्वतंत्र हो गया किन्तु साथ में अराज़क भी। सन 1999 में रूस के अलगाववादियों के समर्थन में चेचन के उग्रवादियों ने रूस पर आतंकी हमले शुरू किए, तब अक्टूबर 1999 में दूसरा चेचन युद्ध शुरू हुआ और रूस की थल सेना ने पूरे चेचन्या पर अपना आधिपत्य कर लिया। उसके बाद भी आतंकी हमले जारी रहे।

कई पाठकों को स्मरण होगा जब सन 2002 में चेचन्या के आतंकियों ने मास्को के एक थियेटर में 700 लोगों को बंधक बना लिया था तब रूस की सुरक्षा एजेंसियों ने जहरीली गैस का उपयोग कर 41 चेचन गुरिल्लों को मारा था साथ में 129 बंधकों की मृत्यु भी हो गई थी। इस तरह के कई हमले रूस के अस्पतालों, स्कूलों और रेलों पर हुए और सैकड़ों लोगों की जानें गईं, किन्तु रूस ने धीरे-धीरे आतंकियों का सफाया किया। सन 2008 में जाकर मास्को ने चेचन्या में अपने पक्ष वाली सरकार को सत्तारूढ़ किया और तब से चेचन्या अपेक्षाकृत शांत है। बावजूद इसके पहाड़ी इलाकों में कई आतंकी प्रशिक्षण शिविर जारी हैं।

उद्देश्य कितना ही पवित्र और विचार कितने ही तर्कसम्मत क्यों न हो, आधुनिक संसार में हिंसा का कोई स्थान नहीं। हिंसा का परिणाम प्रतिहिंसा ही है फिर वह किसी सक्षम के विरुद्ध की गई हो या अक्षम के विरुद्ध, लेकिन विडम्बना ही कहेंगे कि संसार में चेचन्या जैसे कई स्थान हैं, जहां हिंसा को गौरवान्वित किया जाता है ताकि नए युवक इसकी ओर आकर्षित हों। अपने कष्टों या सोच को दुनिया तक पहुंचाने के लिए हिंसा का यह मार्ग दुनिया को हिंसक के विरुद्ध खड़ा कर देता है।
अमेरिका जिसने चेचन बंधुओं को वर्षों से पनाह दी उसी अमेरिका के साथ इन दोनों आतंकियों ने विश्वासघात किया। अभी तक दुनिया के लोग चेचन्या में रूस के मानवाधिकारों के हनन के चलते चेचन्या के लोगों के साथ सहानुभूति रखते थे पर इस तरह के हिंसक कदम उन्हें दुनिया के समर्थन से दूर करेंगे। तारीफ करनी होगी अमेरिका की सुरक्षा एजेंसियों की जिन्होंने सात दिनों के भीतर आरोपियों को न्याय के समक्ष ला खड़ा किया।

हमारे देश में अपराधी अपराध कर हवा हो जाता है और दूसरे मुल्कों में पहुंच जाता है तब जाकर हमारा प्रशासन हरकत में आता है। बुजुर्ग नेता स्वयं की छाती पीटकर अपने देश को आतंक से त्रस्त देश बताकर सहानुभूति बटोरने की कोशिश में लग जाते हैं। आज के इस जेट युग में युवाओं के पास धैर्य नहीं है और इस तरह के किसी भी अमान्य और घिनौने अपराधों के विरुद्ध उन्हें तुरंत परिणाम चाहिए।

बुजुर्ग पीढ़ी न करे तो न सही पर नई पीढ़ी इतनी लचर व्यवस्था बर्दाश्त नहीं करेगी, जिसके उबलते खून का प्रदर्शन हम आजकल बहुधा देख रहे हैं। दृढ़ता और विश्वास के साथ दुष्कर्मों को न सहने का यह जस्बा क्या हमको भी ऐसे मुकाम पर पहुंचाएगा, जहाँ हम मानवता के ऐसे अपराधियों को चौबीस घंटे के भीतर न्यायालय के सामने खड़ा कर पाएंगे?

शरद सिंगी|
अमेरिका के बोस्टन शहर में बम धमाकों के बाद चेचन या चेचन्या पांच वर्षों के अंतराल के बाद अज्ञातवास से निकलकर फिर सतह पर आ गया। चेचन सोवियत फेडरेशन के अंतर्गत एक छोटा सा स्वायत्तता प्राप्त प्रांत है, जिसका क्षेत्रफल 17300 वर्ग किमी और आबादी करीब बारह लाख लोगों की। इसका अपना अलग संविधान और कानून है।यह एक युद्धग्रस्त क्षेत्र है और इसके नागरिक रूस में आतंकी हमलों के लिए बदनाम हैं। इसकी राजधानी ग्रोज्नी है। यह छोटा-सा प्रांत दशकों से रूस जैसी महाशक्ति के छक्के छुड़ाता रहा है। कभी रूस का हिस्सा रहा तो कभी स्वतंत्र। 1991 में जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो चेचन्या ने अपने आपको स्वतंत्र घोषित कर लिया। आइए, इसके पिछले दो दशक के घटनाक्रम पर एक नज़र डालें।
बोस्टन में हुए जघन्य अपराध और उसका शीघ्र और मुस्तैद निराकरण हमारी बुजुर्ग पीढ़ी को लचर धैर्य त्यागने का सबक देता है तो युवा पीढ़ी को तत्काल किन्तु संयमपूर्वक प्रतिवाद करने के लिए संकल्पित करता है। तभी हम अपने राष्ट्र पर लगा सॉफ्ट स्टेट (मुलायम राष्ट्र) का तमगा मिटा पाएंगे। नई पीढ़ी ने करवट तो ले ली है और विश्वास है कि शीघ्र ही हम उसके संकल्प की नई धारा देखेंगे।



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