प्रेम रतन धन पायो : फिल्म समीक्षा

समय ताम्रकर|
जिस तरह से सुपरमैन या स्पाडरमैन का किरदार हर फिल्म में एक जैसा रहता है और कहानियां बदलती रहती है उसी तरह सूरज बड़जात्या की सलमान को लेकर बनाई गई हर फिल्म में सलमान एक जैसे नजर आते हैं। नाम होता है प्रेम और वह सहृदय, मासूम, संस्कारी और खुशियां बांटने वाला शख्स होता है। सलमान के किरदार की यही खासियत हमें सूरज की ताजा फिल्म 'प्रेम रतन धन पायो' में भी नजर आती है, बस स्थान, परिवेश और कहानी बदल गई है। शायद सूरज जानते हैं कि सलमान को इस रूप में दर्शक देखना बेहद पसंद करते हैं इसलिए वे 'प्रेम' के किरदार की सीरिज बनाते आ रहे हैं। 
 
कहानी है अयोध्या में रहने वाला प्रेम (सलमान खान) की, जो स्टेज पर की जाने वाली रामायण से जुड़ा है। वह राजकुमारी मैथिली (सोनम कपूर) का प्रशंसक है जो 'उपहार' के जरिये गरीबों की मदद करती है। मैथिली से मिलने के लिए प्रेम अपने दोस्त कन्हैया (दीपक डोब्रियाल) के साथ  प्रीतमपुर जाने का फैसला करता है जहां राजकुमारी अपने मंगेतर विजय सिंह (सलमान खान, डबल रोल) के राजतिलक में हिस्सा लेने जाने वाली है। 
 
विजय सिंह के साथ षड्यंत्र होता है। एक जानलेवा हमले में वह खाई में गिर जाता है, लेकिन उसका विश्वासपात्र दीवान (अनुपम खेर) उसे बचा लेता है। घायल विजय की जगह दीवान केवल चार दिनों के लिए प्रेम को विजय सिंह बना कर पेश कर देता है  क्योंकि ये दोनों हमशक्ल हैं। इसके ‍पीछे उसका उद्देश्य है विजयसिंह पर हमला करने वाले को ढूंढ निकालना और दुनिया के सामने इस मामले को छिपाए रखना। 
 
प्रेम को पता चलता है कि विजय सिंह और उसकी सौतेली बहनों के रिश्ते में खटास है। इसे वह अपने सुमधुर व्यवहार से मिठास में बदल देता है।   
 
विजय सिंह और मैथिली एक-दूसरे को नापसंद करते हैं, लेकिन मैथिली के नजदीक रह कर प्रेम उसका दिल जीत लेता है। इस प्रेम कहानी में तब ट्विस्ट आता है जब विजय सिंह ठीक होकर वापस आता है। मैथिली-प्रेम की प्रेम कहानी का क्या होगा? क्या होगा जब मैथिली को असलियत पता चलेगी? विजय सिंह की जान लेने वाले लोग कौन हैं? इन प्रश्नों के जवाब थोड़े-बहुत उतार-चढ़ाव के साथ लगभग तीन घंटे की फिल्म में मिलते हैं। 
फिल्म की कहानी सूरज बड़जात्या ने लिखी है और कहानी फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी है। राज परिवार की कहानी को उन्होंने वर्तमान में फिट किया है, जो कि ठीक नहीं लगता। यदि वे इस कहानी का समय पचास वर्ष पहले का रखते तो ज्यादा बेहतर होता क्योंकि आज के दौर में राज ‍परिवार की कहानी को दिखाना बेहद बनावटी लगता है। 
 
प्रीतमपुर को भारत में दिखाया गया है, लेकिन ऐसा लगता ही नहीं कि इस शहर में भारत सरकार के कायदे-कानून हैं। कार की नंबर प्लेट पर 'प्रीतमपुर 7' लिखा है जबकि भारत के ‍किसी भी शहर में इस तरह की नंबर प्लेट का चलन नहीं है। लोग शाही परिवार को इतना सम्मान देते हैं जैसा कि डेढ़ सौ बरस पहले दिया जाता था। इस तरह के नकलीपन फिल्म में इस कदर हावी है कहानी पर यकीन नहीं होता। 
 
सूरज बड़जात्या जैसे लेखक और निर्देशक ने स्क्रिप्ट की कुछ कमियों पर ध्यान नहीं दिया जो कि आश्चर्य की बात है। विजय खाई में गिरता है, लेकिन पीठ के सिवाय उसे शरीर में कही भी खरोंच तक नहीं आती। गंभीर हालत में उसे अस्पताल ले जाने के बजाय उसका इलाज एक तहखाने में किया जाता है, जो किसी आश्चर्य से कम नहीं है। खलनायक इतने मूर्ख हैं कि राज की बातें अजनबियों के सामने करते हैं। 
 
प्रेम का मैथिली का दिल जीतना, विजय के भाई-बहनों से संबंध सुधारना, विजय सिंह का ठीक हो जाना, ये तमाम घटनाएं मात्र चार दिन में घटित हो जाती हैं जो कि अविश्वसनीय है।  
 
