बागी 3 : फिल्म समीक्षा

समय ताम्रकर| Last Updated: शुक्रवार, 6 मार्च 2020 (17:57 IST)
बागी सीरिज की सफलता से इसके निर्माता इतने उत्साहित हो गए कि 4 साल में सीरिज की तीसरी फिल्म आ गई। लोकप्रियता का फायदा उठाने के चक्कर में जल्दबाजी का शिकार नजर आती है। यह कुछ ऐसा ही है कि बाजार में मांग को देखते हुए फल को पेड़ पर पकने के पहले ही तोड़ लिया जाता है, तो फिर स्वाद की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

बागी की सफलता के पीछे इसके एक्शन सीन रहे हैं और बागी 3 में सिर्फ एक्शन पर ही ध्यान दिया गया है, लेकिन एक्शन के बीच जो कहानी रखी गई है वो बहुत ही कमजोर है। कहानी की नींव कमजोर रहने के कारण एक्शन की इमारत टिक नहीं पाती है और फिल्म दर्शकों का मनोरंजन नहीं कर पाती।

घायल में सनी देओल अपने भाई को ढूंढने के लिए निकलते हैं। गदर में सनी देओल अकेले पाकिस्तान से टकरा जाते हैं। यह बातें आपको बागी 3 देखते समय याद आती हैं। इन फिल्मों के हाइलाइट्स पाइंट्स को किसी तरह जोड़ कर बागी 3 की कहानी तैयार की गई है। एक दक्षिण भारतीय फिल्म से भी प्रेरणा भी ली गई है। लेकिन इन फिल्मों में एक्शन के पीछे जो इमोशन और एंटरटेनमेंट था वो बागी 3 में नदारद है। प्रेरणा लेकर भी साजिद नाडियाडवाला ढंग की कहानी लिखने में असफल रहे।

रॉनी (टाइगर श्रॉफ) अपने बड़े भाई विक्रम (रितेश देशमुख) से बहुत प्यार करता है। मरते समय दोनों के पिता छोटे भाई को बोलते हैं कि बड़े भाई का खयाल रखना। अब ऐसा क्यों है? क्योंकि बड़ा भाई बहुत ही सीधा और डरपोक किस्म का है।

विक्रम पुलिस में भर्ती हो जाता है। गुंडों से डरता है, लेकिन छोटा भाई रॉनी गुंडों की धुलाई करता है और नाम विक्रम का होता है। सरकार खुश होकर विक्रम को एक मिशन के तहत सीरिया पहुंचाती है।



विक्रम का अपहरण हो जाता है। अपहरणकर्ता बहुत ही खतरनाक लोग हैं। वे नहीं जानते कि उन्होंने रॉनी से पंगा ले लिया है। रॉनी फौरन सीरिया के लिए रवाना होता है। रॉनी का एक ही मिशन है कि किसी भी तरह अपने भाई को छुड़ाना। जो भी रॉनी और विक्रम के बीच आएगा वह उसे खत्म कर देगा। अपने भाई को सुरक्षित वापस लाने के लिए रॉनी तबाही मचा देता है।

फिल्म की शुरुआत 80 के दशक की फिल्मों की तरह होती है। बचपन की मारामारी दिखाई जाती है, फिर बच्चे बड़े होते हैं। रितेश देशमुख ने सीधा-सादा दिखने के लिए जिस तरह की एक्टिंग की है वो बहुत ही बचकानी है। कुछ ज्यादा ही कोशिश उन्होंने कर दी है जिससे विश्वसनीयता खत्म हो जाती है।

भाईचारा इंटरवल तक खींचा गया है और यह बेहद बोरिंग है। रॉनी के सीरिया पहुंचने तक लेखक और निर्देशक के पास दिखाने को कुछ नहीं था और कहानी आउटर में खड़ी रेलगाड़ी‍ की तरह रूकी हुई लगती है।

रॉनी जब सीरिया पहुंचता है तो फिल्म में थोड़ी स्पीड आती है क्योंकि एक्शन ड्राइविंग सीट पर आता है, लेकिन लॉजिक के अभाव में ये भी ज्यादा प्रभावित नहीं करता।

सीरिया पहुंच कर रॉनी जिस आसानी से अपने भाई को खोज लेता है उसमें बिलकुल रोमांच नहीं है। सब कुछ आसानी से हो जाता है। रॉनी अकेला ही सैकड़ों से भिड़ जाती है, हजारों गोलियां, हेलिकॉप्टर, टैंक, गोला, बारूद, मशीनगन उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाते। एक्शन को इतना 'ओवरडू' कर दिया गया कि मजा ही जाता रहा।

फिल्म के विलेन भी पॉवरफुल नहीं लगते इसलिए रॉनी की उनसे टक्कर एकदम फीकी लगी है। सीरिया में विक्रम को उठा ले जाने वाली बात बिलकुल भी नहीं जमती।

पहले हाफ में एक्शन सीन कम हैं और इससे एक्शन देखने आए दर्शकों को थोड़ी निराशा होती है। कॉमेडी सीन और गाने ब्रेक का काम करते हैं। क्लाइमैक्स का एक्शन ही बांध कर रखता है।

बागी 3 देखते समय यह बात बार-बार महसूस होती है कि फिल्म बहुत लंबी है और यह फीलिंग फिल्म के लिए अच्छी बात नहीं है। फिल्म के संवादों में दम नहीं है। द्वारा बोले गए संवाद तो अत्यंत घटिया हैं।

गानों के मामले में फिल्म कंगाल है और पुराने हिट गीतों का सहारा लिया गया है। एक्शन सीन फिल्म का प्लस पाइंट है और इनमें अच्‍छा-खासा पैसा भी खर्च किया गया है।

निर्देशक को बड़ा सेटअप और स्टार्स मिले, लेकिन वे इनका पूरा उपयोग नहीं कर पाए। वे फिल्म को मनोरंजक नहीं बना पाए और न ही इमोशन्स पैदा कर पाए। आधे से ज्यादा काम एक्शन डायरेक्टर्स ने किया। हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई और हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी एक जैसे होते हैं वाली बातें फिल्म में फिट नहीं बैठती।

एक्शन सीन में जबरदस्त रहे हैं, लेकिन इमोशन्स में पीछे रह जाते हैं। जब-जब उनके एक्शन सीन स्क्रीन पर आते हैं फिल्म की पकड़ मजबूत हो जाती है। श्रद्धा कपूर का रोल खराब तरीके से लिखा गया है और उनका अभिनय औसत रहा है। रितेश देशमुख नकली लगे हैं।

जयदीप अहलावत की एक्टिंग बढ़िया है। विजय वर्मा ने ओवरएक्टिंग की है। दिशा पाटनी एक गाने और जैकी श्रॉफ चंद दृश्यों में दिखाई दिए हैं।

बागी 3 में चंद बढि़या एक्शन सीन देखने की कीमत बहुत सारे उबाऊ सीन देख कर चुकानी पड़ती है और यह बहुत ज्यादा है।


बैनर : नाडियाडवाला ग्रैंडसन एंटरटेनमेंट प्रोडक्शन
निर्माता : साजिद नाडियाडवाला
निर्देशक : अहमद खान
संगीत : विशाल-शेखर, तनिष्क बागची, सचेत-परम्परा, रोचक कोहली
कलाकार : टाइगर श्रॉफ, श्रद्धा कपूर, रितेश देशमुख, अंकिता लोखंडे, जयदीप अहलावत, विजय वर्मा, जैकी श्रॉफ, दिशा पाटनी
सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 2 घंटे 27 मिनट 10 सेकंड
रेटिंग : 2/5


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