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Written By ND

खुदी को कर बुलंद इतना....

करियर
- नीता श्रीवास्‍त
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असफलता न तो डेडएंड है न ही जीवन का अंत...। यह वह पहली सीढ़ी है, जहाँ से मंजिल के रास्ते खुलते हैं। फिर ये वो सीख है, जो कहीं और से नहीं मिल सकती है। असफलता को ग्रहण कर उससे सीखें, जीवन की प्राथमिकताएँ तय करें और आत्मविश्वास से आगे बढ़ें, देखें ऐसा कौन-सा दरवाजा है जो खुलता नहीं है।

व्यक्ति अगर यह कहे कि वह जीवन में हमेशा जीतता आया है तो यकीन मानिए वह सरासर झूठ बोल रहा है। कोई भी व्यक्ति सफलता के शिखर पर, हारने के बाद ही पहुँचता है। हार ही उसके मन में जीतने के लिए कोशिश करने का जज्बा पैदा करती है, अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के जुनून को और पुख्ता करती है।

अपनी असफलता को चुनौती के रूप में स्वीकारना, जीत की तरफ ले जाने वाला पहला कदम है। असफल व्यक्ति को कोई प्रोत्साहित नहीं करता, उसे खुद को प्रोत्साहित करना होगा; तभी वह सफल भी हो सकेगा और यह पक्का है ज्यों ही व्यक्ति सफल हुआ दुनिया उसे प्रोत्साहन, पारिश्रमिक, पारितोषिक देने दौड़ पड़ेगी। जरूरत है मैदान में पूरे आत्मविश्वास के साथ डटे रहने की।

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आर्या का एक ही सपना था डॉक्टर बनकर नन्हे-मुन्ने बीमार बच्चों को स्वस्थ करने का। बारहवीं तक मेरिट लिस्ट में रहने के बावजूद पीएमटी क्लियर नहीं कर पाई। दो अटेम्प्ट के बाद भी सफलता नहीं मिली मगर सपना नहीं टूटा। स्वास्थ्य सेवा सिर्फ डॉक्टर के जरिए ही दी जाती हो ऐसा तो नहीं है। चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े तमाम विभागों में आज भी अनगिनत कमियाँ हैं... सिर्फ डॉक्टर, नर्स एवं सुविधाओं का ही अभाव नहीं है बल्कि कारगर औषधियों की नई खोज के जज्बे का भी अभाव है।

और आर्या ने हिम्मत नहीं हारी और फार्मेसी की प्रवेश परीक्षा में मेरिट सीट हासिल करके प्रतिष्ठित इंस्टीट्यूट से बीफार्मा की डिग्री प्राप्त करके पूरी शिद्दत से आगे की पढ़ाई जारी रखते हुए प्रतिष्ठित फार्मास्युटिकल कंपनी से जुड़ी रही। पीएचडी होते ही वह कंपनी की रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैब में भी प्रवेश पाने में सफल हो गई।

आर्या का कहना है डॉक्टर न बन सकी तो क्या हुआ। वह सतत शोध में लगी है और यकीनन वह बच्चों की एक नहीं कई रोगों की अचूक दवा खोजने में कामयाब होगी।

अगर वह पीएमटी के रिजल्ट से निराश हो जाती तो उसकी प्रतिभा नष्ट हो जाती। जब भी निराशा घेरे तब यही एक प्रकाश काम आता है- खुद की हिम्मत...स्वयं का हौसला, आत्मविश्वास।

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विशाल एमबीए करते ही मुंबई चला गया, काफी होनहार और मेहनती। नामी बैंक में 5.25 लाख रु. के पैकेज पर नियुक्ति हो गई और निश्चित समय से पूर्व ही टारगेट पूरा करने पर बैंक से 'पहली उड़ान' का अवॉर्ड भी पा लिया। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था कि अचानक पिता की तबीयत खराब हो गई। इकलौता पुत्र होने की वजह से लाजमी था उसका तुरंत माता-पिता के पास पहुँचना। तुरंत छुट्टी लेकर वह अपने शहर आ गया।

यहाँ आकर उसे घर की, पिता की दशा देख कर लगा कि उसकी यहाँ ज्यादा जरूरत है। माता-पिता के पास रहकर उसने शहर के ही विभिन्न संस्थानों में प्रयास किया और पुनः नौकरी पा ही ली।

उसके निर्णय को भौतिकवादी नाते रिश्तेदारों ने कोरी भावुकता भी कहा कि- 'इतना अच्छा जॉब छोड़ दिया। पाँच साल में सेलेरी पचास लाख पर पहुँच जाती। माता-पिता के लिए नर्स-नौकरों आदि को रख देना था। इस शहर में धरा क्या है... मुंबई छोड़कर आ गया।'

लेकिन विशाल अडिग रहा अपने निर्णय पर। उसका कहना है- 'इस वक्त माता-पिता को मेरी सख्त जरूरत है और नौकरी तो मैं यहाँ भी कर रहा हूँ... मुझमें योग्यता होगी तो उन्नति यहाँ भी करूँगा।'

विशाल के निर्णय को गलत नहीं कहा जा सकता। उसे स्वयं पर विश्वास है कि वह छोटी जगह पर भी मेहनत करके बड़ी-बड़ी उपलब्धियाँ पा लेगा। व्यक्ति में मेहनत का जज्बा है तो एक राह क्या... वह दस रास्ते खोज लेगा अपनी मंजिल पर पहुँचने के लिए, बस खुद पर एतबार होना चाहिए। और अगर हमारे काम में दम है तो सफलता निश्चित ही मिलेगी।

यह सही है असफलताएँ मनोबल गिराती हैं और यह भी उतना ही सही है कि युवाओं में नया खून होने के बावजूद हताशा बड़ी जल्दी पनपती है। तो इसका समाधान है परस्पर संवाद, विचारों का आदान-प्रदान। जब भी मन उदास हो, मन की बात अपनों के साथ जरूर शेयर करें। जब भी किसी असफलता का सामना करें... स्वयं को दिलासा दें। जीवन में असफलता और सफलता मिलना, चलता रहता है।

आपके कार्यक्रम में आने वाली बाधा को रुकावट माना जा सकता है मगर इस रुकावट को अपने करियर की समाप्ति मानने की भूल कदापि न करें। इन रुकावटों को एक चेलैंज मानकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए नए सिरे से प्रयास शुरू कीजिए।

असफलताएँ मिलने के बावजूद हमें अपने काम का अनुभव तो हो ही जाता है। इन अनुभवों के आधार पर शांति से अपनी कार्यशैली का अध्ययन-मनन कीजिए एवं सफलता पाना ही है, इस सोच के संग अपने प्रयत्नों को जारी रखिए।
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