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धरती क्यों बनी आग की भट्टी, दुनिया में 50 करोड़ लोग होंगे प्रभावित, हर साल 4.5% गिरेगी भारत की GDP
- 50 करोड़ से अधिक लोग सदी के अंत तक गर्मी की चपेट में आएंगे
- 2030 तक गर्मी की वजह से भारत में 3.4 करोड़ नौकरियां जाएंगी
- 2030 तक देश को अपनी जीडीपी का 2.5 से 4.5 प्रतिशत प्रति वर्ष का नुकसान होगा
- जलवायु परिवर्तन का सबसे बुरा असर भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश पर होगा
- 1990 के दशक में साल का औसत तापमान 26.9°C हुआ करता था।
इस तापमान की भयावहता का आलम यह है कि अब लोग भी गर्मी से मरने लगे हैं। कई राज्यों में लोगें के शरीर का टेंपरेचर 100 के पार हो रहा है। राजधानी दिल्ली में एक शख्स के शरीर का टेंपरेचर 107 डिग्री पहुंचा, जिसके बाद हीट स्ट्रोक से उसकी मौत हो गई। दरसअल, हकीकत यह है कि सिर्फ भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए तापमान एक नया खतरा है और धरती आग की भट्टी बन रही है। दरअसल, दुनिया के तापमान (वैश्विक तापमान) में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। वैज्ञानिक कई बार ये चेतावनी दे चुके हैं कि धरती का पारा बढ़ रहा है।
अप्रैल और मई 2024 में कई हफ्तों तक घातक गर्मी की लहर ने एशिया के बड़े क्षेत्रों को जकड़ रखा है। 7 मई को भारत में तापमान 110 डिग्री फ़ारेनहाइट (43.3 सेल्सियस) से अधिक था और इस भीषण गर्मी में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सब को बेहाल कर रखा है।
- दुनिया के 40 प्रतिशत हिस्से में पिछले 10 साल (2013 से 2023) तक सबसे उच्चतम तापमान रिकॉर्ड किया गया।
- यूनाईटेड किंगडम में जुलाई 2022 में पहली बार 40 डिग्री सेल्सियस क्रॉस किया।
- चाइना नॉर्थवेस्ट में पिछले साल 52 डिग्री तापमान पार किया जो सबसे हाई था।
- इटली के सिसिली में 2021 में 48.8 डिग्री पार किया जो यूरोप का सबसे हाई टेंपरेचर था
जापान से लेकर दक्षिण में फिलीपींस तक लगातार गर्मी ने रोजमर्रा की जिंदगी पर कहर बरपा रही है। कंबोडिया में छात्रों और शिक्षकों को स्कूलों से घर भेजा जा रहा है। थाईलैंड में किसानों के फसलें सूख रही हैं, धूप से हजारों पशुओं की मौत हो गई। 2023 में दक्षिण-पश्चिमी अमेरिका में एक सप्ताह तक चली गर्मी की लहर को फीनिक्स में पृथ्वी पर नर्क के तौर पर दिखाया गया। जहां तापमान लगातार 31 दिनों तक 110 एफ (43.3 सी) या इससे ज्यादा रहा। यूरोप भी भभक रहा है। ग्रीस के जंगलों में आ लगी है। बता दें कि कुछ देशों में सिर्फ दो या तीन हफ्ते ज्यादा गर्मी पड़ी। वहीं कोलंबिया, इंडोनेशिया और रवांडा जैसे देशों में 120 दिन से भी ज्यादा गर्मी पड़ी। रिपोर्ट कहती है कि इंसानों ने प्रकृति पर बहुत ज्यादा बोझ डाल दिया है। दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में 120 दिनों की अतिरिक्त गर्मी सिर्फ जलवायु परिवर्तन के कारण ही थी।
मानव स्वास्थ्य के लिए कितना खतरा
- 48-50 डिग्री सेल्सियस तापमान तो मानव शरीर के लिए झेल पाना ही मुश्किल होता है।
- मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र 50 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान के संपर्क में लंबे समय तक रहने से मस्तिष्क को जबरदस्त क्षति हो सकती है, जिससे भ्रम, दौरे और चेतना खत्म हो सकती है।
- 46-60 डिग्री सेल्सियस के बीच के तापमान पर मस्तिष्क कोशिकाएं मरने लगती हैं, क्योंकि मस्तिष्क कोशिकाओं के भीतर प्रोटीन जमना शुरू हो जाता है।
- 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान विभिन्न प्रकार की मस्तिष्क कोशिकाओं पर विनाशकारी प्रभाव डालता है।
- 39 डिग्री सेल्सियस से अधिक उच्च मस्तिष्क तापमान मस्तिष्क की कई तरह से चोट दे सकता है। मसलन अमीनो एसिड बढ़ना, मस्तिष्क से ब्लीडिंग और न्यूरोनल साइटोस्केलेटन के प्रोटियोलिसिस में वृद्धि।
- 50 डिग्री सेल्सियस ऐसा काफी ज्यादा तापमान है जो मस्तिष्क कोशिकाओं को तेजी से नुकसान पहुंचाता और फिर इस नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकती। मस्तिष्क का संतुलन और ऑक्सीजन की खपत को कम कर देता।
- 50 डिग्री सेल्सियस हृदय और खून का प्रवाह तंत्र के साथ ही मांसपेशियां, त्वचा और श्वसन तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है।