फिल्म की शुरुआत में रामायण को लेकर नौटंकी, एक फुटबॉल मैच जैसे कुछ आइटम्स भी मनोरंजन के लिए डाले गए हैं, लेकिन ये अपने मकसद में नाकामयाब रहे हैं।
 
फिल्म की कहानी और स्क्रिप्ट की कमजोरी के बावजूद भी जो शख्स सबसे ज्यादा राहत देता है, वह हैं। प्रेम के रूप में आप उन्हें पहली फ्रेम से ही पसंद करने लगते हैं। पूरी फिल्म उनके इर्दगिर्द घूमती है और वे कमजोर कथा को अपने कंधे पर बखूबी ढोते हैं और अपने फैंस को खुश होने के मौके देते हैं।  
 
निर्देशक के रूप में सूरज ने स्क्रिप्ट पर कम तथा भव्यता पर ज्यादा ध्यान दिया है। सेट, लोकेशन, कास्ट्यूम जबरदस्त है। उन्होंने अपना सारा ध्यान सलमान द्वारा अभिनीत कैरेक्टर पर लगाया है और प्रेम के किरदार को दर्शकों के दिलों में उतारने में सफल रहे हैं। 
 
उन्होंने एक साफ-सुथरी और संस्कार की घुट्टी पिलाने वाली पारिवारिक फिल्म जरूर बनाई है, लेकिन उनका प्रस्तुतिकरण बीते दौर की फिल्मों जैसा है। आश्चर्य की बात तो यह है कि उन्होंने इतनी कमजोर कथा कैसे चुनी?    
कुछ सीन उन्होंने अच्छे रचे हैं जो दर्शकों को भावुक कर देते हैं, जैसे प्रेम (विजय) द्वारा अपनी बहन चंद्रिका को जायदाद में हिस्सा देना और बहन का भाई को तिलक लगाना। सोनम कपूर और सलमान खान के बीच एक रोमांटिक सीन भी जबरदस्त है जिसमें विजय सिंह बना प्रेम हद लांघने में संकोच करता है। कहानी को ठीक से समेटने में सूरज लड़खड़ा गए हैं और शीश महल में फाइटिंग सीक्वेंस बोरियत पैदा करता है। वे फिल्म को बहुत ज्यादा मनोरंजक नहीं बना पाए। 
 
फिल्म का संगीत औसत है। इरशाद कामिल के बोल अच्‍छे हैं, लेकिन हिमेश रेशमिया की धुनें उस स्तर की नहीं है। गीतों के लिए सिचुएशन ठीक से नहीं बनाई गई है। अचानक राजकुमारी का सड़कों पर नाचना अजीब लगता है। 
 
वी. माणिकांदन की सिनेमाटोग्राफी शानदार है खासतौर पर शीशमहल में उनका यह काम देखने लायक है। सेट और कास्ट्यूम्स उल्लेखनीय हैं। 
 
सलमान खान फिल्म की लाइफलाइन हैं। वे इस बेजान कहानी में थोड़ी-बहुत जान फूंकते हैं। उन्होंने अपने किरदार को वो सरलता, सच्चाई और भोलापन दिया है जो डिमांड थी। अपने स्टारडम से वे स्क्रिप्ट की कमियों को ढंक लेते हैं। वे इतने हैंडसम लगे हैं कि लगता ही नहीं कि फिल्म की हीरोइन उनसे 19 वर्ष छोटी है। 
 
एक राजकुमारी के किरदार को सोनम ने अपने लुक्स और एटीट्यूड से गरिमा दी है। हालांकि उनके लिए करने को बहुत ज्यादा नहीं था। सूरज ने उन्हें बहुत खूबसूरती के साथ परदे पर पेश किया है। 
 
दी‍पक डोब्रियाल को बूढ़े के गेटअप में क्यों पेश किया गया है समझ के परे है जबकि इससे कहानी में कोई भी फर्क नहीं पड़ा। अनुपम खेर, स्वरा भास्कर, नील नीतिन मुकेश का अभिनय उल्लेखनीय रहा है। 
 
सलमान और सूरज की जोड़ी ऐसी है जिससे दर्शकों की उम्मीद आसमान छूती है, इस उम्मीद पर सिर्फ सलमान ही खरे उतरे हैं। 
 
बैनर : राजश्री प्रोडक्शन्स प्रा.लि., फॉक्स स्टार स्टुडियोज़
निर्माता-निर्देशक : सूरज बड़जात्या
संगीत : हिमेश रेशमिया
कलाकार : सलमान खान, सोनम कपूर, नील नितिन मुकेश, अरमान कोहली, अनुपम खेर, स्वरा भास्कर, दीपक डोब्रियाल 
सेंसर सर्टिफिकेट : यू * सेंसर सर्टिफिकेट नंबर : DIL/1/165/2015
अवधि : 2 घंटे 54 मिनट 9 सेकंड 
रेटिंग : 2.5/5 

 

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