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खून न बहाएँ, बढ़ाएँ खून

Updated: बुधवार, 1 अक्टूबर 2014 (21:01 IST)
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गोरू व कालू जुड़वाँ भाई थे। उनकी केवल शक्लें मिलती थीं, विचार और स्वभाव नहीं। तेज स्वभाव का गोरू बहकावे में आकर वह धार्मिक रूप से कट्टर बन गया था। वह धर्म के नाम पर अपना और दूसरों का खून तक बहाने के लिए तैयार रहता था, जबकि कालू इंसानियत को धर्म से ऊपर मानता था।

वह गोरू को भी बहुत समझाता, लेकिन वह उसे ही कायर कहकर चिढ़ाते हुए कहता कि मेरा खून तो कौम के काम आएगा, तेरा तो किसी काम का नहीं। कालू उसके तानों को चुपचाप सुन लेता। इस बीच कुछ लोगों ने उनके शहर में सांप्रदायिक दंगे भड़का दिए। दोनों तरफ से खूब खून बहा। कई मासूम लोग बेमौत मारे गए, बहुत से गंभीर रूप से घायल हो गए।

दंगाइयों में शामिल गोरू भी बच न सका। उसके शरीर पर भी कई घाव लगे। इनसे बहुत अधिक खून बह जाने के कारण वह बेहोश होकर सड़क पर गिर पड़ा। होश आने पर उसने अपने आपको एक अस्पताल में पाया। उसकी जान बचाने के लिए उसे खून चढ़ाया जा रहा था।

उसने नजर घुमाई तो देखा कि पास ही बैठा कालू अपने एक हाथ पर रूई का फाया रगड़ रहा था। वह गोरू जैसे घायलों की जान बचाने के अपना खून देकर आया था। पास ही कालू का दूसरे धर्म का एक दोस्त भी बैठा था, जिसका खून गोरू को चढ़ाया जा रहा था। यह सब देखकर गोरू की आँख से आँसू बह निकले।

दोस्तो, हम चाहे जाति, धर्म, संप्रदाय के आधार पर कितने ही बँट जाएँ, कितना ही बाँट लें, लेकिन लहू के रंग के आधार ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि उसका रंग तो एक जैसा, लाल ही होता है। इसके बाद भी इनके नाम पर जरा-जरा सी बातों को लेकर लोगों का खून खौल उठता है।

कुछ के सिर पर तो ऐसा खून सवार होता है कि वे एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं। किसी का खून बहाने से पहले वे यह भी नहीं सोचते कि ऐसा करके वे इंसानियत का खून कर रहे हैं। और जब इंसानियत का खून होता है तो उसे ईश्वर भी, खुदा भी नहीं पसंद करता।

आखिर वह अपने नाम पर अपना बनाया खून बहाया जाना कैसे पसंद कर सकता है। इसलिए यदि आप ऐसे खूनी विचारों वाले हैं, तो अपने विचार बदल दें, क्योंकि इनकी वजह से आप अपना ही खून जलाते हैं और एक दिन ऐसी स्थिति भी आती है कि आपको और आपके अपनों को खून के आँसू रोना पड़ जाता है।

इसलिए बेहतर है कि मन में नफरत के नहीं, प्रेम के बीज बोएँ। तभी आपका खून आपके धर्म, आपकी कौम के काम आएगा और ऊपर वाला भी आप पर मेहरबानियाँ बरसाएगा, बरकत देगा।

दूसरी ओर, कहते हैं कि 'खून ही खून के काम आता है' यानी अपने ही अपनों के काम आते हैं। लेकिन जिंदगी में हमें सबसे ज्यादा तकलीफ खून के रिश्ते वाले ही पहुँचाते हैं। वे हमारा खून पीते रहते हैं और हम खून का घूँट पीकर रह जाते हैं।

ऐसे में सबसे ज्यादा सहारा हमें उन लोगों से मिलता है, जिनसे हमारे दिल के रिश्ते होते हैं, खून के नहीं। वैसे हमारा तो मानना है कि हमारा सभी के साथ खून का रिश्ता होता है, क्योंकि जरूरत पड़ने पर अकसर खून के रिश्ते वाले का नहीं बल्कि किसी दूसरे का खून हमारे काम आता है, क्योंकि हमारा ब्लड ग्रुप जो उससे मिलता है। फिर वह किसी भी धर्म का अनुयायी हो।

इसलिए खून को बेकार बहाने की बजाय यह सोचें कि हमारा खून सही अर्थों में किस तरह काम आ सकता है। और वह काम आता है दान करने से। जिससे कि जरूरत पड़ने पर किसी की जिंदगी बचती है। इससे उसके चेहरे पर मुस्कराहट और आपके चेहरे पर लालिमा छा जाती है। इसलिए हम सभी को समय-समय पर रक्तदान करते रहना चाहिए।

और अंत में, कल 'इदुल फितर' है। यह त्योहार संदेश देता है कि खुशियाँ बाँटो, नफरत नहीं। इसी के प्रतीक के रूप में सिवइयाँ खिलाई जाती हैं। जकात दी जाती है और खैरात बाँटी जाती है। कहते हैं बाँटने से खुशियाँ दोगुनी हो जाती हैं। इसलिए इस दिन जितनी खुशियाँ हो सके, बाँटें, जिससे आपका भी खून बढ़े और दूसरे का भी।

साथ ही आज रक्तदान दिवस है। तो क्यों न आज अपना कुछ रक्त दान करके इन खुशियों को और बढ़ाया जाए। वैसे भी दान करने से रक्त बढ़ता और ताजा होता है। ईद मुबारक।
लेखक के बारे में
मनीष शर्मा
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