क्या कहती है IPCC की रिपोर्ट : इस बढ़ती गर्मी में संयुक्त राष्ट्र की IPCC की रिपोर्ट का जिक्र भी जरूरी है। यह रिपोर्ट लंबे समय की रिसर्च के बाद सामने आई थी। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के साथ ही IPCC (Intergovernmental Panel on Climate Change) की जो रिपोर्ट आई थी। रिपोर्ट के मुताबिक उत्सर्जन के आधार पर हम करीब 10 से 20 साल में तापमान के मामले में 1.5 डिग्री की बढ़ोतरी पर पहुंच जाएंगे। यह भारत के लिए खतरनाक है, क्योंकि गर्मी बढ़ने से भारत के 50% हिस्से और ऐसे लोगों पर भारी प्रभाव पड़ेगा, जिनका जीवनयापन सीधेतौर पर पर्यावरण पर निर्भर करता है।
2 हजार साल में पहली बार : विशेषज्ञों का दावा है कि इस गति से गर्मी बढ़ना मानव जाति के इतिहास में 2000 साल में पहली बार देखा गया है। इससे भारत के लोगों पर भारी असर होगा, खासकर ऐसे 40 करोड़ लोगों पर जिनका रोजगार पर्यावरण या इसी तरह के संसाधनों चलता है। जबकि दुनिया की 90 फीसदी आबादी पर असर होगा। ये आबादी अत्याधिक गर्मी और सूखे से जुड़े खतरों का सामना करेगी।
234 वैज्ञानिकों की रिपोर्ट में क्या है : वैज्ञानिकों ने 3 हजार से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट तैयार की है। इसे दुनिया के 234 वैज्ञानिकों ने तैयार किया है। जिसमें कहा गया है कि तापमान से समुद्र स्तर बढ़ रहा है, बर्फ का दायरा सिकुड़ रहा है और प्रचंड लू, सूखा, बाढ़ और तूफान की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऊष्णकटिबंधीय चक्रवात और मजबूत और बारिश वाले हो रहे हैं, जबकि आर्कटिक समुद्र में गर्मियों में बर्फ पिघल रही है और इस क्षेत्र में हमेशा जमी रहने वाली बर्फ का दायरा घट रहा है।
ताजा रिपोर्ट कहती है कि मध्य, पूर्व और उत्तर-पश्चिम भारत के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से अधिक लू चलने के आसार हैं। 2023 में भारत ने 1901 में रिकॉर्ड रखना शुरू होने के बाद से फरवरी सबसे गर्म रहा।
भारत-पाकिस्तान, बांग्लादेश झेलेगा सबसे ज्यादा मार : World Meteorological Organization- WMO की ही रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनियाभर में हो रहे जलवायु परिवर्तन और बढ़ रहे तापमान का सबसे बुरा असर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश पर होगा। भारत के कई हिस्सों में लू (Heat wave) तो पिछले कुछ सालों में बहुत ज्यादा देखी गई है। आबादी के मान से भी भारत पर ज्यादा असर होगा। यहां गर्मी (Heat wave) से मरने वालों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। कुल मिलाकर WMO की रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु परिवर्तन का सबसे भारी नुकसान भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश झेलेगा।
NASA क्यों है दहशत में : विश्व मौसम विज्ञान संगठन (World Meteorological Organisation - WMO) के छह मुख्य अंतरराष्ट्रीय तापमान डेटासेट के मुताबिक पिछले 8 साल दुनियाभर के रिकॉर्ड पर सबसे गर्म थे। यह लगातार बढ़ती ग्रीनहाउस गैस की मात्रा और इससे होने वाली गर्मी की वजह से था। इसका मतलब यह है कि 2022 में पृथ्वी 19वीं सदी के अंत के औसत से लगभग 1.11 डिग्री सेल्सियस गर्म थी। यही वजह है कि नासा (NASA) ने भी दुनिया पर आने वाले इस नए खतरे को लेकर डर जाहिर किया है। World Meteorological Organisation – WMO की रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है।
200 देश क्लाइमेट चेंज से लड़ रहे युद्ध : साल 2015 में पेरिस जलवायु समझौता हुआ था, जिसमें 200 देशों ने इस ऐतिहासिक जलवायु समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, इस समझौते का मकसद था दुनिया में हो रही तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस (3.6 डिग्री फारेनहाइट) से कम रखना। इसके साथ ही यह तय करना कि यह पूर्व औद्योगिक समय की तुलना में सदी के अंत तक 1.5 डिग्री सेल्सियस (2.7 फारेनहाइट) से ज्यादा न हो। रिपोर्ट में शामिल 200 से ज्यादा लेखक पांच परिदृश्यों पर नजर बनाए हुए हैं और उनका मानना है कि किसी भी स्थिति में दुनिया 2030 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान के आंकड़े को पार कर लेगी। यह आशंका पुराने पूर्वानुमानों से काफी पहले है।
