सुई धागा : फिल्म समीक्षा

छोटे शहर की कहानियों पर आधारित कुछ फिल्में सफल रही हैं और यही कारण है कि इन दिनों लगातार इसी तरह की फिल्में बन रही हैं। 'सुई धागा' इस कड़ी में ताजा फिल्म है जिसे शरत कटारिया ने बनाया है। वे इसके पहले 'दम लगा के हईशा' बना चुके हैं।

फिल्म देखने के पहले अहम सवाल यह था कि और अनुष्का शर्मा जैसे स्टार्स निम्न मध्यमवर्गीय किरदारों के साथ क्या न्याय कर पाएंगे? इन दोनों कलाकारों ने तो अपना काम बखूबी किया, लेकिन स्क्रीनप्ले इनका साथ नहीं निभा पाया।

मौजी (वरुण धवन) अपने नाम के अनुरूप मौजी हैं। तमाम अभावों में भी उसके मुंह से 'सब बढ़िया' ही निकलता है। वह अपनी पत्नी ममता (अनुष्का शर्मा) और माता-पिता के साथ रहता है। एक दुकान से वह नौकरी इसलिए छोड़ देता है क्योंकि काम के साथ-साथ उसे कुत्ता या बंदर बनाकर सेठ मजे लेता है और यह बात ममता को पसंद नहीं आती।

मौजी टेलरिंग का काम शुरू करता है। दुकान न होने पर सड़क किनारे मशीन लेकर बैठ जाता है। इस काम में उसके साथ ममता कदम मिला कर चलती है।

यहां तक फिल्म बहुत ही बढ़िया तरीके से चलती है। इस गंभीर बात को भी हास्य के पुट के साथ निर्देशक और लेखक ने बखूबी पेश किया है। नकारा बेटा और बाप की झड़प, पैसों की तंगी, मां की बीमारी को लेकर बढ़िया सीन रचे गए हैं। आप ठहाके भी लगाते हैं और कुछ सीन आपको भावुक भी करते हैं।

जिंदगी की जद्दोजहद के बीच भी मौजी के किरदार का खुश रहना, सपने देखना और आगे बढ़ने के लिए लगे उसे दर्शकों से जोड़ता है। मौजी जहां दुनियादारी में कमजोर पड़ता है वहां ममता उसे संभालती है और उसके साथ कंधे से कंधा मिला कर चलती है।

एक घंटे तक सरपट दौड़ती फिल्म दूसरे घंटे मे रूकने लगती है। कहानी में कुछ ऐसे स्पीड ब्रेकर आते हैं जो फिल्म की गति में बाधा डालते हैं। फिल्म इधर-उधर भटकने लगती है। लेखक को समझ नहीं आया कि अब बात को कैसे खत्म किया जाए।

सिलाई मशीन को पाने की जद्दोजहद और फैशन शो में मौजी-ममता का भाग लेना वाले प्रसंग डाले गए हैं। इन्हें अपनी सहूलियत के हिसाब से लिखा गया है। अचानक रियलास्टिक फिल्म रियलिटी का साथ छोड़ने लगती है।


बीच-बीच में कुछ मजेदार और इमोशनल सीन आते हैं जो फिल्म को संभालते हैं, लेकिन कहानी विश्वसनीय न होने के कारण ये उतना प्रभाव नहीं छोड़ पाते हैं। साथ ही फिल्म में आगे क्या होने वाला है इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

निर्देशक के रूप में शरत कटारिया का काम अच्छा है। उन्होंने एक सिंपल स्टोरी को अच्छे से पेश किया है। किरदारों के बीच के रिश्ते और इमोशन को उन्होंने अच्छे से उभारा है। एक कम आय वाले परिवार की परेशानियों और संघर्ष को बेहतरीन तरीके से दर्शाया है। सेकंड हाफ में यदि उन्हें कहानी का साथ मिलता तो यह एक बेहतरीन फिल्म होती।

सभी कलाकारों का अभिनय फिल्म का बड़ा प्लस पाइंट है। वे अपने अभिनय के जरिये बांध कर रखते हैं। वरुण धवन ने अपने स्टारडम को साइड में रख एक साधारण लड़के के किरदार को शानदार तरीके से निभाया है। उनका किरदार बेहद पॉजिटिव है और यह बात उन्होंने अपने अभिनय से दिखाई है।

अनुष्का शर्मा ने उनका साथ अच्छे से निभाया है। सिंपल लुक और नॉन ग्लैमरस किरदार करने का उन्होंने साहस दिखाया है। रघुवीर यादव सहित अन्य सारे कलाकारों ने भी अपना काम शानदार तरीके से किया है।

फिल्म का बैकग्राउंड म्युजिक बढ़िया है। गाने मूड के अनुरूप हैं।

'सुई धागा' में कई दिल को छू लेने वाले सीन हैं, लेकिन पूरी फिल्म के बारे में यह बात नहीं कही जा सकती।

निर्माता : मनीष शर्मा
निर्देशक : शरत कटारिया

संगीत : अनु मलिक
कलाकार : वरुण धवन, अनुष्का शर्मा, रघुवीर यादव
सेंसर सर्टिफिकेट : यू * 2 घंटे 2 मिनट 29 सेकंड
रेटिंग : 2.5/5



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