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Last Modified: बुधवार, 25 फ़रवरी 2026 (13:13 IST)

‘भारंगम' का समापन: शून्य से शुरू हुआ सफर, अब वैश्विक शिखर पर

25th Bharat Rang Mahotsav
एनएसडी का 25वां 'भारत रंग महोत्सव' सफलतापूर्वक संपन्न हो गया है। 5,000 कलाकारों की मेहनत और 15 देशों की भागीदारी ने इसे 'महा-भारंगम' बना दिया। अंटार्कटिका में प्रदर्शन से लेकर डिजिटल ओटीटी 'नाट्यम' की शुरुआत तक, यह उत्सव भारतीय कला की नई पहचान बन चुका है।
 

विकसित होती रहेगी 'भारंगम' की 'लीला भूमि'

ऐसे में जब हम अपनी जीवन लीला से आगे जाने वाले हैं, मैं आश्वस्त हूं, लग रहा है कि भारत रंग महोत्सव की जो लीला भूमि आपने विकसित की, वह आगे और भी विकसित होती रहेगी। यह भावुक उद्गार राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) के पूर्व निदेशक और भारत रंग महोत्सव के मूल परिकल्पनाकार, पद्मश्री प्रो. राम गोपाल बजाज ने व्यक्त किए। अवसर था— 25वें 'भारत रंग महोत्सव' (भारंगम) का भव्य समापन समारोह। इसमें सरदार पटेल के जीवन पर आधारित 'लौह पुरूष: सरदार वल्लभ भाई पटेल' का मंचन हुआ।
 

शून्य से शिखर तक का सफर 

मुख्य अतिथि प्रो. बजाज ने अपने संबोधन में 1999 के उन शुरुआती दिनों को याद किया जब भारंगम की नींव रखी गई थी। उन्होंने कहा, जिस समय हमने इस उत्सव की कल्पना की थी, तब रंगमंच में एक प्रकार का शून्य और निराशा थी। हमने एक छोटा सा कदम बढ़ाया था। वह शून्य से शुरू हुआ सफर आज जिस गुणात्मक स्थिति में पहुँचा है, उसे देख कर मैं अत्यंत प्रसन्न हूं। 
 

'लौह पुरुष': तकनीक और भव्यता का संगम

समापन समारोह की मुख्य प्रस्तुति एनएसडी के 'रंगमंडल' द्वारा तैयार नाटक 'लौह पुरुष: सरदार वल्लभ भाई पटेल' रही। आसिफ ख़ान द्वारा लिखित और चितरंजन त्रिपाठी द्वारा निर्देशित यह नाटक आधुनिक रंगमंच की नई संभावनाओं को प्रदर्शित करता है। इसमें करीब 150 कलाकारों और 20 बाल कलाकारों की टीम ने 80x60 फीट के विशाल मंच पर इतिहास को जीवंत कर दिया। निर्देशक त्रिपाठी ने बताया कि इस नाटक का मंचन पहली बार 30 नवंबर 2025 को केवड़िया में सरदार पटेल की 150वीं जयंती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष हुआ था।
 

भविष्य का संकल्प और रंग-संवाद

एनएसडी के निदेशक चितरंजन त्रिपाठी ने आगामी लक्ष्यों पर बात करते हुए इसे सही मायनों में 'जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा' रंगकर्म बताया। वहीं, उपाध्यक्ष प्रो. भरत गुप्त ने कहा कि रंगकर्मी ही वह सेतु है जो दिव्य रूपों को इस धरा पर प्रतिष्ठित करता है। प्रसिद्ध अभिनेत्री मीता वशिष्ठ ने 'थिएटर स्पेस' की कमी पर चिंता जताई, जबकि स्वानंद किरकिरे ने भारंगम के नए स्वरूप को आधुनिक समय की मांग बताया।
 

25वें भारत रंग महोत्सव से जुड़े कुछ तथ्य  

इस बार का महोत्सव न केवल प्रदर्शन बल्कि विस्तार और तकनीक के मामले में भी विशिष्ट रहा। देश के कस्बाई कलाकारों से लेकर महानगर के कलाकारों के विभिन्न शैली के नाटकों के मंचन हुए। बच्चों का रंगमंच भी आयोजन से जुड़ा। हर बार की तरह विदेशी नाटकों को भी देखने का मौका मिला। नाट्य विद्यालय के पूर्व स्नातक पकंज त्रिपाठी, पीयूष मिश्रा जैसे आज के कई प्रमुख कलाकारों और निर्देशकों ने आयोजन में शिरकत की। उनके संवाद कार्यक्रम हुए।
 
महोत्सव में अटलांटा, कनाडा, लंदन, मॉरिशस, नीदरलैंड्स, न्यूज़ीलैंड, कतर, स्पेन, सूरीनाम, तंजानिया और यूएई (दुबई, अबू धाबी, शारजाह) जैसे देश शामिल हुए। इन देशों में 20 से अधिक विविध नाटकों का मंचन हुआ। स्पेन ने 'मास्क मेकिंग' पर एक विशेष कार्यशाला भी आयोजित की। 
 
अंटार्कटिका में कला: महोत्सव का सबसे साहसिक प्रदर्शन अंटार्कटिका में वैज्ञानिकों की टीम द्वारा माइनस 6 डिग्री तापमान में किया गया।
 
डिजिटल पहल: एनएसडी ने भविष्य की ओर कदम बढ़ाते हुए अपना इंटरनेट रेडियो ‘रंग-आकाश’ और नाटकों के डिजिटल प्रसारण के लिए ओटीटी प्लेटफॉर्म 'नाट्यम' की शुरुआत की।
 
विविधता और भाषा: 250 फुल-लेंथ थिएटर प्रोडक्शन के 280 से ज्यादा शो हुए। नागा, बृजवाली, बुंदेली, राभा, मैतेई, ताई खामती, न्यिशी, मैथिली, पुर्गी, भोटी और गारो जैसी कम प्रतिनिधित्व वाली भाषाओं को भी मंच मिला।
 
युवा और प्रयोगधर्मी रंगमंच: दिल्ली-एनसीआर के कॉलेजों द्वारा 36 स्ट्रीट प्ले, देश भर के 16 वन-एक्ट प्ले और विभिन्न भाषाओं के 33 माइक्रो ड्रामा भी इस उत्सव का हिस्सा रहे।
 
विशाल भागीदारी: अकेले मंडी हाउस (NSD परिसर) में प्रतिदिन 6,000 से ज्यादा दर्शक पहुंचे। 'जश्ने बचपन' में 1,000 बच्चों और 'आदि रंग' में 400 आदिवासी कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया।
 
महिला शक्ति और साहित्य: इस बार महिला निर्देशकों के 33 नाटकों का मंचन हुआ। साथ ही 19 बुक लॉन्च और चर्चा सत्र आयोजित किए गए। एनएसडी के पहले निदेशक इब्राहिम अल्काज़ी के साथ ही रतन थियम, आलोक चटर्जी, दया प्रकाश सिन्हा जैसे रंग दिग्गजों के अवदानों को याद किया गया।
 
एक बड़ा परिवार: कुल मिलाकर इस 'महा-भारंगम' ने 5,000 कलाकारों, 1,000 तकनीशियनों और पर्दे के पीछे काम करने वाले 10,000 से अधिक कर्मियों को एक साझा मंच प्रदान किया।
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