द ताशकंद फाइल्स : फिल्म समीक्षा

इन दिनों राजनीति और नेताओं के इर्दगिर्द घूमते विषय पर लगातार फिल्में बन रही हैं और इसी कड़ी में 'द ताशकंद फाइल्स' रिलीज हुई है। ताशकंद का नाम आते ही कई लोगों को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की याद आ जाती है। इसी शहर में शास्त्री ने अंतिम सांस ली थी। वे समझौते पर हस्ताक्षर करने गए थे और उसके कुछ घंटों बाद 11 जनवरी 1966 को उनकी मृत्यु हो गई थी।

मृत्यु ने कई सवाल खड़े किए थे, जिनके ठोस जवाब आज तक नहीं मिले हैं। क्या दिल का दौरा पड़ने से शास्त्री की स्वाभाविक मृत्यु हुई थी या उन्हें षड्यंत्रपूर्वक मार दिया गया था? इन सवालों को फिल्म 'द ताशकंद फाइल्स' में उठा कर जनता के सामने रखने की कोशिश की गई है।

इस घटना को 53 वर्ष हो गए हैं और इसके बारे में ज्यादातर लोग जानते भी नहीं हैं। कुछ इस बात से जरूर वाकिफ हैं कि शास्त्री की मृत्यु संदेह के घेरे में जरूर है। भारत में उनके लाए गए शव का रंग नीला पड़ चुका था। उनके शरीर पर कई कट्स लगे थे जिससे खून रिस रहा था। उनके शव का पोस्टमार्टम क्यों नहीं किया गया? उनकी मृत्यु से किसे फायदा मिल रहा था?

फिल्म में एक कमेटी नियुक्त की जाती है जिसमें पत्रकार, रिटायर्ड जज, इतिहासकार, वैज्ञानिक, नेता आदि शामिल हैं। ये कमेटी तमाम बातों, अफवाहों, इस मुद्दे पर लिखी गई किताबों, तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों और शास्त्री के परिवार से जुटाई गई जानकारियों के आधार पर बहस करती है, जिसके आधार पर कई नई जानकारियां या खुलासे होते हैं।

लेखक और निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने यह बात अच्छी तरह बताई है कि शास्त्री ताशकंद क्यों गए थे और उस समय राजनीतिक हालत क्या थे ताकि उन दर्शकों को समझने में आसानी रहे जो इस घटना के बारे में अनभिज्ञ हैं। लेकिन दूसरी ओर कई निरर्थक बातें भी शामिल की हैं जो केवल फिल्म की लंबाई बढ़ाने के काम की हैं।

दरअसल यह विषय ऐसा है जिस पर डॉक्यूमेंट्री बनाना ज्यादा ठीक रहता। विवेक ने ज्यादा लोगों तक पहुंचने के लिए फिल्म बनाई और उन्होंने शास्त्री की संदेहास्पद मृत्यु को पेश करने के लिए एक कहानी का भी सहारा लिया।

पत्रकार रागिनी (श्वेता बासु प्रसाद) को पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत को लेकर लीड मिलती है। वह इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाती है और सच जानना चाहती है। मंत्री पीकेआर नटराजन (नसीरुद्दीन शाह) एक कमेटी का गठन करते हैं जो सारे पहुलओं पर बात करते हैं।

रागिनी को लीड मिलना, उस पर नजर रखा जाना, उसका रूस की यात्रा करना, वहां किसी से मिलना, ये सारी बातें अनावश्यक हैं। इनके लिए ठीक से परिस्थितियां ही निर्मित नहीं की गई और दर्शक हैरान रहते हैं कि यह सब क्या और क्यों हो रहा है? आधे से ज्यादा वक्त तो इसी में गुजर जाता है।

कमेटी में जिस तरह की ओवर ड्रामेटिक बातें और हरकतें होती हैं वो फिल्म की गंभीरता को भंग करती है। ऐसा लगता है कि यहां पर निर्देशक दर्शकों के मनोरंजन का ध्यान रखने की कोशिश में लग गया है।

जहां तक इस विषय की बात है तो फिल्म बहुत कुछ ज्यादा नया पेश नहीं कर पाती है। ज्यादातर जानकारी आप गूगल पर जाकर भी हासिल कर सकते हैं। शास्त्री के परिवार से भी बात की गई है और यहां पर फिल्मकार के पास फिल्म को विश्वसनीय बनाने का शानदार अवसर था, लेकिन इसे बरबाद कर दिया गया। परिवार वालों से ज्यादा बातें ही नहीं की गई।

वि‍वेक अग्निहोत्री का निर्देशन भी कमजोर है। उन्होंने इस विषय पर ज्यादा मेहनत नहीं की और लगता है कि उन्हें फिल्म पूरी करने की भी जल्दी थी। फिल्म का संपादन भी कमजोर है और कई दृश्यों का आपस में तालमेल भी नजर नहीं आता।

श्वेता बसु प्रसाद की एक्टिंग बेदम है और कई सीन उनकी वजह से कमजोर हो गए हैं। मिथुन चक्रवर्ती, नसीरुद्दीन शाह, पंकज त्रिपाठी, मंदिरा बेदी, राजेश शर्मा जैसे कलाकार फिल्म में हैं, लेकिन इनका अभिनय उनके स्तर के अनुरूप नहीं हैं।

अच्छे विषय पर बनी बुरी फिल्म है।

निर्माता : प्रणय चौकसी, शरद पटेल, विवेक अग्निहोत्री
निर्देशक : विवेक अग्निहोत्री
कलाकार : मिथुन चक्रवर्ती, नसीरुद्दीन शाह, श्वेता प्रसाद बसु, मंदिरा बेदी, पंकज त्रिपाठी, पल्लवी जोशी
रेटिंग : 1.5/5

 

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